#भारत #राजनीति : दो प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना में उपलब्धियां, चुनौतियां, विवाद और राष्ट्रीय घटनाएं प्रमुख चर्चा का विषय रहीं।
- डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी ने अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में देश का नेतृत्व किया।
- मनमोहन सरकार के दौरान 2जी, कॉमनवेल्थ और कोयला आवंटन जैसे विवाद चर्चा में रहे।
- मोदी सरकार के कार्यकाल में राफेल, चुनावी बॉन्ड और पेगासस जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने सवाल उठाए।
- दोनों कार्यकालों में देश ने कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं और राष्ट्रीय संकटों का सामना किया।
- एक दौर को अधिकार आधारित कानूनों के लिए याद किया जाता है, तो दूसरे को डिजिटल और बुनियादी ढांचा विकास के लिए।
भारत की राजनीति में पिछले दो दशकों की सबसे चर्चित बहसों में से एक पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तुलना है। दोनों नेताओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में देश की कमान संभाली और अपनी-अपनी नीतियों तथा निर्णयों के माध्यम से देश की दिशा तय करने का प्रयास किया। इसलिए उनके कार्यकाल का मूल्यांकन केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि नीतिगत प्रभाव, प्रशासनिक निर्णयों और जनता पर पड़े असर के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
मंत्रिपरिषद और शासन शैली
डॉ. मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्षों में केंद्र सरकार में लगभग 78 मंत्री थे। वहीं नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में मंत्रिपरिषद का आकार लगभग 72 सदस्यों का रहा। हालांकि दोनों सरकारों की कार्यशैली में स्पष्ट अंतर देखने को मिला। मनमोहन सिंह का कार्यकाल गठबंधन राजनीति के दबावों से प्रभावित रहा, जबकि नरेंद्र मोदी को लंबे समय तक अपेक्षाकृत मजबूत केंद्रीय नेतृत्व का लाभ मिला।
विवाद और कथित घोटाले
मनमोहन सिंह सरकार के दौरान कई बड़े विवाद सामने आए। इनमें 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामला, कॉमनवेल्थ गेम्स विवाद, कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) और आदर्श हाउसिंग सोसायटी प्रकरण प्रमुख रहे। इन मामलों ने सरकार की छवि को प्रभावित किया। हालांकि बाद में कई मामलों में अदालतों ने आरोपियों को राहत दी और कई मामलों में दोष सिद्ध नहीं हो सका। इसलिए इन घटनाओं को राजनीतिक आरोपों और न्यायिक निष्कर्षों के बीच अंतर करते हुए देखना आवश्यक है।
दूसरी ओर नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान भी कई मुद्दों पर विपक्ष ने सवाल उठाए। राफेल लड़ाकू विमान सौदा, चुनावी बॉन्ड योजना, पेगासस जासूसी विवाद, कोविड-19 प्रबंधन तथा कुछ कारोबारी समूहों को कथित लाभ पहुंचाने जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस का केंद्र बने। सरकार ने इन आरोपों को लगातार खारिज किया और कई मामलों में न्यायिक स्तर पर कोई दोषसिद्धि नहीं हुई। इसलिए इन मामलों को भी राजनीतिक विवाद और स्थापित अपराध के रूप में अलग-अलग समझना जरूरी है।
मंत्रियों पर आपराधिक मामलों की चर्चा
2024 में शपथ लेने वाली मोदी सरकार के मंत्रियों में से लगभग 39 प्रतिशत मंत्रियों ने अपने चुनावी हलफनामों में किसी न किसी आपराधिक मामले का उल्लेख किया था। हालांकि भारतीय कानून के अनुसार किसी व्यक्ति पर मामला दर्ज होना और अदालत द्वारा दोषी ठहराया जाना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए केवल मामलों की संख्या के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता।
बड़े हादसे और राष्ट्रीय संकट
डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में देश ने कई गंभीर आपदाओं और संकटों का सामना किया। 2004 की हिंद महासागर सुनामी स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में गिनी जाती है। इसके अलावा 2005 की मुंबई बाढ़, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, 2010 का लद्दाख बादल फटना और 2013 की उत्तराखंड आपदा जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया।
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 2014 की जम्मू-कश्मीर बाढ़, चक्रवात हुदहुद, 2020 की कोविड-19 महामारी, 2021 की दूसरी कोविड लहर, 2023 की ओडिशा रेल दुर्घटना तथा विभिन्न राज्यों में बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं प्रमुख रहीं। कोविड-19 महामारी विशेष रूप से स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में से एक मानी जाती है।
प्रमुख उपलब्धियां
डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में सूचना का अधिकार (RTI), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), शिक्षा का अधिकार कानून, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून तथा आधार परियोजना की शुरुआत को महत्वपूर्ण माना जाता है। इन योजनाओं ने सामाजिक सुरक्षा और अधिकार आधारित शासन की अवधारणा को मजबूत किया।
वहीं नरेंद्र मोदी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में वस्तु एवं सेवा कर (GST), आधार को कानूनी दर्जा, डिजिटल भुगतान प्रणाली का विस्तार, प्रधानमंत्री जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, नए आपराधिक कानूनों का क्रियान्वयन तथा बड़े पैमाने पर सड़क, रेल और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का विकास शामिल है।
अलग-अलग परिस्थितियां, अलग-अलग चुनौतियां
दोनों प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उनके सामने मौजूद चुनौतियां और राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं। मनमोहन सिंह को गठबंधन सरकार का नेतृत्व करना पड़ा, जबकि नरेंद्र मोदी को अपेक्षाकृत मजबूत बहुमत प्राप्त रहा। ऐसे में दोनों सरकारों के निर्णयों और परिणामों को उनके राजनीतिक संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।
डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल आर्थिक उदारीकरण की निरंतरता, सामाजिक अधिकारों से जुड़े कानूनों और संस्थागत सुधारों के लिए याद किया जाता है। वहीं नरेंद्र मोदी का दौर केंद्रीकृत निर्णयों, डिजिटल शासन, कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार और बड़े बुनियादी ढांचा निवेश के लिए जाना जाता है।
घोटालों, आरोपों और राजनीतिक विवादों की चर्चा दोनों दौर में हुई, लेकिन किसी भी सरकार का निष्पक्ष मूल्यांकन केवल आरोपों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए न्यायिक निष्कर्ष, नीतियों का दीर्घकालिक प्रभाव, प्रशासनिक क्षमता और आम जनता के जीवन पर पड़े वास्तविक असर को भी समान महत्व देना आवश्यक है।


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