
#बरवाडीह #मकर_संक्रांति : औरंगा–कोयल नदी संगम पर स्नान-दान के साथ दो दिवसीय मेले की भव्य शुरुआत।
बरवाडीह प्रखंड के केचकी संगम में मकर संक्रांति के अवसर पर श्रद्धा और आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। बुधवार की सुबह औरंगा–कोयल नदी के संगम तट पर हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान कर दान-पुण्य किया। इस अवसर पर प्रतापी राजा मेदिनी राय की स्मृति में आयोजित दो दिवसीय ऐतिहासिक मेले की भी शुरुआत हुई। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक समरसता का यह आयोजन पूरे क्षेत्र के लिए विशेष महत्व रखता है।
- केचकी संगम में अहले सुबह से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी।
- “हर हर गंगे” और “जय सूर्य देव” के जयघोष से भक्तिमय हुआ वातावरण।
- मकर संक्रांति पर पवित्र स्नान और दान-पुण्य की निभाई गई परंपरा।
- राजा मेदिनी राय की स्मृति में दो दिवसीय ऐतिहासिक मेले का आयोजन।
- मेले में तिलकुट, गुड़, लकठो, बदाम की दुकानों पर रही खास रौनक।
- बरवाडीह पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम।
पलामू प्रमंडल के लातेहार जिले अंतर्गत बरवाडीह प्रखंड में मकर संक्रांति का पर्व पूरे हर्षोल्लास और धार्मिक भावना के साथ मनाया गया। केचकी स्थित औरंगा–कोयल नदी के पवित्र संगम तट पर बुधवार की अहले सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया था। ठंड के बावजूद आस्था लोगों को संगम तक खींच लाई और हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने स्नान कर पुण्य अर्जित किया।
संगम तट पर उमड़ी आस्था, गूंजे जयघोष
मकर संक्रांति के दिन संगम में स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। इसी मान्यता के तहत श्रद्धालु दूर-दराज के गांवों और कस्बों से केचकी पहुंचे। संगम तट पर “हर हर गंगे” और “जय सूर्य देव” के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। लोगों ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सुख-समृद्धि, आरोग्य और परिवार की खुशहाली की कामना की। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं में स्नान को लेकर विशेष उत्साह देखा गया।
दान-पुण्य और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व
स्नान के उपरांत श्रद्धालुओं ने तिल, गुड़, चूड़ा, अन्न और वस्त्र का दान किया। संगम तट पर दान-पुण्य करते लोगों की लंबी कतारें नजर आईं। स्थानीय पंडितों की उपस्थिति में विधिवत पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चारण किया गया। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन संगम में स्नान और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालुओं ने परंपरा का पालन किया।
ऐतिहासिक दो दिवसीय मेले की शुरुआत
मकर संक्रांति के साथ ही केचकी संगम में दो दिवसीय ऐतिहासिक मेले का शुभारंभ भी हुआ। यह मेला पलामू के प्रतापी राजा मेदिनी राय की स्मृति में आयोजित किया जाता है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में हर साल पलामू प्रमंडल के विभिन्न हिस्सों से लोग शामिल होते हैं। मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान भी है।
मेले में दिखी ग्रामीण संस्कृति की झलक
मेले में ग्रामीण संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली। संगम तट और आसपास के क्षेत्र में दुकानों की कतारें सज गईं। खासकर तिलकुट, गुड़, लकठो, बदाम और अन्य पारंपरिक मिठाइयों की दुकानों पर भारी भीड़ रही। बच्चों के लिए खिलौनों, झूलों और खेल-तमाशों की दुकानें मेले का मुख्य आकर्षण बनीं। परिवार के साथ आए लोग खरीदारी के साथ-साथ मनोरंजन का भी भरपूर आनंद लेते नजर आए।
प्रशासन की रही सख्त निगरानी
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए बरवाडीह पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। संगम तट, मेला परिसर और प्रमुख मार्गों पर पुलिस बल की तैनाती की गई थी। भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। पुलिस की मौजूदगी के कारण श्रद्धालुओं और मेले में आए लोगों ने बिना किसी परेशानी के पर्व का आनंद लिया।
सामाजिक समरसता का प्रतीक बना आयोजन
स्थानीय लोगों का कहना है कि केचकी संगम पर मकर संक्रांति का यह आयोजन सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यहां विभिन्न वर्गों और समुदायों के लोग एक साथ आकर पर्व मनाते हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़ता है। हर साल बढ़ती भीड़ यह दर्शाती है कि केचकी संगम का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

न्यूज़ देखो: परंपरा और संस्कृति को जीवित रखता केचकी संगम
केचकी संगम में मकर संक्रांति पर उमड़ने वाली भीड़ यह साबित करती है कि यह स्थल आस्था और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। ऐतिहासिक मेला और प्रशासनिक व्यवस्थाएं इस आयोजन को और सशक्त बनाती हैं। ऐसे आयोजनों से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आस्था निभाएं, संस्कृति सहेजें, परंपरा आगे बढ़ाएं
मकर संक्रांति जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।
इन आयोजनों में सहभागिता समाज में एकता और सौहार्द को बढ़ाती है।
आप भी स्थानीय पर्वों और मेलों का हिस्सा बनें और अपनी संस्कृति पर गर्व करें।
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