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बीएड नामांकन शुल्क में 48 प्रतिशत वृद्धि: दुमका के छात्रों में आक्रोश

#दुमका #शिक्षासंकट : एसकेएमयू ने बीएड नामांकन शुल्क ₹88 हजार से बढ़ाकर ₹1.30 लाख कर दिया, छात्र संगठन आंदोलन की तैयारी में
  • एसकेएमयू प्रशासन ने बीएड नामांकन शुल्क में लगभग 48% की बढ़ोतरी की।
  • पहले शुल्क ₹88,000 था, अब बढ़कर ₹1,30,000 हो गया।
  • गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
  • छात्र संगठनों ने फैसले को शिक्षा से खिलवाड़ बताया।
  • चेतावनी दी कि फीस वृद्धि वापस न हुई तो उग्र आंदोलन होगा।

दुमका स्थित सिद्धू कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय (एसकेएमयू) ने बीएड नामांकन शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी है। अब तक जहां छात्रों को ₹88,000 शुल्क देना पड़ता था, वहीं इस बार यह राशि सीधे बढ़कर ₹1,30,000 कर दी गई है। यह लगभग 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फैसले से छात्रों और अभिभावकों में गहरी नाराजगी है।

छात्रों और अभिभावकों की चिंता

फीस वृद्धि का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ेगा जो गरीब या मध्यमवर्गीय हैं और पहले से ही महंगाई और आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं। कई अभिभावकों ने कहा कि यह निर्णय बच्चों के भविष्य पर भारी बोझ डाल देगा और कई योग्य छात्र नामांकन से वंचित रह जाएंगे।

छात्र संगठनों का विरोध

फीस वृद्धि के विरोध में छात्र संगठन खुलकर सामने आए हैं। उनका कहना है कि यह फैसला गरीब छात्रों के सपनों पर सीधा प्रहार है।

छात्र नेताओं ने कहा: “सरकार एक ओर शिक्षा को सभी तक पहुंचाने की बात करती है, दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन इस तरह के कदम उठाकर गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों को हतोत्साहित कर रहा है।”

आंदोलन की चेतावनी

छात्र संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जल्द ही फीस वृद्धि का निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय ने बिना किसी पूर्व चर्चा या सलाह के यह कदम उठाया है, जो शिक्षा के अधिकार का हनन है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी

फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस निर्णय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। लेकिन अंदरखाने से मिल रही जानकारी के अनुसार, बढ़ते खर्च और व्यवस्थागत सुधार के नाम पर यह कदम उठाया गया है।

न्यूज़ देखो: शिक्षा के अधिकार पर चोट

बीएड जैसे प्रोफेशनल कोर्स पर शुल्क में इतनी बड़ी वृद्धि शिक्षा की पहुंच को सीमित कर देती है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला पाएंगे। यह समय है जब सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को पारदर्शी नीति अपनानी चाहिए ताकि शिक्षा सबके लिए सुलभ रह सके।

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शिक्षा सबका अधिकार सबकी जिम्मेदारी

शिक्षा किसी वर्ग या परिवार की ताकत पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। जरूरत है कि समाज और सरकार मिलकर ऐसी नीतियां बनाएं, जिससे हर बच्चा अपने सपनों को पूरा कर सके।

अब वक्त है कि हम सब मिलकर इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाएं। अपनी राय कमेंट करें और इस खबर को शेयर करें ताकि दबाव बने और शिक्षा सभी तक पहुंचे।

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Saroj Verma

दुमका/देवघर

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