
#गढ़वा #प्रशासनिक_मुद्दा : प्रखंड और नगर पंचायत विलोपित करने की आशंका पर पूर्व मंत्री ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा।
गढ़वा जिले में डंडा प्रखंड सह अंचल और मंझिआंव नगर पंचायत की मान्यता समाप्त किए जाने की संभावनाओं से जनाक्रोश बढ़ता जा रहा है। उपायुक्त द्वारा सरकार को भेजे गए पत्र के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव एवं पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर दोनों इकाइयों की मान्यता यथावत रखने की मांग की है। उन्होंने इसे जनहित और प्रशासनिक सुविधा से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
- डंडा प्रखंड सह अंचल की मान्यता समाप्त होने की आशंका।
- मंझिआंव नगर पंचायत को विलोपित करने संबंधी पत्राचार से बढ़ी चिंता।
- झामुमो केंद्रीय महासचिव मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र।
- डंडा प्रखंड का गठन वर्ष 2008 में प्रशासनिक सुविधा के लिए हुआ।
- मंझिआंव नगर पंचायत का गठन वर्ष 2010, वर्तमान में 12 वार्ड शामिल।
- निर्णय को जनविरोधी और अव्यावहारिक बताया गया।
गढ़वा जिले में डंडा प्रखंड सह अंचल और मंझिआंव नगर पंचायत की मान्यता समाप्त किए जाने की चर्चाओं ने क्षेत्र में असमंजस और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। जिला प्रशासन द्वारा इस संबंध में सरकार को पत्र भेजे जाने के बाद स्थानीय जनता और राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ गई है। इसी क्रम में झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव एवं पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर स्पष्ट रूप से दोनों प्रशासनिक इकाइयों की मान्यता पूर्ववत रखने की मांग की है।
गढ़वा जिले का ऐतिहासिक संघर्ष और डंडा प्रखंड का गठन
मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में मिथिलेश कुमार ठाकुर ने गढ़वा जिले के ऐतिहासिक संघर्ष का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि आज़ादी के बाद से ही गढ़वा क्षेत्र को एक स्वतंत्र जिले के रूप में मान्यता दिलाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। अंततः वर्ष 1991 में गढ़वा को पलामू से अलग कर स्वतंत्र जिला बनाया गया।
झारखंड राज्य गठन के बाद प्रशासनिक सुविधा, भौगोलिक परिस्थितियों और जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रखंडों का पुनर्गठन किया गया। इसी क्रम में वर्ष 2008 में डंडा प्रखंड का गठन किया गया, ताकि दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को सरकारी सेवाएं उनके नजदीक मिल सकें। डंडा प्रखंड का उद्घाटन झारखंड आंदोलन के प्रणेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री कार्यकाल में हुआ था, जिससे इसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्ता और भी बढ़ जाती है।
आम जनता के लिए प्रशासनिक रीढ़ है डंडा प्रखंड
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि डंडा प्रखंड मुख्यालय, गढ़वा जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस क्षेत्र में आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, किसान, मजदूर और दलित समुदाय की बड़ी आबादी निवास करती है।
डंडा प्रखंड और अंचल कार्यालय यहां के लोगों के लिए आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र, भूमि संबंधी कार्य, पेंशन, जन्म–मृत्यु प्रमाण पत्र सहित अनेक आवश्यक सेवाओं का प्रमुख केंद्र हैं। यदि इस प्रखंड की मान्यता समाप्त की जाती है, तो आम नागरिकों को इन कार्यों के लिए दूर-दराज के कार्यालयों में भटकना पड़ेगा, जिससे समय, धन और श्रम की भारी बर्बादी होगी।
प्रशासनिक दृष्टि से भी अव्यावहारिक निर्णय
मिथिलेश कुमार ठाकुर ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी डंडा प्रखंड को समाप्त करना व्यावहारिक नहीं है। क्षेत्र की जनसंख्या, सामाजिक संरचना और भौगोलिक दूरी इस प्रखंड के अस्तित्व को पूरी तरह उचित ठहराती है। उन्होंने कहा कि इस तरह का निर्णय सीधे तौर पर जनहित के विरुद्ध होगा और इसका असर समाज के कमजोर वर्गों पर सबसे अधिक पड़ेगा।
मंझिआंव नगर पंचायत का महत्व भी रेखांकित
पत्र में मंझिआंव नगर पंचायत का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। बताया गया है कि मंझिआंव नगर पंचायत का गठन वर्ष 2010 में किया गया था, जिसमें तीन ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया। वर्तमान में नगर पंचायत क्षेत्र में 12 वार्ड और 21 ग्राम शामिल हैं।
नगर पंचायत के माध्यम से राज्य सरकार को कर और अन्य स्रोतों से नियमित राजस्व की प्राप्ति होती है। इसके बावजूद जिला प्रशासन द्वारा डंडा प्रखंड सह अंचल और मंझिआंव नगर पंचायत की मान्यता समाप्त करने संबंधी पत्र मुख्य सचिव, झारखंड सरकार को भेजा जाना दुर्भाग्यपूर्ण और जनविरोधी कदम बताया गया है।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील
पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से आग्रह किया है कि वे इस मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करें। उन्होंने मांग की है कि गढ़वा जिले के अंतर्गत डंडा प्रखंड सह अंचल और मंझिआंव नगर पंचायत की मान्यता को पूर्ववत रखते हुए संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि आम जनता को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक असुविधा का सामना न करना पड़े।

न्यूज़ देखो: प्रशासनिक फैसलों में जनता की आवाज जरूरी
यह मामला बताता है कि प्रशासनिक पुनर्गठन के फैसलों का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। बिना जमीनी हकीकत और जनभावनाओं को समझे लिए गए निर्णय भविष्य में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं। अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस जनहित से जुड़े मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जनहित की लड़ाई में सजग रहना जरूरी
प्रखंड और नगर पंचायत जैसी प्रशासनिक इकाइयां आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी होती हैं। ऐसे में जरूरी है कि जनता जागरूक रहे और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए। इस खबर को साझा करें, अपनी राय कमेंट में रखें और जनहित से जुड़े मुद्दों को मजबूती दें, ताकि प्रशासन तक जनता की आवाज पहुंचे।







