ढोल-नगाड़ों की गूंज में झूम उठा चंदवा, सरहुल जुलूस में उमड़ी हजारों की भीड़

ढोल-नगाड़ों की गूंज में झूम उठा चंदवा, सरहुल जुलूस में उमड़ी हजारों की भीड़

author Ravikant Kumar Thakur
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#चंदवा #सरहुल_पर्व : प्रकृति पूजा के महापर्व में पारंपरिक जुलूस के साथ दिखी आस्था और उत्साह।

लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड में सरहुल पर्व हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। कुसुम टोली कृषि फार्म मैदान से भव्य जुलूस निकाला गया, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। पढ़ा राजा धनेश्वर उरांव के नेतृत्व में विधिवत पूजा-अर्चना की गई। प्रशासन की निगरानी में पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ।

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  • चंदवा प्रखंड में सरहुल पर्व धूमधाम से मनाया गया।
  • कुसुम टोली कृषि फार्म मैदान से भव्य जुलूस निकाला गया।
  • धनेश्वर उरांव के नेतृत्व में पूजा-अर्चना सम्पन्न हुई।
  • लगभग 30 हजार श्रद्धालुओं की रही सहभागिता।
  • पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए महिलाएं, पुरुष और युवा
  • प्रशासन की मौजूदगी में जुलूस रहा शांतिपूर्ण और व्यवस्थित

लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड में प्रकृति और आस्था का महापर्व सरहुल पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। प्रखंड सरना समिति के तत्वावधान में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। कुसुम टोली स्थित कृषि फार्म मैदान से शुरू हुआ जुलूस विभिन्न मार्गों से होते हुए पुनः उसी स्थल पर आकर संपन्न हुआ।

भव्य जुलूस में उमड़ी आस्था की भीड़

सरहुल पर्व के अवसर पर निकाले गए जुलूस में चंदवा प्रखंड के साथ-साथ आसपास के गांवों और मोहल्लों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे नजर आए, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय हो गया।

जुलूस कुसुम टोली कृषि फार्म मैदान से निकलकर चंदवा मुख्य बाजार, बुध बाजार, सरोजनगर होते हुए पुनः कृषि फार्म मैदान पहुंचा। इस दौरान पूरे रास्ते श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली।

पारंपरिक रीति-रिवाजों से हुई पूजा-अर्चना

कार्यक्रम का नेतृत्व पढ़ा राजा धनेश्वर उरांव ने किया। सरना धर्म के अनुसार विधिवत पूजा-अर्चना की गई, जिसमें प्रकृति की पूजा और पेड़-पौधों की आराधना की गई।

धनेश्वर उरांव ने कहा: “सरहुल पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने और उसकी रक्षा करने का संदेश देता है।”

इस दौरान क्षेत्र की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की गई।

ढोल-नगाड़ों पर थिरके श्रद्धालु

जुलूस के दौरान ढोल-नगाड़ों की पारंपरिक धुन पर लोग झूमते-नाचते नजर आए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी में उत्साह देखने को मिला।

पूरे आयोजन स्थल पर आनंद और उल्लास का माहौल बना रहा, जिससे सरहुल पर्व की सांस्कृतिक छटा साफ झलक रही थी।

30 हजार से अधिक लोगों की रही उपस्थिति

इस भव्य आयोजन में लगभग 30 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति दर्ज की गई। यह संख्या इस पर्व के प्रति लोगों की गहरी आस्था और उत्साह को दर्शाती है।

समिति और जनप्रतिनिधियों की अहम भूमिका

आयोजन को सफल बनाने में प्रखंड सरना समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस अवसर पर मौजूद प्रमुख लोगों में शामिल रहे:

विमल उरांव (अध्यक्ष), धनलाल उरांव (सचिव), विनोद उरांव (उप सचिव), सुरेश नाथ लोहारा (कोषाध्यक्ष), राकेश लोहारा (उपाध्यक्ष), सीतमोहन मुंडा (सलाहकार), लाल बिहारी उरांव, भट्टू उरांव, महेश उरांव, जितेंद्र सिंह, राजनाथ उरांव, भवन मुंडा, बीरबल उरांव (मुखिया रंजीतपुर), सुबेश्वर उरांव, रामपाल उरांव, सुरेंद्र उरांव सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

प्रशासन की मुस्तैदी से शांतिपूर्ण आयोजन

इस दौरान चंदवा प्रशासन और जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे, जिससे जुलूस और पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ।

प्रशासन के सहयोग से श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा नहीं हुई और आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

न्यूज़ देखो: प्रकृति और परंपरा का संगम बना सरहुल पर्व

चंदवा का सरहुल आयोजन यह दर्शाता है कि परंपरा और प्रकृति के प्रति आस्था आज भी समाज में गहराई से जुड़ी हुई है। हजारों लोगों की भागीदारी इस पर्व के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को उजागर करती है। प्रशासन और समाज के सामूहिक प्रयास से यह आयोजन सफल रहा। ऐसे पर्व समाज को जोड़ने और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का काम करते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति से जुड़ाव ही जीवन का आधार, सरहुल देता है यही संदेश

सरहुल पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है और उसकी रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है। आइए हम भी प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें और समाज में एकता को बढ़ावा दें। अपनी राय कमेंट में साझा करें, इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और अपनी संस्कृति को जीवित रखने में भागीदारी निभाएं।

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Written by

चंदवा, लातेहार

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