
#चिंतन #राजनीति : धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए सत्ता साधने की प्रवृत्ति देश की एकता को चुनौती दे रही है।
भारतीय लोकतंत्र में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आधारित राजनीति लगातार मजबूत होती जा रही है, जिससे सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। चुनावी लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं के इस्तेमाल को लेकर देशभर में चिंता बढ़ी है। यह प्रवृत्ति न केवल विकासात्मक मुद्दों को पीछे धकेल रही है, बल्कि हिंसा, अविश्वास और आर्थिक नुकसान का कारण भी बन रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे निपटने के लिए संस्थागत सख्ती और नागरिक जागरूकता दोनों जरूरी हैं।
- सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए वोट बैंक राजनीति को बढ़ावा।
- धार्मिक भावनाओं का चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल।
- दंगे और अफवाहें बनते हैं राजनीतिक लाभ का साधन।
- विकास, रोजगार, शिक्षा जैसे मुद्दे पीछे छूटते हैं।
- संवैधानिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता पर सीधा प्रभाव।
देश की एकता पर भारी पड़ती धार्मिक राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। विभिन्न राजनीतिक दल धार्मिक भावनाओं को भड़काकर अपना राजनीतिक हित साधने में जुटे हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंच रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है, बल्कि देश की प्रगति में भी बाधा बन रही है। प्रस्तुत लेख में इस खतरनाक राजनीतिक खेल के विभिन्न पहलुओं और इसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई है।
राजनीतिक दलों की रणनीति
चुनावी मौसम में धार्मिक मुद्दों को जानबूझकर उछाला जाता है। कुछ राजनीतिक दल बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को भड़काते हैं तो कुछ अल्पसंख्यक समुदाय के डर का फायदा उठाते हैं। दोनों ही स्थितियों में समाज में विभाजन की खाई गहरी होती जाती है।
धार्मिक प्रतीकों, नारों और भाषणों का इस्तेमाल चुनावी हथियार के रूप में किया जाता है। “हम बनाम वे” की राजनीति को बढ़ावा दिया जाता है, जहां एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जाती है। धार्मिक स्थलों, परंपराओं और इतिहास से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को जानबूझकर गर्म किया जाता है।
दंगों की राजनीति का दुष्चक्र
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि कुछ मामलों में सांप्रदायिक दंगों को चुनावी लाभ के लिए भड़काया जाता है या उनका फायदा उठाया जाता है। दंगों के बाद ध्रुवीकरण और बढ़ जाता है, जिससे कुछ राजनीतिक दलों को अपना वोट बैंक मजबूत करने का मौका मिलता है। यह एक दुष्चक्र बन जाता है जहां हिंसा और राजनीति एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं।
इस राजनीति में सोशल मीडिया का भी दुरुपयोग किया जाता है। फर्जी खबरें, भड़काऊ वीडियो और अफवाहें तेजी से फैलाई जाती हैं। धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री जानबूझकर वायरल की जाती है ताकि समुदायों के बीच तनाव बढ़े और राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।
समाज और देश पर प्रभाव
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के दूरगामी और विनाशकारी परिणाम होते हैं। सबसे पहले, यह सामाजिक सद्भाव को तोड़ती है। सदियों से साथ रहने वाले समुदायों के बीच अविश्वास और नफरत की दीवार खड़ी हो जाती है। पड़ोसी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है।
दूसरा, असली विकासात्मक मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुनियादी ढांचा और महंगाई जैसे विषय चुनावी बहस से बाहर हो जाते हैं।
तीसरा, सांप्रदायिक तनाव से व्यापार-व्यवसाय प्रभावित होता है, निवेश का माहौल खराब होता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि धूमिल होती है।
चौथा, यह राजनीति भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्षता, समानता और भाईचारे के मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाती है।
समाधान की दिशा में
इस समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय प्रयास जरूरी हैं। चुनाव आयोग को धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले नेताओं पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। न्यायपालिका को सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में त्वरित और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना होगा।
मीडिया को फर्जी खबरों और भड़काऊ सामग्री से दूरी बनाते हुए संतुलित रिपोर्टिंग करनी होगी। शिक्षा प्रणाली में संवैधानिक मूल्यों और तर्कशील सोच को मजबूती देनी होगी ताकि युवा कट्टरता से दूर रहें।
नागरिकों की भूमिका
सबसे अहम भूमिका जागरूक नागरिकों की है। मतदाताओं को समझना होगा कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले नेताओं को समर्थन देना उनके भविष्य के लिए घातक है। धार्मिक पहचान के बजाय योग्यता, ईमानदारी और विकास के एजेंडे के आधार पर मतदान करना समय की मांग है। सोशल मीडिया पर किसी भी सामग्री को साझा करने से पहले उसकी सत्यता जांचना भी नागरिक जिम्मेदारी है।
न्यूज़ देखो: लोकतंत्र के सामने बड़ी वैचारिक चुनौती
यह लेख दिखाता है कि किस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रहा है। धार्मिक राजनीति अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ता है। सवाल यह है कि क्या संस्थाएं समय रहते हस्तक्षेप करेंगी और नागरिक इस राजनीति को नकारेंगे। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी
धर्म व्यक्तिगत आस्था है, सत्ता का औजार नहीं।
सजग मतदाता ही इस खतरनाक राजनीति पर लगाम लगा सकते हैं।
विकास, शिक्षा और रोजगार को सवाल बनाइए, नफरत को नहीं।
अपनी राय कमेंट में साझा करें, लेख को आगे बढ़ाएं और जिम्मेदार नागरिक होने का संदेश दें।





