लाखों खर्च के बावजूद ताले में बंद शौचालय, बरवाडीह में महिलाओं को खुले में जाने की मजबूरी

लाखों खर्च के बावजूद ताले में बंद शौचालय, बरवाडीह में महिलाओं को खुले में जाने की मजबूरी

author Akram Ansari
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#बरवाडीह #स्वच्छता_संकट : सार्वजनिक शौचालय बंद—महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा पर उठे सवाल।

लातेहार जिले के बरवाडीह में लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए सार्वजनिक शौचालय बंद पड़े हैं, जिससे महिलाओं को खुले में शौच के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मुख्य बाजार और बस स्टैंड परिसर के शौचालय वर्षों से उपयोग में नहीं हैं। स्थानीय लोगों ने इसे कागजी विकास बताते हुए जांच और कार्रवाई की मांग की है। यह स्थिति स्वच्छता और सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।

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  • बरवाडीह मुख्य बाजार और बस स्टैंड के शौचालय बंद पड़े।
  • लाखों खर्च के बावजूद शौचालय उपयोग के लायक नहीं
  • महिलाओं को खुले में शौच जाने की मजबूरी
  • दीपक राज ने उपायुक्त से जांच की मांग की।
  • मरम्मत के नाम पर खर्च, लेकिन जमीनी सुधार शून्य

बरवाडीह प्रखंड क्षेत्र में विकास योजनाओं की सच्चाई अब खुलकर सामने आने लगी है। लाखों रुपये की लागत से बनाए गए सार्वजनिक शौचालय या तो अधूरे हैं या वर्षों से बंद पड़े हैं। इससे आम लोगों, विशेषकर महिलाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

स्वच्छता और सुविधा के नाम पर बनाए गए ये शौचालय अब सिर्फ कागजों में ही सक्रिय नजर आ रहे हैं, जबकि जमीन पर इनका कोई उपयोग नहीं हो रहा।

मुख्य बाजार और बस स्टैंड की स्थिति

जानकारी के अनुसार, बरवाडीह मुख्य बाजार स्थित सार्वजनिक शौचालय की मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए। बावजूद इसके यह शौचालय आज भी अधूरा और बंद पड़ा हुआ है।

वहीं, बस स्टैंड परिसर में करीब तीन वर्ष पहले बनाए गए शौचालय पर आज तक ताला लटका हुआ है। इसे कभी आम जनता के उपयोग के लिए खोला ही नहीं गया।

महिलाओं के सामने गंभीर समस्या

इन शौचालयों के बंद रहने से सबसे अधिक प्रभावित महिलाएं हो रही हैं। उन्हें मजबूरी में खुले में शौच जाना पड़ रहा है, जो उनकी सुरक्षा और गरिमा दोनों के लिए गंभीर खतरा है।

स्थानीय महिलाओं ने कहा: “शौचालय होते हुए भी बंद हैं, हमें मजबूरी में बाहर जाना पड़ता है, जो बहुत असुरक्षित है।”

कागजी विकास पर उठे सवाल

स्थानीय व्यवसायियों और नागरिकों का कहना है कि यह पूरी तरह कागजी विकास का उदाहरण है। कागजों में योजनाएं पूरी दिखा दी जाती हैं, लेकिन वास्तविकता में सुविधा नहीं मिलती।

व्यापारियों ने कहा: “सरकार पैसा खर्च कर रही है, लेकिन सुविधा लोगों तक नहीं पहुंच रही है।”

प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल

हैरानी की बात यह है कि प्रखंड में बीडीओ, प्रमुख, जिला परिषद और मुखिया जैसे महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं पदस्थापित हैं। इसके बावजूद महिला दुकानदारों और ग्राहकों को इस बुनियादी सुविधा से वंचित रहना पड़ रहा है।

यह स्थिति प्रशासनिक संवेदनशीलता और कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है।

शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस समस्या को लेकर कई बार शिकायत की गई और आश्वासन भी मिला, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इससे लोगों में प्रशासन के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है।

जांच और कार्रवाई की मांग

सांसद प्रतिनिधि सह व्यवसायिक संघ के अध्यक्ष दीपक राज ने इस मामले को गंभीर बताते हुए उपायुक्त से जांच की मांग की है।

दीपक राज ने कहा: “निर्माण और मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।”

उन्होंने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और शौचालयों को जल्द चालू करने की मांग की है।

स्वच्छता अभियान पर सवाल

यह मामला स्वच्छ भारत अभियान जैसे कार्यक्रमों की जमीनी हकीकत को भी उजागर करता है। जब बुनियादी सुविधाएं ही बंद पड़ी हों, तो स्वच्छता अभियान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

न्यूज़ देखो: कागजों में विकास या जमीन पर हकीकत?

बरवाडीह का यह मामला साफ दिखाता है कि कई योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित रह जाती हैं। शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा का उपयोग न होना गंभीर प्रशासनिक विफलता है। अब जरूरी है कि जिम्मेदारी तय हो और कार्रवाई हो, नहीं तो ऐसे मामले बढ़ते रहेंगे। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सुविधा का अधिकार, समझौता नहीं

हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।
शौचालय जैसी सुविधा कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है।
जरूरी है कि हम ऐसी समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाएं।
जागरूक समाज ही व्यवस्था को बदल सकता है।

अगर आपके क्षेत्र में भी ऐसी स्थिति है तो चुप न रहें।
अपनी आवाज उठाएं, कमेंट करें और इस खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं।

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Written by

बरवाडीह, लातेहार

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