
#गिरिडीह #बैंक_हड़ताल : पांच दिवसीय कार्य सप्ताह की मांग को लेकर UFBU के आह्वान पर पूर्ण बंद।
पांच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह लागू करने की मांग को लेकर 27 जनवरी 2026 को गिरिडीह जिले में बैंककर्मियों की अखिल भारतीय एक दिवसीय हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिला। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के आह्वान पर सरकारी और निजी बैंकों की सभी शाखाएं पूरी तरह बंद रहीं। बैंक परिसरों के बाहर कर्मचारियों ने प्रदर्शन कर केंद्र सरकार से लंबित मांगों पर शीघ्र निर्णय की मांग की। हड़ताल से आम ग्राहकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा।
- 27 जनवरी 2026 को गिरिडीह में सभी सरकारी और निजी बैंक पूरी तरह बंद रहे।
- हड़ताल का आह्वान यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने किया।
- जिले के सार्वजनिक क्षेत्र, क्षेत्रीय ग्रामीण, सहकारी और निजी बैंक प्रभावित।
- बैंक परिसरों के बाहर धरना-प्रदर्शन और नारेबाजी की गई।
- आंदोलन में महिला बैंककर्मियों की सक्रिय भागीदारी रही।
- लगभग 8 लाख बैंककर्मी देशभर में हड़ताल में शामिल होने का दावा।
पांच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह लागू करने की मांग को लेकर मंगलवार को गिरिडीह जिले में बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह ठप रही। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) के राष्ट्रव्यापी आह्वान के तहत जिले के सभी सरकारी, निजी, क्षेत्रीय ग्रामीण और सहकारी बैंक बंद रहे। बैंक बंद रहने के कारण लेन-देन, चेक क्लीयरेंस, नकद जमा-निकासी और अन्य जरूरी सेवाएं प्रभावित रहीं, जिससे आम नागरिकों, व्यापारियों और बुजुर्ग ग्राहकों को काफी परेशानी हुई।
जिलेभर में ठप रहा बैंकिंग कामकाज
हड़ताल के चलते न केवल बैंक शाखाएं बंद रहीं, बल्कि कई बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों में भी कामकाज पूरी तरह ठप रहा। सुबह से ही बैंक परिसरों के बाहर बैंककर्मी और अधिकारी एकत्र होकर धरने पर बैठे और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। गिरिडीह शहर के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी बैंक बंद रहने का असर साफ दिखाई दिया।
ग्राहक सुबह से बैंकों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन शाखाओं पर ताले लटके मिले। कई ग्राहकों को एटीएम और डिजिटल माध्यमों पर निर्भर रहना पड़ा, हालांकि नकदी संकट की स्थिति भी कुछ जगहों पर देखी गई।
महिला बैंककर्मियों की सक्रिय भागीदारी
इस हड़ताल की एक अहम विशेषता यह रही कि प्रदर्शन में महिला बैंककर्मियों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। महिला कर्मियों ने भी धरना स्थल पर मौजूद रहकर अपनी मांगों को मजबूती से उठाया और कार्य-जीवन संतुलन को लेकर सरकार की नीति पर सवाल खड़े किए।
क्यों उठ रही है पांच दिवसीय सप्ताह की मांग
बैंक यूनियनों का कहना है कि देश के कई प्रमुख संस्थानों में पहले से ही पांच दिवसीय कार्य सप्ताह लागू है। इनमें रिजर्व बैंक, नाबार्ड, सेबी, बीमा क्षेत्र, आईटी कंपनियां, सार्वजनिक उपक्रम और यहां तक कि न्यायालय भी शामिल हैं। ऐसे में वाणिज्यिक बैंकों को इससे वंचित रखना कर्मचारियों के साथ भेदभाव है।
यूनियन नेताओं ने इसे बैंककर्मियों के स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और कार्य-जीवन संतुलन के खिलाफ बताया। उनका कहना है कि लगातार बढ़ते कार्यभार और स्टाफ की कमी के कारण बैंककर्मी पहले ही दबाव में काम कर रहे हैं।
लिखित समझौते के बावजूद लागू नहीं हुआ निर्णय
बैंक यूनियनों ने खास तौर पर इस बात पर नाराजगी जताई कि 8 मार्च 2024 को इंडियन बैंक एसोसिएशन और UFBU के बीच पांच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह को लेकर लिखित समझौता हुआ था। इसके बावजूद अब तक यह व्यवस्था लागू नहीं की गई।
यूनियनों का आरोप है कि पिछले करीब 22 महीनों से यह मामला केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित बताकर टाला जा रहा है। यूनियन नेताओं के अनुसार, पिछले दो महीनों से चरणबद्ध आंदोलन चलाए जा रहे थे, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं होने के कारण मजबूरी में हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा।
सरकार को दी आंदोलन तेज करने की चेतावनी
हड़ताल के दौरान यूनियन नेताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द पांच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह पर फैसला नहीं लिया, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भविष्य में होने वाले किसी भी बड़े आंदोलन की जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार की होगी।
ग्राहकों से मांगा सहयोग
बैंककर्मियों ने हड़ताल के कारण ग्राहकों को हुई असुविधा के लिए खेद जताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि आम लोग उनकी जायज मांगों को समझेंगे और भविष्य में भी बैंककर्मियों के आंदोलन का समर्थन करेंगे। यूनियनों का कहना है कि यह लड़ाई केवल कर्मचारियों की नहीं, बल्कि बेहतर और संतुलित बैंकिंग व्यवस्था की भी है।
आंदोलन में ये रहे प्रमुख चेहरे
इस आंदोलन में पवन कुमार बरनवाल, दीपक कुमार, दिलीप कुमार, बेंजामिन मुर्मू, देव राज आनंद, जुबेर आलम, अजय आनंद और सिखा सिंह सहित बड़ी संख्या में बैंककर्मी और यूनियन पदाधिकारी मौजूद रहे।
न्यूज़ देखो: लंबित फैसलों की कीमत जनता क्यों चुकाए
गिरिडीह में बैंक हड़ताल ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लिखित समझौते के बावजूद फैसले लागू क्यों नहीं हो पा रहे हैं। बैंककर्मियों की मांगें लंबे समय से लंबित हैं और इसका असर सीधे आम ग्राहकों पर पड़ रहा है। यदि समय रहते सरकार निर्णय नहीं लेती, तो ऐसे आंदोलन बार-बार बैंकिंग व्यवस्था को बाधित करेंगे। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
संतुलित कार्य संस्कृति से ही मजबूत होगा बैंकिंग तंत्र
बैंककर्मी दिन-रात देश की आर्थिक व्यवस्था को संभालते हैं।
उनका स्वास्थ्य और कार्य-जीवन संतुलन भी उतना ही जरूरी है।
इस खबर पर अपनी राय साझा करें, इसे आगे बढ़ाएं और जिम्मेदार फैसलों की मांग को मजबूत करें।
आपकी आवाज ही नीतियों को बदलने की ताकत बन सकती है।



