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लातेहार में टूटा पुल बना संकट की जड़: ग्रामीण शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक प्रभावित, आंदोलन की चेतावनी

#लातेहार #बुनियादी_ढांचा : दो सप्ताह से जर्जर पुल की मरम्मत नहीं, ग्रामीणों में आक्रोश
  • दो सप्ताह बीतने के बाद भी टूटा पुल जस का तस।
  • लातेहार, लोहरदगा और रांची जिलों के गांव प्रभावित।
  • ग्रामीणों ने बनाई कठपुलिया, जोखिम भरा आवागमन।
  • बच्चों की पढ़ाई, मरीजों की जिंदगी और व्यापार ठप।
  • आंदोलन की चेतावनी देते हुए ग्रामीणों ने प्रशासन से हस्तक्षेप मांगा।

लातेहार। जिले में एक जर्जर पुलिया टूटे हुए लगभग दो सप्ताह का समय हो चुका है, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई पहल नहीं हुई है। यह पुल केवल एक पंचायत की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि लातेहार, लोहरदगा और रांची जिले के कई गांवों को जोड़ने वाली जीवनरेखा था। इसके ढह जाने से पूरे क्षेत्र की आवाजाही, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार पर गहरा असर पड़ा है।

जोखिम भरी कठपुलिया से गुजरने को मजबूर

पुल टूटने के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने अस्थायी रूप से एक कठपुलिया बनाई है, जिससे बच्चे स्कूल-कॉलेज जा रहे हैं और मरीजों को अस्पताल ले जाया जा रहा है। लेकिन इस रास्ते पर हर कदम पर दुर्घटना का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों ने कहा कि मजबूरी में इस असुरक्षित रास्ते का सहारा लेना पड़ रहा है, क्योंकि प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाया गया।

प्रशासनिक उपेक्षा पर सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि मीडिया के माध्यम से यह खबर निश्चित रूप से प्रशासन तक पहुंच चुकी है, लेकिन न तो कोई सर्वेक्षण हुआ और न ही मरम्मत का कार्य शुरू किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर लातेहार के लोगों के साथ यह उपेक्षा क्यों की जा रही है। उदाहरण देते हुए ग्रामीणों ने कहा कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन के बाद उनके पैतृक गांव नेमरा में आठ दिनों के भीतर सड़कों और बुनियादी ढांचे का कायाकल्प कर दिया गया। फिर लातेहार के लोग भेदभाव का शिकार क्यों हों?

जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की उपस्थिति

इस मौके पर आईटीडीए विधायक प्रतिनिधि राजू उरांव, पंचायत समिति सदस्य बुधन गंझू, बरबाटोली पंचायत के उपमुखिया परमेश्वर यादव, चौकीदार किशोर महली समेत उमेश तुरी, कृष्ण मुंडा, वीरेंद्र मुंडा, बालेश्वर उरांव, मनोज उरांव, बालकिशन मुंडा, आनंद मुंडा, फूलचंद मुंडा, संतोष उरांव, शंकर मुंडा, राजेश मुंडा, रामजीत मुंडा, बुधन मुंडा और दर्जनों ग्रामीण मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यदि प्रशासन शीघ्र पहल नहीं करता है तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।

शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि पर गहरा असर

ग्रामीणों ने बताया कि पुल के अभाव में बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है, मरीजों के लिए अस्पताल पहुंचना कठिन है और किसानों की फसलें बाजार तक नहीं पहुंच पा रही हैं। गर्भवती महिलाओं और बीमार मरीजों के लिए यह टूटा पुल जानलेवा साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि अब यह समस्या धैर्य की सीमा से बाहर हो चुकी है।

न्यूज़ देखो: टूटा पुल नहीं केवल ढांचा, यह सैकड़ों गांवों की जीवनरेखा

लातेहार का टूटा पुल केवल सीमेंट और गिट्टी का ढांचा नहीं, बल्कि सैकड़ों गांवों की जीवनरेखा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और व्यापार सभी इस पुल से जुड़े हुए हैं। प्रशासन की चुप्पी यहां के लोगों की मुश्किलें और बढ़ा रही है। अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन ही ग्रामीणों की मजबूरी बन जाएगा।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

जागरूकता ही बदलाव की कुंजी

अब वक्त है कि हम सब ग्रामीणों की आवाज को ताकत दें और प्रशासन तक यह संदेश पहुंचाएं कि बुनियादी ढांचा किसी भी क्षेत्र का हक है। अपनी राय कॉमेंट करें और इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि जागरूकता फैले और लातेहार की यह मांग पूरी हो सके।

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