
#दुमका #जनआंदोलन : कोयला ढुलाई से गंदगी बढ़ने पर महिलाओं ने सर्फ-साबुन की मांग उठाई।
दुमका जिले के गोपीकांदर प्रखंड अंतर्गत दुर्गापुर गांव में कोयला ढुलाई से परेशान महिलाओं ने एक बार फिर हाइवा वाहनों को जाम कर विरोध जताया। कोयले की धूल से कपड़े खराब होने और गंदगी बढ़ने को लेकर महिलाएं आक्रोशित दिखीं। पूर्व में आश्वासन के बावजूद मांगें पूरी नहीं होने से दोबारा आंदोलन किया गया, जिससे करीब एक घंटे तक ढुलाई प्रभावित रही।
- दुर्गापुर गांव में महिलाओं ने कोयला ढुलाई में लगे हाइवा वाहन रोके।
- कोयले की धूल और गंदगी से कपड़े खराब होने का आरोप।
- सर्फ और साबुन उपलब्ध कराने की प्रमुख मांग।
- पहले भी हाइवा जाम कर जताया गया था विरोध।
- पेट्रोलिंग मैनेजर के आश्वासन पर एक घंटे बाद जाम हटा।
- मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी।
दुमका जिले के गोपीकांदर प्रखंड स्थित दुर्गापुर गांव में कोयला ढुलाई को लेकर एक बार फिर तनाव की स्थिति देखने को मिली। गांव से होकर गुजरने वाले हाइवा वाहनों के कारण फैल रही कोयले की धूल और गंदगी से परेशान महिलाओं ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया और हाइवा वाहनों को जाम कर दिया। इस कारण क्षेत्र में कुछ समय के लिए कोयला परिवहन पूरी तरह ठप हो गया।
महिलाओं का कहना है कि कोयला ढुलाई के दौरान उड़ने वाली धूल से उनके घर, कपड़े और दैनिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। बार-बार शिकायत करने के बावजूद जब समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
कोयला ढुलाई से बढ़ी परेशानी
ग्रामीण महिलाओं ने बताया कि दुर्गापुर गांव से होकर प्रतिदिन बड़ी संख्या में हाइवा वाहन कोयला लेकर गुजरते हैं। इन भारी वाहनों से उड़ने वाली कोयले की काली धूल पूरे गांव में फैल जाती है। घरों में रखे कपड़े, अनाज और पानी तक इससे प्रभावित हो रहे हैं। महिलाएं जब कपड़े धोती हैं, तो कुछ ही समय में वे दोबारा गंदे हो जाते हैं।
महिलाओं का आरोप है कि कोयला ढुलाई से उनकी घरेलू परेशानियां बढ़ गई हैं और साफ-सफाई बनाए रखना मुश्किल हो गया है। इसी कारण उन्होंने कोयला कंपनी से सर्फ और साबुन उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि कम से कम कपड़ों की अतिरिक्त सफाई का बोझ कुछ हद तक कम हो सके।
पहले भी हो चुका है हाइवा जाम
ग्रामीणों ने बताया कि यह पहला मौका नहीं है जब दुर्गापुर गांव में इस तरह का विरोध हुआ हो। इससे पहले भी महिलाओं ने सर्फ और साबुन की मांग को लेकर हाइवा वाहनों को जाम किया था। उस समय कोयला कंपनी की ओर से समस्या के समाधान का आश्वासन दिया गया था, लेकिन कई सप्ताह बीत जाने के बावजूद न तो सर्फ-साबुन उपलब्ध कराया गया और न ही धूल नियंत्रण की कोई ठोस व्यवस्था की गई।
इसी कारण नाराज महिलाओं ने एक बार फिर सड़क पर उतरकर हाइवा रोक दिए और कंपनी तथा प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।
महिलाओं का संगठित विरोध
जाम के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं सड़क पर बैठ गईं और कोयला ढुलाई को पूरी तरह रोक दिया। उनका कहना था कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक वे हाइवा वाहनों को आगे नहीं बढ़ने देंगी। महिलाओं ने साफ शब्दों में कहा कि कोयला ढुलाई से कंपनी को मुनाफा हो रहा है, लेकिन उसका दुष्प्रभाव गांव की महिलाओं और बच्चों को झेलना पड़ रहा है।
महिलाओं ने यह भी कहा कि धूल के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है, जिससे खांसी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
पेट्रोलिंग मैनेजर के आश्वासन पर हटा जाम
हाइवा जाम की सूचना मिलने पर कोयला कंपनी के पेट्रोलिंग मैनेजर मौके पर पहुंचे और महिलाओं से बातचीत की। उन्होंने महिलाओं को आश्वासन दिया कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा और जल्द समाधान निकाला जाएगा। साथ ही धूल नियंत्रण के लिए आवश्यक कदम उठाने की बात भी कही गई।
पेट्रोलिंग मैनेजर के आश्वासन के बाद करीब एक घंटे के जाम के बाद महिलाओं ने सड़क से हटने का निर्णय लिया और हाइवा वाहनों की आवाजाही बहाल हुई। हालांकि महिलाओं ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि इस बार भी आश्वासन केवल कागजों तक सीमित रहा, तो वे और बड़े स्तर पर आंदोलन करेंगी।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें जल्द पूरी नहीं हुईं, तो वे दोबारा हाइवा जाम करने के साथ-साथ व्यापक आंदोलन करेंगी। उन्होंने कहा कि अब सिर्फ आश्वासन से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि कोयला ढुलाई से होने वाली परेशानी का स्थायी समाधान जरूरी है, ताकि गांव का सामान्य जनजीवन प्रभावित न हो।
न्यूज़ देखो: स्थानीय समस्याओं पर अनदेखी क्यों
यह घटना दिखाती है कि कोयला जैसे बड़े उद्योगों के साथ जुड़े क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की छोटी लेकिन जरूरी समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। सर्फ और साबुन जैसी मांग भले ही छोटी लगे, लेकिन यह रोजमर्रा की परेशानी से जुड़ी है। यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो ऐसे आंदोलन और तेज हो सकते हैं।
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अधिकारों के लिए आवाज उठाना जरूरी
स्थानीय समस्याओं को नजरअंदाज करना किसी भी विकास मॉडल को कमजोर करता है।
ग्रामीण महिलाओं का यह विरोध साफ संदेश देता है कि सुविधाओं के बिना विकास अधूरा है।
प्रशासन और कंपनियों को मिलकर संतुलित समाधान निकालना चाहिए।
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