
#गिरिडीह #श्रमिक_आंदोलन : फर्जी मुकदमे, प्रदूषण और स्थानीय रोजगार की मांग को लेकर संगठनों का प्रतिवाद।
गिरिडीह प्रखंड के त्रुकडीहा गांव में असंगठित मजदूर मोर्चा और भाकपा माले के बैनर तले प्रतिवाद मार्च का आयोजन किया गया। यह मार्च बालमुकुंद स्पांज आयरन कंपनी के प्रभारी द्वारा तीन श्रमिक साथियों पर दर्ज किए गए कथित फर्जी मुकदमे के विरोध में निकाला गया। प्रदर्शनकारियों ने औद्योगिक क्षेत्र में फैल रहे प्रदूषण और स्थानीय मजदूरों की उपेक्षा का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया। आयोजकों ने 17 फरवरी को होने वाले आगामी आंदोलन को निर्णायक बताते हुए व्यापक भागीदारी का आह्वान किया।
- त्रुकडीहा गांव में असंगठित मजदूर मोर्चा व भाकपा माले ने संयुक्त प्रतिवाद मार्च किया।
- बालमुकुंद स्पांज आयरन कंपनी के प्रभारी पर फर्जी मुकदमा दर्ज कराने का आरोप।
- प्रदर्शन के दौरान प्रदूषण फैलाना बंद करो और स्थानीय मजदूरों को रोजगार दो के नारे।
- 75 प्रतिशत स्थानीय मजदूरों को काम देने की प्रमुख मांग दोहराई गई।
- 17 फरवरी को प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर जनभागीदारी बढ़ाने की अपील।
गिरिडीह प्रखंड अंतर्गत त्रुकडीहा गांव रविवार को श्रमिक संगठनों के आक्रोश का केंद्र बना, जब असंगठित मजदूर मोर्चा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) से जुड़े कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर प्रतिवाद मार्च निकाला। यह मार्च बालमुकुंद स्पांज आयरन कंपनी के प्रभारी द्वारा कथित रूप से तीन श्रमिक साथियों पर दर्ज कराए गए फर्जी मुकदमे के खिलाफ आयोजित किया गया। प्रदर्शनकारियों ने इसे मजदूर आंदोलन को दबाने की साजिश करार दिया और न्याय की मांग उठाई।
फर्जी मुकदमे के खिलाफ एकजुटता
प्रतिवाद मार्च के दौरान मजदूरों और ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि श्रमिक हितों की आवाज उठाने वालों को डराने के लिए फर्जी मुकदमे दर्ज कराना निंदनीय है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि असंगठित मजदूर मोर्चा और भाकपा माले से जुड़े तीन साथियों पर लगाया गया आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत है और इसका उद्देश्य कंपनी के खिलाफ उठ रही आवाज को दबाना है।
मार्च के दौरान “फर्जी मुकदमा वापस लो” और “बालमुकुंद स्पांज आयरन कंपनी के प्रभारी हाय हाय” जैसे नारे गूंजते रहे, जिससे इलाके में आंदोलन का माहौल बन गया।
औद्योगिक प्रदूषण पर गंभीर आरोप
प्रतिवाद मार्च का एक अहम मुद्दा औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण भी रहा। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि बालमुकुंद स्पांज आयरन कंपनी के संचालन से आसपास के गांवों में वायु और पर्यावरण प्रदूषण फैल रहा है, जिससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य और खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
ग्रामीणों ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण के नियमों की अनदेखी की जा रही है और स्थानीय प्रशासन इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रहा। मार्च के दौरान “औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण फैलाना बंद करो” के नारे लगाकर इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया।
स्थानीय रोजगार की अनदेखी का मुद्दा
प्रतिवाद मार्च में स्थानीय रोजगार का सवाल भी केंद्र में रहा। मजदूर संगठनों ने मांग की कि कंपनी में कम से कम 75 प्रतिशत स्थानीय मजदूरों को रोजगार दिया जाए। उनका कहना था कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने वाली कंपनियों की यह नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वे आसपास के गांवों के युवाओं और मजदूरों को प्राथमिकता दें।
प्रदर्शनकारियों के अनुसार, बाहरी मजदूरों को प्राथमिकता देकर स्थानीय लोगों को हाशिये पर रखा जा रहा है, जिससे बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है।
17 फरवरी के आंदोलन को लेकर रणनीति
मार्च के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं ने आगामी 17 फरवरी को प्रस्तावित कार्यक्रम को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
कार्यकर्ताओं ने ग्रामीणों से अपील की कि वे बड़ी संख्या में इस कार्यक्रम में हिस्सा लें और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को मजबूती से रखें। आयोजनकर्ताओं का मानना है कि व्यापक जनसमर्थन से ही फर्जी मुकदमों और अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ दबाव बनाया जा सकता है।
ग्रामीणों और नेताओं की सक्रिय भागीदारी
इस प्रतिवाद मार्च में सनातन साहु, सच्चिदानंद उपाध्याय, भरत मल्लाह, हरी दास और मुक्ति दास की सक्रिय उपस्थिति रही। इनके साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण भी मार्च में शामिल हुए और अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया।
ग्रामीणों ने कहा कि वे अपने हक और सम्मान की लड़ाई में पीछे नहीं हटेंगे और जरूरत पड़ने पर आंदोलन को और व्यापक रूप देंगे।
न्यूज़ देखो: मजदूर अधिकार और पर्यावरण का टकराव
त्रुकडीहा का यह प्रतिवाद मार्च एक बार फिर दिखाता है कि औद्योगिक विकास और श्रमिक अधिकारों के बीच संतुलन कितना जरूरी है। फर्जी मुकदमों के आरोप और प्रदूषण जैसे गंभीर सवाल प्रशासन और कंपनी प्रबंधन दोनों की जवाबदेही तय करते हैं। स्थानीय रोजगार की अनदेखी लंबे समय में सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकती है। अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी और कंपनी प्रबंधन इन मांगों पर क्या ठोस कदम उठाते हैं।
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संगठित आवाज ही बदलाव की ताकत
जब मजदूर, किसान और ग्रामीण अपने हक के लिए एकजुट होते हैं, तब बदलाव की राह खुलती है। त्रुकडीहा का यह आंदोलन सिर्फ एक गांव का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिक अधिकार और पर्यावरण सुरक्षा का सवाल है।
सजग नागरिक बनकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ही लोकतंत्र की असली ताकत है। आप भी इस मुद्दे पर सोचें, अपनी राय साझा करें और जागरूकता फैलाने में भूमिका निभाएं। खबर पर कमेंट करें, इसे साझा करें और जिम्मेदार समाज निर्माण में अपनी सहभागिता दर्ज कराएं।



