
#चैनपुरप्रखंड #शिक्षासंकट : रसोइया हड़ताल के बाद बच्चों से रसोई कार्य कराने का मामला।
चैनपुर प्रखंड के राजकीय उत्क्रमित उच्च विद्यालय भठौली और राजकीयकृत मध्य विद्यालय सिलफरी में मिड-डे मील को लेकर गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। रसोइया संयोजिका के हड़ताल पर जाने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था के बजाय बच्चों से रसोई कार्य कराए जाने के आरोप लगे हैं। मीडिया के पहुंचने पर अफरा-तफरी की स्थिति बनी। विद्यालय प्रबंधन ने आरोपों को सहायता बताया है।
- राजकीय उत्क्रमित उच्च विद्यालय भठौली और राजकीयकृत मध्य विद्यालय सिलफरी में मामला।
- रसोइया संयोजिका के हड़ताल पर जाने के बाद उत्पन्न स्थिति।
- बच्चों से मिड-डे मील बनाने का आरोप।
- मीडिया पहुंचते ही विद्यालय में अफरा-तफरी।
- शिक्षिका नीलप्रभा ने इसे “सहायता” बताया।
चैनपुर प्रखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। सरकार जहां ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ जैसे नारों के जरिए शिक्षा सुधार का दावा करती है, वहीं स्थानीय स्तर पर हालात इसके विपरीत नजर आ रहे हैं। राजकीय उत्क्रमित उच्च विद्यालय भठौली और राजकीयकृत मध्य विद्यालय सिलफरी में मिड-डे मील व्यवस्था के तहत बच्चों से रसोई का कार्य कराए जाने का आरोप लगा है।
रसोइया हड़ताल के बाद वैकल्पिक व्यवस्था नहीं
ताजा जानकारी के अनुसार, रसोइया संयोजिका के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के बाद विद्यालय प्रबंधन ने कोई स्थायी या अस्थायी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की। आरोप है कि इसी दौरान बच्चों को ही रसोई में लगाया गया और उनसे मिड-डे मील तैयार कराया गया।
जिस उम्र में बच्चों को कक्षा में बैठकर पढ़ाई करनी चाहिए, उस समय उन्हें चूल्हे के धुएं के बीच काम करते देखा गया। यह स्थिति शिक्षा के अधिकार और बाल संरक्षण के नियमों पर सवाल खड़े करती है।
मीडिया पहुंची तो मचा हड़कंप
सूत्रों के अनुसार, जब मीडिया की टीम विद्यालय पहुंची तो वहां का दृश्य देख प्रबंधन में हड़कंप मच गया। कैमरे देखते ही बच्चों को तत्काल रसोई घर से बाहर निकाला गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षकों ने बच्चों को मीडिया के सामने कुछ भी बोलने से मना किया। यह घटना पूरे मामले को दबाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। हालांकि इस संबंध में विद्यालय प्रशासन की ओर से आधिकारिक रूप से कोई विस्तृत बयान जारी नहीं किया गया है।
विद्यालय प्रबंधन का पक्ष
मामले पर सफाई देते हुए राजकीयकृत मध्य विद्यालय सिलफरी की शिक्षिका नीलप्रभा ने कहा:
“बच्चों से खाना नहीं बनवाया जा रहा था, बल्कि केवल सहायता ली जा रही थी।”
वहीं भठौली विद्यालय की एक शिक्षिका ने तर्क दिया कि ब्रेक के दौरान बच्चों को केवल कुछ कार्य के लिए बुलाया गया था।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या किसी भी परिस्थिति में बच्चों से रसोई कार्य कराना उचित है, चाहे उसे ‘सहायता’ ही क्यों न कहा जाए।
शिक्षा के अधिकार पर प्रश्नचिह्न
शिक्षा का अधिकार अधिनियम बच्चों को सुरक्षित और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण की गारंटी देता है। विद्यालयों में मिड-डे मील योजना का उद्देश्य बच्चों को पोषण उपलब्ध कराना और उनकी उपस्थिति बढ़ाना है, न कि उन्हें श्रम में लगाना।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता मानी जाएगी।
अभिभावकों और ग्रामीणों में आक्रोश
मामला सामने आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों में असंतोष की स्थिति है। उनका कहना है कि बच्चों को पढ़ाई के समय इस प्रकार के कार्य में लगाना गलत है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिक्षा विभाग और प्रखंड प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है।
न्यूज़ देखो: नारों से नहीं, व्यवस्था से बदलेगी तस्वीर
चैनपुर की यह घटना दिखाती है कि शिक्षा सुधार केवल नारों और योजनाओं से संभव नहीं है। जमीनी स्तर पर निगरानी, जवाबदेही और वैकल्पिक व्यवस्था की तत्परता जरूरी है। यदि रसोइया हड़ताल पर है तो प्रशासन की जिम्मेदारी है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। अब जरूरत है पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाबदेही तय करने की। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
बच्चों का बचपन किताबों के साथ हो, चूल्हे के साथ नहीं
हर बच्चे को सुरक्षित और सम्मानजनक शिक्षा का अधिकार है।
हमारी चुप्पी कई बार गलत परंपराओं को बढ़ावा देती है।
आइए, बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूक बनें और गलत को गलत कहने का साहस रखें।
यदि आपके आसपास भी शिक्षा से जुड़ी कोई अनियमितता है, तो आवाज उठाएं। अपनी राय कमेंट में साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए साथ खड़े हों।






