
#झारखंड #प्रवासी_मजदूर : दुबई की कंपनी में फंसे कामगारों ने वेतन और सुरक्षित वापसी न मिलने का दर्द साझा किया।
दुबई में कार्यरत झारखंड के 12 प्रवासी मजदूर गंभीर आर्थिक और मानवीय संकट में फंस गए हैं। हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो जिलों से गए ये मजदूर एक निजी कंपनी में काम के लिए विदेश गए थे, जहां अब उन्हें न समय पर वेतन मिल रहा है और न ही भारत लौटने की व्यवस्था हो पा रही है। मजदूरों ने वीडियो संदेश के जरिए अपनी पीड़ा सार्वजनिक करते हुए सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। यह मामला एक बार फिर विदेशों में काम कर रहे भारतीय मजदूरों की सुरक्षा और अधिकारों पर सवाल खड़ा करता है।
- दुबई में झारखंड के 12 प्रवासी मजदूर आर्थिक संकट में फंसे।
- हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो जिलों से गए थे सभी मजदूर।
- EMC कंपनी में काम के दौरान वेतन भुगतान बंद होने का आरोप।
- मजदूरों ने वीडियो संदेश जारी कर सोशल मीडिया पर गुहार लगाई।
- मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत सरकार से सुरक्षित वतन वापसी की मांग।
झारखंड से रोज़गार की तलाश में विदेश जाने वाले मजदूरों की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा मामला दुबई का है, जहां राज्य के तीन जिलों के 12 मजदूर लंबे समय से फंसे हुए हैं। इन मजदूरों का कहना है कि काम के नाम पर उन्हें विदेश ले जाया गया, लेकिन अब न तो उन्हें पूरा वेतन दिया जा रहा है और न ही स्वदेश लौटने का कोई रास्ता दिख रहा है।
किस कंपनी में काम के लिए गए थे मजदूर
प्राप्त जानकारी के अनुसार, हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो जिलों के ये मजदूर दुबई स्थित EMC (Electro Mechanical Coll Company) में काम के लिए गए थे। शुरुआत में सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन कुछ समय बाद हालात बिगड़ने लगे। मजदूरों का आरोप है कि कंपनी प्रबंधन ने धीरे-धीरे वेतन देना बंद कर दिया और उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया जाने लगा।
विदेशी धरती पर फंसे होने के कारण मजदूर न तो खुलकर विरोध कर पा रहे हैं और न ही कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में हैं।
वीडियो संदेश के जरिए छलका दर्द
दुबई में फंसे इन मजदूरों ने अपनी स्थिति बताने के लिए वीडियो संदेश जारी किया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में मजदूरों ने बताया कि वे कई महीनों से बिना वेतन के काम करने को मजबूर हैं।
उनका कहना है कि रोजमर्रा के खर्च, भोजन और रहने की व्यवस्था तक मुश्किल हो गई है। अनिश्चित भविष्य और मानसिक तनाव के बीच वे किसी तरह दिन काट रहे हैं।
फंसे मजदूरों के नाम और गांव
दुबई में फंसे झारखंड के जिन 12 मजदूरों ने मदद की गुहार लगाई है, उनके नाम इस प्रकार हैं—
दीपक कुमार महतो (चुकचुको),
डालेश्वर कुमार महतो (कांजकीरो),
अजय कुमार (डुमरडेली),
राजेश महतो (तिरला),
सेवा महतो (गोरहर),
फालेन्द्र महतो (खेदाडीह),
जागेश्वर महतो (खेदाडीह),
बैजनाथ महतो (सिरैय),
रोहित महतो (गोरहर),
दिलीप महतो (पारजोरिया),
गंगाधर महतो (पारजोरिया),
त्रिलोकी महतो (पारजोरिया)।
इन सभी मजदूरों के परिवार झारखंड में उनकी सुरक्षित वापसी की आस लगाए बैठे हैं।
न वेतन, न वापसी की व्यवस्था
मजदूरों का कहना है कि उन्हें लंबे समय से वेतन नहीं मिला है। बार-बार मांग करने के बावजूद कंपनी प्रबंधन टालमटोल कर रहा है। वहीं, भारत लौटने के लिए जरूरी टिकट और दस्तावेजों की व्यवस्था भी नहीं की जा रही है।
मजदूरों ने बताया कि वे अब कर्ज लेकर या सीमित संसाधनों में गुजारा कर रहे हैं, जो लंबे समय तक संभव नहीं है।
सरकार और जनप्रतिनिधियों से अपील
फंसे मजदूरों ने झारखंड सरकार, भारत सरकार और संबंधित अधिकारियों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने खास तौर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राज्य के जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों से मदद की गुहार लगाई है।
मजदूरों का कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो उनकी स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला मौका नहीं है जब झारखंड के प्रवासी मजदूर विदेश में संकट में फंसे हों। इससे पहले भी खाड़ी देशों से मजदूरों के फंसे होने, वेतन न मिलने और अमानवीय परिस्थितियों में काम कराने के मामले सामने आते रहे हैं।
हर बार सवाल उठता है कि आखिर इन मजदूरों की सुरक्षा और अधिकारों की निगरानी कौन करेगा।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में राज्य और केंद्र सरकार के बीच समन्वय बेहद जरूरी है। दूतावास स्तर पर त्वरित कार्रवाई, कंपनी प्रबंधन से बातचीत और मजदूरों की सुरक्षित वापसी की योजना ही एकमात्र समाधान है।
यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो इसका असर न केवल मजदूरों पर बल्कि उनके परिवारों पर भी गहराई से पड़ेगा।
न्यूज़ देखो: प्रवासी मजदूरों की अनदेखी पर बड़ा सवाल
दुबई में फंसे झारखंड के मजदूरों का यह मामला प्रवासी कामगारों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। रोज़गार की तलाश में विदेश जाने वाले मजदूर जब संकट में फंसते हैं, तो उनकी आवाज़ अक्सर देर से सुनी जाती है। सरकार और प्रशासन के लिए यह एक परीक्षा है कि वे कितनी तेजी और संवेदनशीलता से हस्तक्षेप करते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
वतन से दूर मजदूर, जिम्मेदारी हमारी भी
विदेशों में काम कर रहे मजदूर राज्य और देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। संकट के समय उनका साथ देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
जरूरी है कि ऐसे मामलों में आवाज़ उठे, ताकि सरकार तक सही जानकारी पहुंचे और कार्रवाई तेज हो।
इस खबर पर अपनी राय साझा करें, इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और प्रवासी मजदूरों की सुरक्षित वापसी की मुहिम को मजबूत करें।



