#चैनपुर #भूमि_विवाद : लंबित केस के बीच डिमांड ट्रांसफर को लेकर प्रशासन पर आरोप।
पलामू के चैनपुर अंचल में विवादित 29 एकड़ भूमि को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहने के बावजूद रजिस्टर-2 से नाम हटाकर डिमांड ट्रांसफर किए जाने की बात कही जा रही है। आरोपों में सर्कल ऑफिसर पर नियमों की अनदेखी और बिना न्यायालय आदेश कार्रवाई का जिक्र है। मामले ने स्थानीय प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- मोजा किनी व मथुरादोहरी की कुल लगभग 29 एकड़ भूमि विवाद के केंद्र में।
- भूमि से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने का दावा।
- रजिस्टर-2 से सीता साव का नाम हटाकर डिमांड ट्रांसफर का आरोप।
- बिना LPC और वारिसों को नोटिस दिए प्रक्रिया चलने की शिकायत।
- अंचल कार्यालय चैनपुर व सर्कल ऑफिसर की भूमिका पर उठे सवाल।
पलामू जिले के चैनपुर अंचल क्षेत्र में विवादित भूमि को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक विवाद सामने आया है। आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित भूमि मामले के बावजूद संबंधित जमीन का डिमांड ट्रांसफर कर दिया गया, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। इस प्रकरण ने क्षेत्र में भूमि प्रबंधन व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
विवादित भूमि का विवरण और रजिस्टर-2 में दर्ज नाम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मोजा किनी (थाना संख्या–50, खाता संख्या–41, रकबा 5.50 एकड़) तथा मोजा मथुरादोहरी (थाना संख्या–46, खाता संख्या–1, 4, 6, रकबा लगभग 24 एकड़) की कुल करीब 29 एकड़ भूमि वर्षों से रजिस्टर–2 में सीता साव एवं भगवान साव के नाम से चल रही थी।
आरोप लगाने वाले पक्ष का कहना है कि उक्त भूमि लंबे समय से विवादित है और इस संबंध में न्यायिक प्रक्रिया भी जारी है। इसके बावजूद नाम हटाकर दूसरे व्यक्ति के पक्ष में डिमांड ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है, जो प्रशासनिक नियमों के अनुपालन पर सवाल खड़ा करता है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के बावजूद कार्रवाई का आरोप
जानकारी के अनुसार, भूमि विवाद से जुड़ा मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित बताया जा रहा है, जिसका क्यूरिटी पिटीशन डेयरी नंबर–30028/2025 बताया गया है। आरोप है कि यह मामला माननीय चीफ जस्टिस के समक्ष विचाराधीन है।
आरोपकर्ताओं का कहना है कि जब मामला न्यायालय में लंबित था, तब बिना न्यायालय के स्पष्ट आदेश के डिमांड ट्रांसफर किया जाना गंभीर प्रशासनिक प्रक्रिया का उल्लंघन माना जा सकता है। इस मुद्दे को लेकर स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक जवाबदेही की मांग तेज हो गई है।
पूर्व में अधिकारियों को दी गई थी लिखित सूचना
बताया गया है कि इस भूमि को विवादित बताते हुए पूर्व में सर्कल ऑफिसर, संबंधित हल्का कर्मचारी तथा पलामू के उपायुक्त को लिखित रूप से सूचना दी गई थी। आवेदन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि मामला न्यायालय में लंबित है, इसलिए बिना कोर्ट आदेश किसी भी प्रकार का डिमांड ट्रांसफर नहीं किया जाए।
इसके अतिरिक्त, आरोप है कि इस विषय की जानकारी राज्य सरकार और मुख्यमंत्री कार्यालय को भी दी गई थी, ताकि प्रशासनिक स्तर पर सतर्कता बरती जा सके। बावजूद इसके कथित रूप से डिमांड ट्रांसफर की प्रक्रिया आगे बढ़ने का आरोप लगाया गया है।
बिना LPC और नोटिस के रजिस्ट्री प्रक्रिया पर भी सवाल
मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि मेदिनीनगर रजिस्ट्री कार्यालय में बिना LPC (Land Possession Certificate) तथा सीता साव के वारिसों को नोटिस दिए बिना भूमि बिक्री की प्रक्रिया जारी रखी गई।
यदि यह आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह राजस्व एवं भूमि हस्तांतरण से जुड़े नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से भूमि विवाद और जटिल हो सकता है तथा न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ जाती है।
सर्कल ऑफिसर पर मिलीभगत के आरोप, जांच की मांग तेज
आरोप लगाने वाले पक्ष ने सर्कल ऑफिसर पर कथित रूप से भू-माफियाओं के साथ मिलीभगत कर डिमांड ट्रांसफर करने का गंभीर आरोप लगाया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि इस मामले में भारी राशि और बाहरी दबाव की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
आरोपकर्ताओं ने मुख्यमंत्री से सोशल मीडिया के माध्यम से हस्तक्षेप करने और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल भूमि विवाद का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और कानून व्यवस्था से जुड़ा विषय भी है।
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल, स्थानीय स्तर पर बढ़ी चर्चा
मामले के सामने आने के बाद चैनपुर अंचल क्षेत्र में प्रशासन की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि न्यायालय में मामला लंबित है, तो किसी भी प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई अत्यंत सावधानी और विधिक प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए।
फिलहाल प्रशासन की ओर से इस आरोप पर आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन मामले ने राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। जांच के बाद ही पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
न्यूज़ देखो: न्यायिक प्रक्रिया के बीच प्रशासनिक कार्रवाई पर बड़ा प्रश्न
चैनपुर का यह मामला बताता है कि भूमि विवाद और प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता कितनी आवश्यक है। यदि सच में न्यायालय में मामला लंबित रहते हुए डिमांड ट्रांसफर हुआ है, तो यह गंभीर प्रशासनिक जांच का विषय बनता है। अब सवाल यह है कि क्या उच्चस्तरीय जांच होगी और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाएगी? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
सच और पारदर्शिता के लिए आवाज उठाना जरूरी
भूमि विवाद जैसे संवेदनशील मामलों में नियमों का पालन सबसे महत्वपूर्ण होता है।
नागरिकों की सजगता ही प्रशासनिक पारदर्शिता को मजबूत बनाती है।
यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता की आशंका हो, तो तथ्य सामने लाना लोकतांत्रिक अधिकार है।
सजग रहें, जागरूक बनें और अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें।
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