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बरवाडीह में साइकिल योजना बनी मजाक, बच्चों की खुशियां टूटी टेढ़ी-मेढ़ी रिंग के साथ

#Latehar #EducationScheme : सरकार की साइकिल योजना में लापरवाही — बच्चे खुशियों से मरम्मत की दुकान तक
  • कक्षा 8 के बच्चों को गुरुवार को मिली साइकिलें।
  • अधिकांश साइकिलों में हवा नहीं, कई पंचर और पार्ट्स खराब।
  • मरम्मत के लिए बच्चों को 200-300 रुपये खर्च करने पड़े।
  • कल्याण विभाग पर जिम्मेदारी, शिक्षा विभाग ने जताई नाराजगी।
  • अधिकांश साइकिल चलने लायक नहीं, बच्चों में गुस्सा।

साइकिल मिलने की खुशी पल में टूटी

बरवाडीह के पल्स टू स्कूल परिसर में गुरुवार का दिन बच्चों के लिए खास होना था। शिक्षा विभाग द्वारा सरकारी योजना के तहत कक्षा 8 के बच्चों को साइकिलें बांटी गईं। सुबह से ही बच्चों में उत्साह था, चेहरे पर मुस्कान और आंखों में चमक। पर साइकिल मिलते ही खुशी गुस्से में बदल गई।

हवा नहीं, रिंग टेढ़ी और चक्का बैंड

साइकिल हाथ में आते ही बच्चों ने उसे चलाने की कोशिश की, लेकिन सच सामने आया। किसी की रिंग टेढ़ी थी, किसी का चक्का बैंड, कई साइकिलों के टायरों में हवा तक नहीं थी। कुछ तो पंचर, तो कई की चेन खराब थी। एक छात्र ने कहा:

“साइकिल का सपना देखा था, अब मरम्मत की दुकान पर खड़ा हूं।”

मरम्मत के लिए खर्च करने पड़े 300 रुपये तक

बच्चों के पास इतने पैसे नहीं थे, फिर भी उन्हें मजबूरी में 200 से 300 रुपये तक खर्च करने पड़े। पास के साइकिल मिस्त्री ने बताया कि कई साइकिलों में बड़े पार्ट्स खराब थे। जिन बच्चों के पास पैसे नहीं थे, वे मायूस लौट गए।

जिम्मेदारी कल्याण विभाग की, शिक्षा विभाग नाराज

रिपोर्ट के मुताबिक, साइकिल वितरण की जिम्मेदारी कल्याण विभाग की है, क्योंकि यह राज्यस्तरीय निविदा के तहत होता है। शिक्षा विभाग का कहना है कि उन्होंने केवल सूची दी थी।

प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी ने कहा: “ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जिला शिक्षा अधीक्षक से शिकायत करूंगा।”

न्यूज़ देखो: सरकारी योजनाओं में जिम्मेदारी कहां गुम हो जाती है?

साइकिल योजना बच्चों की पढ़ाई में मदद के लिए बनी थी, लेकिन खराब गुणवत्ता ने इसे मजाक बना दिया। सवाल यह है कि टेंडर देने के बाद निगरानी कौन करता है?
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

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