
#गढ़वा #भाषाई_विवाद : जेटेट में भाषा हटाने पर अभाविप ने उठाए सवाल—नीति पर पुनर्विचार की मांग।
गढ़वा में अभाविप के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य प्रिंस कुमार सिंह ने जेटेट परीक्षा की नई नियमावली में भोजपुरी और मगही भाषा हटाने के फैसले का विरोध किया। उन्होंने इसे क्षेत्रीय छात्रों के साथ अन्याय बताया। अभाविप ने सरकार से नियमावली में संशोधन कर भाषाई समानता सुनिश्चित करने की मांग की है। मुद्दे को लेकर राजनीतिक और छात्र संगठनों में बहस तेज हो गई है।
- प्रिंस कुमार सिंह ने जेटेट नियमावली पर जताई कड़ी आपत्ति।
- भोजपुरी और मगही भाषा हटाने के फैसले का विरोध।
- लाखों छात्रों के भविष्य पर असर की आशंका जताई।
- सरकार पर भाषाई तुष्टिकरण और भेदभाव का आरोप।
- नियमावली में संशोधन कर भाषाओं को शामिल करने की मांग।
गढ़वा में जेटेट (JTET) परीक्षा की नई नियमावली को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अभाविप के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य प्रिंस कुमार सिंह ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड सरकार के फैसले का विरोध किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि नियमावली से भोजपुरी और मगही भाषा को हटाना राज्य के लाखों छात्रों के साथ अन्याय है।
यह मुद्दा अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि क्षेत्रीय असंतोष और भाषाई पहचान से भी जुड़ गया है।
भाषाई निर्णय पर उठे गंभीर सवाल
प्रिंस कुमार सिंह ने कहा कि पलामू प्रमंडल और उत्तरी झारखंड के लाखों लोग भोजपुरी और मगही को अपनी मातृभाषा मानते हैं। इन भाषाओं का उपयोग दैनिक जीवन, संस्कृति और शिक्षा में व्यापक रूप से होता है।
प्रिंस कुमार सिंह ने कहा: “सरकार का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है और यह राज्य के लोगों के साथ विश्वासघात के समान है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला भाषाई विभाजन को बढ़ावा देने वाला है।
छात्रों के भविष्य पर असर
अभाविप नेता ने कहा कि इस निर्णय का सबसे अधिक असर उन छात्रों पर पड़ेगा, जो भोजपुरी और मगही भाषी हैं। उनका मानना है कि इन भाषाओं को हटाने से हजारों छात्र जेटेट परीक्षा से वंचित हो सकते हैं।
उन्होंने कहा: “यह निर्णय छात्रों की योग्यता को कुचलने वाला है और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है।”
इससे शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर की अवधारणा पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सरकार पर भेदभाव का आरोप
प्रिंस कुमार सिंह ने सरकार पर क्षेत्र विशेष के साथ सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य गठन के समय भाषाई विविधता को बढ़ावा देने का वादा किया गया था, लेकिन अब उसी के विपरीत निर्णय लिए जा रहे हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार अपनी नीतिगत विफलताओं को छिपाने के लिए भाषा के मुद्दे को उभार रही है।
अभाविप की मांग
अभाविप ने सरकार से मांग की है कि—
- जेटेट की नई नियमावली में भोजपुरी और मगही भाषा को तुरंत शामिल किया जाए
- राज्य स्तर पर सभी स्थानीय भाषाओं को समान मान्यता दी जाए
प्रिंस कुमार सिंह ने कहा: “भाषा के आधार पर भेदभाव किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन भाषाई समानता के लिए संघर्ष जारी रखेगा।
बढ़ सकता है आंदोलन
इस मुद्दे को लेकर छात्र संगठनों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। यदि सरकार ने इस पर जल्द निर्णय नहीं लिया, तो विरोध प्रदर्शन और आंदोलन तेज हो सकता है।
न्यूज़ देखो: भाषा का सवाल या राजनीति का मुद्दा?
गढ़वा में उठी यह आवाज यह संकेत देती है कि भाषा का मुद्दा अब संवेदनशील राजनीतिक विषय बनता जा रहा है। जहां एक ओर सरकार नीति बना रही है, वहीं दूसरी ओर छात्र संगठनों का विरोध भी बढ़ रहा है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय ले। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अपनी भाषा, अपनी पहचान—जागरूक बनें
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति का आधार है।
जरूरी है कि हम अपनी भाषाओं के सम्मान के लिए जागरूक रहें।
छात्रों को चाहिए कि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें और सकारात्मक तरीके से अपनी बात रखें।
एकजुट प्रयास से ही सही बदलाव संभव है।
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