Dumka

पेयजल संकट और सोहराय सामग्री की मांग पर फूटा आक्रोश, कुश्चिरा में महिलाओं ने किया हाइवे जाम

#दुमका #जनआंदोलन : गोबिंदपुर–साहिबगंज स्टेट हाइवे पर आदिवासी टोला की महिलाओं ने पेयजल व पर्व संबंधी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।

दुमका जिले के कुश्चिरा गांव में पेयजल संकट और सोहराय पर्व से जुड़ी मांगों को लेकर आदिवासी टोला की महिलाओं का आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा। गोबिंदपुर–साहिबगंज स्टेट हाइवे पर कोयला ढुलाई में लगी हाइवा गाड़ियों को करीब एक घंटे तक रोक दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से जलमीनार और चापानल खराब हैं, जिससे जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। प्रशासन के आश्वासन के बाद जाम हटाया गया, लेकिन चेतावनी दी गई कि समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन उग्र होगा।

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  • कुश्चिरा गांव में पेयजल संकट को लेकर आदिवासी टोला की महिलाओं का प्रदर्शन।
  • गोबिंदपुर–साहिबगंज स्टेट हाइवे पर कोयला ढुलाई की हाइवा गाड़ियां रोकी गईं।
  • जल मीनार, सोलर जलमीनार और चार चापानल लंबे समय से खराब।
  • सोहराय पर्व के लिए कपड़ा और सर्फ उपलब्ध कराने की मांग।
  • प्रशासनिक आश्वासन के बाद जाम हटा, उग्र आंदोलन की चेतावनी बरकरार।

दुमका जिले में बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी एक बार फिर जनआक्रोश का कारण बन गई। गोबिंदपुर–साहिबगंज स्टेट हाइवे पर स्थित कुश्चिरा गांव के आदिवासी टोला की महिलाओं ने पेयजल सुविधा और सोहराय पर्व से जुड़ी मांगों को लेकर सड़क जाम कर दिया। प्रदर्शन के कारण कोयला ढुलाई में लगी हाइवा गाड़ियों की आवाजाही करीब एक घंटे तक पूरी तरह ठप रही। इस दौरान सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई।

लंबे समय से पेयजल संकट से जूझ रहा टोला

प्रदर्शन कर रही महिलाओं का कहना है कि गांव में स्थित जल मीनार और सोलर जलमीनार लंबे समय से बंद पड़े हैं। इसके अलावा चार चापानल भी खराब हैं, जिनकी मरम्मत के लिए कई बार संबंधित विभागों से शिकायत की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों के अनुसार, पूरे आदिवासी टोला की आबादी फिलहाल सिर्फ एक चापानल के भरोसे है, जिससे पानी भरने के लिए महिलाओं और बच्चों को घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। गर्मी और बढ़ती जरूरतों के बीच यह स्थिति रोजमर्रा के जीवन को बेहद कठिन बना रही है।

सोहराय पर्व से जुड़ी मांगों ने बढ़ाया आक्रोश

पेयजल संकट के साथ-साथ प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने सोहराय पर्व को लेकर भी अपनी मांगें रखीं। उनका कहना है कि आदिवासी समाज का यह महत्वपूर्ण पर्व नजदीक है, लेकिन अब तक सरकार या प्रशासन की ओर से कपड़ा और सर्फ जैसी बुनियादी सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई है।
महिलाओं का कहना है कि हर साल पर्व के अवसर पर मिलने वाली सहायता इस बार नहीं मिलने से समुदाय में नाराजगी है, और यही नाराजगी सड़क पर उतरकर प्रदर्शन का कारण बनी।

हाइवे जाम से ठप हुई कोयला ढुलाई

महिलाओं ने प्रदर्शन के दौरान गोबिंदपुर–साहिबगंज स्टेट हाइवे पर कोयला ढुलाई में लगी हाइवा गाड़ियों को रोक दिया। इससे न केवल कोयला परिवहन प्रभावित हुआ, बल्कि आम यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
हालांकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन महिलाओं का आक्रोश साफ झलक रहा था। वे प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जल्द समाधान की मांग कर रही थीं।

प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद हटा जाम

हाइवे जाम की सूचना मिलने पर स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने प्रदर्शन कर रही महिलाओं और ग्रामीणों से बातचीत की और उनकी समस्याएं सुनीं।
प्रशासन की ओर से पेयजल व्यवस्था को शीघ्र दुरुस्त करने और सोहराय पर्व से जुड़ी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया गया। इसके बाद ग्रामीणों ने करीब एक घंटे बाद जाम हटा लिया और यातायात सामान्य हो सका।

चेतावनी बरकरार, आंदोलन उग्र करने का अल्टीमेटम

हालांकि प्रशासनिक आश्वासन के बाद जाम समाप्त कर दिया गया, लेकिन ग्रामीणों की चेतावनी अभी भी बरकरार है। उनका कहना है कि यदि तय समय के भीतर जल मीनार, सोलर जलमीनार और चापानलों की मरम्मत नहीं हुई और पर्व संबंधी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा कि अब केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा, जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए।

न्यूज़ देखो: बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी बन रही आंदोलन की वजह

यह घटना बताती है कि जब बुनियादी जरूरतें लंबे समय तक अनदेखी का शिकार होती हैं, तो जनआक्रोश सड़कों पर आना तय है। पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा और सांस्कृतिक पर्वों से जुड़ी मांगें किसी भी समुदाय के लिए अत्यंत संवेदनशील मुद्दे होते हैं। प्रशासन के लिए यह जरूरी है कि आश्वासन से आगे बढ़कर समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करे, ताकि हालात दोबारा न बिगड़ें। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

पानी और सम्मान दोनों जरूरी—अब कार्रवाई की बारी

पेयजल केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी आवश्यकता है।
जब गांव की महिलाएं सड़क पर उतरती हैं, तो यह सिस्टम के लिए गंभीर चेतावनी होती है।
अब समय है कि प्रशासन संवेदनशीलता दिखाए और ठोस कदम उठाए।
आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं, अपनी राय कमेंट में साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और ग्रामीणों की आवाज को मजबूती दें।

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Saroj Verma

दुमका/देवघर

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