
#बरवाडीह #स्वास्थ्य_संकट : गंभीर मरीज से एंबुलेंस के लिए डीजल मांगने का आरोप।
बरवाडीह के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक गंभीर मरीज को रेफर किए जाने के बाद एंबुलेंस सुविधा के लिए डीजल राशि मांगे जाने का मामला सामने आया है। उक्कामाड़ पंचायत निवासी राजू राम को ब्रेन हेमरेज की शिकायत पर डाल्टनगंज भेजा जाना था। परिजनों के अनुसार अस्पताल प्रबंधन ने डीजल की व्यवस्था स्वयं करने को कहा। घटना ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
- उक्कामाड़ पंचायत निवासी राजू राम को ब्रेन हेमरेज के बाद सीएचसी लाया गया।
- चिकित्सकों ने गंभीर स्थिति देख मरीज को डाल्टनगंज रेफर किया।
- परिजनों का आरोप – एंबुलेंस भेजने से पहले डीजल राशि की मांग की गई।
- करीब एक घंटे तक मरीज अस्पताल परिसर में परेशान रहा।
- जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने निजी खर्च से 600 रुपये डीजल दिलाया।
बरवाडीह प्रखंड मुख्यालय स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र एक बार फिर विवादों में है। शनिवार सुबह उक्कामाड़ पंचायत अंतर्गत पैरा गांव निवासी 45 वर्षीय राजू राम को अचानक ब्रेन हेमरेज की शिकायत के बाद परिजन तत्काल सीएचसी लेकर पहुंचे। प्राथमिक जांच के बाद चिकित्सकों ने मरीज की हालत गंभीर बताते हुए बेहतर उपचार के लिए डाल्टनगंज रेफर कर दिया। इसके बाद शुरू हुई एंबुलेंस व्यवस्था की जद्दोजहद ने स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए।
108 सेवा नहीं पहुंची, दूसरी एंबुलेंस पर विवाद
परिजनों के अनुसार रेफरल के बाद सबसे पहले 108 एंबुलेंस सेवा पर कॉल किया गया। टीम की ओर से बताया गया कि संबंधित एंबुलेंस खराब है और मनिका से वाहन भेजा जाएगा। इस बीच मरीज की हालत लगातार बिगड़ती रही। समय बीतने के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती गई।
मरीज के साथ आए लोगों ने अस्पताल परिसर में मौजूद दूसरी एंबुलेंस से मरीज को भेजने की मांग की। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन की ओर से कहा गया कि वाहन उपलब्ध है, लेकिन डीजल की व्यवस्था परिजनों को स्वयं करनी होगी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह मांग अतिरिक्त बोझ बन गई।
परिजनों का आक्रोश और हंगामा
डीजल राशि की व्यवस्था न कर पाने की स्थिति में जब एंबुलेंस भेजने से इंकार किया गया, तो परिजनों और स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया। अस्पताल परिसर में हंगामे जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। लोगों ने सवाल उठाया कि जब सरकारी एंबुलेंस सेवा मुफ्त बताई जाती है, तो मरीजों से डीजल की मांग क्यों की जा रही है।
प्रभारी चिकित्सा अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास भी किया गया, लेकिन परिजनों के अनुसार फोन रिसीव नहीं किया गया। करीब एक घंटे से अधिक समय तक मरीज स्ट्रेचर पर ही अस्पताल परिसर में पड़ा रहा और परिजन मदद के लिए भटकते रहे।
जनप्रतिनिधि की पहल से मिली राहत
मामले की जानकारी मिलने पर जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन और एंबुलेंस कर्मियों से संपर्क साधा। आरोप है कि प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. मंटू ने इस दौरान कहा—
डॉ. मंटू ने कहा: “एंबुलेंस सुविधा का लाभ मरीजों को मिलेगा, लेकिन इसके लिए उन्हें तेल की व्यवस्था स्वयं करनी होगी।”
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संतोषी शेखर ने अपने निजी खर्च से 600 रुपये का डीजल उपलब्ध कराया। इसके बाद एंबुलेंस से मरीज को डाल्टनगंज भेजा गया। उन्होंने अस्पताल की व्यवस्था पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं गरीब मरीजों के लिए बेहद पीड़ादायक हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते सवाल
यह घटना केवल एक परिवार की परेशानी नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की वास्तविक स्थिति को उजागर करती है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का उद्देश्य प्राथमिक उपचार और आपातकालीन सुविधा उपलब्ध कराना है। विशेष रूप से 108 एंबुलेंस सेवा को गंभीर मरीजों के लिए जीवन रक्षक सेवा माना जाता है।
यदि एंबुलेंस खराब है या संसाधन सीमित हैं, तो वैकल्पिक व्यवस्था समय पर क्यों नहीं की जाती? क्या डीजल की जिम्मेदारी मरीजों पर डालना नियमानुकूल है? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर आवश्यक है।
बरवाडीह जैसे प्रखंडों में बड़ी संख्या में लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। ऐसे में आकस्मिक स्थिति में अतिरिक्त खर्च की मांग उनके लिए उपचार में देरी का कारण बन सकती है। समय पर चिकित्सा सुविधा न मिलना गंभीर परिणाम भी दे सकता है।
प्रशासनिक जवाबदेही की आवश्यकता
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है। लोगों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि हस्तक्षेप न करते तो मरीज को समय पर रेफर करना मुश्किल हो सकता था। यह भी मांग उठ रही है कि एंबुलेंस सेवा और अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली की जांच होनी चाहिए।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से अभी तक इस मामले में आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यदि एंबुलेंस सेवा वास्तव में मुफ्त है, तो इस प्रकार की मांग क्यों की गई? और यदि संसाधन की कमी है, तो उसका समाधान क्या है? इन सवालों पर स्पष्टता आवश्यक है।
न्यूज़ देखो: मुफ्त एंबुलेंस सेवा पर भरोसे की दरार
बरवाडीह की यह घटना बताती है कि कागजों पर उपलब्ध सुविधाएं जमीनी स्तर पर किस तरह बाधित हो जाती हैं। गंभीर मरीज से डीजल राशि की मांग स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि एंबुलेंस सेवा की वास्तविक नीति क्या है और जवाबदेही किसकी तय होगी। ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की जरूरत अब पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
स्वास्थ्य सेवा में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग जरूरी
आपातकाल में हर मिनट कीमती होता है। ऐसी घटनाएं केवल खबर नहीं, चेतावनी भी हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और सुधार आवश्यक है।
यदि कहीं भी एंबुलेंस या अस्पताल से जुड़ी अनियमितता सामने आती है, तो आवाज उठाना नागरिक जिम्मेदारी है।
स्थानीय स्तर पर संवाद, जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और प्रशासनिक पारदर्शिता ही समाधान की दिशा दिखा सकती है।
सजग रहें, सवाल पूछें और अपने अधिकारों को जानें। यदि आपने भी स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा कोई अनुभव देखा है, तो अपनी राय कमेंट में साझा करें। खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं ताकि व्यवस्था में सुधार की मांग मजबूत हो सके।







