
#विश्रामपुर #पलामू #आरटीई_विवाद : हल्का कर्मचारी पर गरीब बच्चों का नामांकन रोकने और दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप।
पलामू जिले के विश्रामपुर अंचल में आरटीई के तहत नामांकन प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। हल्का नंबर 6 के अंचल कर्मचारी पर आरोप है कि आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावकों के बच्चों का नामांकन बिना स्पष्ट कारण के रोका जा रहा है। मामले में कई अभिभावकों ने प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है। यह प्रकरण शिक्षा के अधिकार जैसे संवेदनशील विषय से जुड़ा होने के कारण स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
- विश्रामपुर अंचल के हल्का नंबर 6 में आरटीई नामांकन को लेकर विवाद।
- अंचल कर्मचारी बिजय चौबे पर अभिभावकों ने लगाए गंभीर आरोप।
- गरीब परिवारों के बच्चों का नामांकन कथित रूप से किया गया रिजेक्ट।
- तीन अभिभावकों की वार्षिक आय 72 हजार रुपये से कम बताई गई।
- अभिभावकों ने पलामू उपायुक्त से जांच की मांग की।
पलामू जिले के विश्रामपुर अंचल क्षेत्र में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत नामांकन प्रक्रिया को लेकर असंतोष और नाराजगी का माहौल बनता नजर आ रहा है। हल्का नंबर 6 के अंचल कर्मचारी बिजय चौबे के क्रियाकलापों से परेशान अभिभावकों ने आरोप लगाया है कि उनके गरीब बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। जिन योजनाओं के माध्यम से सरकार समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना चाहती है, वही योजनाएं जमीनी स्तर पर बाधित होती दिख रही हैं।
आरटीई के तहत नामांकन में बाधा का आरोप
अभिभावकों का कहना है कि आरटीई के माध्यम से उनके बच्चों का नामांकन होना चाहिए था, लेकिन अंचल कर्मचारी द्वारा बार-बार दस्तावेजों और आय से संबंधित आपत्तियां लगाकर प्रक्रिया को लटकाया गया। आरोप है कि सभी आवश्यक कागजात होने के बावजूद बच्चों के आवेदन खारिज कर दिए गए।
स्थानीय लोगों के अनुसार, कई अभिभावक मजबूरी में अंचल कार्यालय के चक्कर काटते रहे। उनका कहना है कि गरीब परिवारों के लिए यह प्रक्रिया पहले से ही कठिन होती है, और जब सरकारी कर्मचारी सहयोग न करें तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
अभिभावकों की आर्थिक स्थिति का हवाला
मामले में सामने आए अभिभावकों ने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। जानकारी के अनुसार:
- धर्मेंद्र तिवारी (तोला-तोलरा), जो 5000 रुपये प्रतिमाह पर गार्ड की नौकरी करते हैं।
- मुकेश तिवारी (तोला-तोलरा), जो 3600 रुपये प्रतिमाह ट्यूशन पढ़ाकर जीविकोपार्जन करते हैं।
- रविरंजन तिवारी (तोला-तोलरा), जो एक संवेदक के पास 3500 रुपये प्रतिमाह पर हेल्परी का काम करते हैं।
इन तीनों अभिभावकों की वार्षिक आय लगभग 72 हजार रुपये से कम बताई गई है, जो आरटीई के मानकों के अनुसार पात्रता की श्रेणी में आती है। इसके बावजूद, आरोप है कि नामांकन प्रक्रिया को बिना स्पष्ट कारण के रोक दिया गया।
दुर्व्यवहार और अभद्रता के आरोप
अभिभावकों का आरोप है कि नामांकन को लेकर जब वे कर्मचारी से अनुरोध करने पहुंचे, तो उनके साथ अभद्र और अपमानजनक व्यवहार किया गया। कुछ लोगों का कहना है कि कर्मचारियों का रवैया इतना कठोर था कि मजबूरी में अभिभावकों को गिड़गिड़ाना पड़ा, जो समाज में सरकारी तंत्र की छवि पर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय लोगों ने बताया कि इस प्रकार का व्यवहार न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता के भी विपरीत है। शिक्षा जैसे विषय में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
नामांकन रिजेक्ट होने से भविष्य पर संकट
आरटीई के तहत नामांकन न होने से इन गरीब परिवारों के बच्चों का भविष्य संकट में पड़ता नजर आ रहा है। निजी स्कूलों की फीस वहन करना इन परिवारों के लिए संभव नहीं है। ऐसे में यदि सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला, तो बच्चों की पढ़ाई बाधित होने की आशंका है।
अभिभावकों का कहना है कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर जीवन में आगे बढ़ें और गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलें। लेकिन वर्तमान स्थिति में उनकी उम्मीदें टूटती दिखाई दे रही हैं।
उपायुक्त से जांच की मांग
मामले को लेकर पीड़ित अभिभावकों ने पलामू उपायुक्त से मुलाकात कर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने का आग्रह करने की बात कही है। उन्होंने मांग की है कि आरटीई नामांकन प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं की जांच हो और दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मी के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
साथ ही यह भी मांग की गई है कि पात्र बच्चों का नामांकन जल्द से जल्द सुनिश्चित किया जाए, ताकि उनका शैक्षणिक सत्र बर्बाद न हो।
प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठे सवाल
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा अंतर है। यदि आरटीई जैसी महत्वाकांक्षी योजना में पारदर्शिता और संवेदनशीलता नहीं होगी, तो इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाएगा।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि प्रशासन को ऐसे मामलों में त्वरित हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी गरीब बच्चे की शिक्षा बाधित न हो।

न्यूज़ देखो: शिक्षा के अधिकार की कसौटी पर प्रशासन
विश्रामपुर का यह मामला आरटीई जैसी सामाजिक न्याय आधारित योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि पात्र अभिभावकों को बार-बार चक्कर लगाना पड़े, तो योजना का उद्देश्य ही विफल हो जाता है। प्रशासन को न केवल जांच करनी चाहिए, बल्कि व्यवस्था में सुधार भी सुनिश्चित करना होगा। शिक्षा अधिकार है, एहसान नहीं—यह भावना जमीन पर दिखनी चाहिए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना हम सबकी जिम्मेदारी
गरीब बच्चों की शिक्षा से बड़ा कोई सामाजिक सरोकार नहीं।
सरकारी योजनाएं तभी सफल होंगी, जब उनका लाभ सही हाथों तक पहुंचे।
प्रशासन को संवेदनशीलता और पारदर्शिता दिखानी होगी।
अगर आप भी ऐसे मामलों से रूबरू हुए हैं, तो अपनी बात सामने रखें।
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