
#सिमडेगा #हर्बल_गुलाल : स्वयं सहायता समूहों ने प्राकृतिक रंगों से सुरक्षित होली की पहल की।
सिमडेगा समाहरणालय सभागार में होली पर्व को लेकर स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार हर्बल गुलाल का शुभारंभ किया गया। उपायुक्त कंचन सिंह और उप विकास आयुक्त दीपांकर चौधरी ने संयुक्त रूप से लोकार्पण किया। प्राकृतिक फूलों व वनस्पतियों से बने इस गुलाल को सुरक्षित, पर्यावरण अनुकूल और महिला आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने वाला कदम बताया गया।
- उपायुक्त कंचन सिंह एवं उप विकास आयुक्त दीपांकर चौधरी ने किया लोकार्पण।
- टी. टांगर, बानो, केरसई और जलडेगा की दीदियों ने तैयार किया प्राकृतिक गुलाल।
- फूल, हल्दी, चुकंदर और वनस्पतियों से पारंपरिक विधि से निर्माण।
- रासायनिक रंगों के दुष्प्रभाव से बचाव हेतु सुरक्षित विकल्प की पहल।
- गुलाल बिक्री से स्वयं सहायता समूहों की आय और आत्मनिर्भरता में वृद्धि।
सिमडेगा जिले में रंगों के पावन पर्व होली को लेकर उत्साह चरम पर है और इसी उत्साह के बीच एक सकारात्मक और प्रेरणादायी पहल सामने आई है। समाहरणालय सभागार में स्वयं सहायता समूह की दीदियों द्वारा तैयार हर्बल गुलाल का विधिवत शुभारंभ किया गया, जिसने सुरक्षित, पर्यावरण अनुकूल और आत्मनिर्भर होली की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। इस कार्यक्रम में जिले के प्रशासनिक अधिकारियों एवं समूह की महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
समाहरणालय सभागार में हुआ हर्बल गुलाल का भव्य शुभारंभ
कार्यक्रम का उद्घाटन उपायुक्त कंचन सिंह एवं उप विकास आयुक्त दीपांकर चौधरी ने संयुक्त रूप से हर्बल गुलाल का लोकार्पण कर किया। इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे जिले के लिए गौरवपूर्ण पहल बताया।
लोकार्पण के दौरान संबंधित प्रखंडों से आई दीदियों को उपायुक्त ने गुलाल लगाकर अग्रिम होली की शुभकामनाएं दीं और उनके परिश्रम व नवाचार की खुलकर प्रशंसा की। कार्यक्रम में समाज कल्याण पदाधिकारी, जेएसएलपीएस के सभी जिला प्रबंधक एवं अन्य कर्मी भी उपस्थित रहे।
चार प्रखंडों की दीदियों ने मिलकर तैयार किया प्राकृतिक गुलाल
उल्लेखनीय है कि जिले के टी. टांगर, बानो, केरसई एवं जलडेगा प्रखंडों की स्वयं सहायता समूह की महिलाएँ सामूहिक रूप से प्राकृतिक तरीके से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं। यह गुलाल पूरी तरह पारंपरिक विधि से बनाया गया है, जिसमें फूलों, हल्दी, चुकंदर तथा अन्य प्राकृतिक वनस्पतियों का उपयोग किया गया है।
रंग तैयार करने की प्रक्रिया में प्राकृतिक सामग्री को सुखाकर, पीसकर और छानकर गुलाल बनाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रासायनिक तत्व का प्रयोग नहीं किया जाता, जिससे यह गुलाल त्वचा के लिए सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल माना जा रहा है।
सुरक्षित होली के साथ स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश
बाजार में उपलब्ध रासायनिक गुलाल से होने वाली एलर्जी, खुजली और अन्य त्वचा संबंधी दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए स्वयं सहायता समूह की दीदियों ने प्राकृतिक विकल्प उपलब्ध कराने का संकल्प लिया है। यह पहल न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देती है बल्कि लोगों को जागरूक भी करती है कि त्योहारों को पर्यावरण अनुकूल तरीके से भी मनाया जा सकता है।
जिला कार्यक्रम प्रबंधक शांति मार्डी ने कार्यक्रम के दौरान हर्बल गुलाल के उत्पादन की पूरी प्रक्रिया, उपयोगिता और इसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक गुलाल न केवल सुरक्षित है बल्कि इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है।
महिला आत्मनिर्भरता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा बल
हर वर्ष होली के अवसर पर हर्बल गुलाल की बिक्री से स्वयं सहायता समूहों को अच्छा आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। इससे समूह की आय में वृद्धि होती है और महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। यह पहल महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त उदाहरण बनकर उभर रही है।
इस प्रकार के स्थानीय उत्पादों के निर्माण से ग्रामीण स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित हो रहे हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है। साथ ही महिलाओं के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता में भी निरंतर बढ़ोतरी हो रही है।
उपायुक्त की अपील – स्थानीय उत्पादों को दें प्राथमिकता
उपायुक्त कंचन सिंह ने जिलेवासियों से अपील करते हुए कहा कि होली के पावन अवसर पर सभी लोग स्वयं सहायता समूहों द्वारा निर्मित हर्बल गुलाल का उपयोग करें। उन्होंने कहा कि स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देने से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक संबल मिलेगा और जिले की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
उपायुक्त कंचन सिंह ने कहा: “सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल होली मनाना हम सभी की जिम्मेदारी है, इसलिए रासायनिक रंगों से दूरी बनाकर हर्बल गुलाल का उपयोग करें।”
उन्होंने यह भी कहा कि यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने का सशक्त माध्यम भी है।
होली में खुशियों के साथ आत्मनिर्भरता का रंग
जिलेवासियों से आग्रह किया गया है कि इस वर्ष होली पर रासायनिक रंगों की बजाय स्थानीय दीदियों द्वारा निर्मित हर्बल गुलाल को प्राथमिकता दें। इससे एक ओर जहां स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं की आजीविका को भी मजबूती मिलेगी।
यह पहल दर्शाती है कि त्योहार केवल खुशियों का अवसर ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सामूहिक विकास का माध्यम भी बन सकते हैं।
न्यूज़ देखो: सुरक्षित त्योहार के साथ सशक्त होती ग्रामीण महिलाएं
सिमडेगा की यह पहल बताती है कि स्थानीय संसाधनों और महिला समूहों के सहयोग से पर्यावरण अनुकूल और सुरक्षित विकल्प तैयार किए जा सकते हैं। हर्बल गुलाल का उत्पादन न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर है बल्कि महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रहा है। प्रशासन और स्वयं सहायता समूहों का यह समन्वय अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणादायी मॉडल बन सकता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
सुरक्षित होली मनाएं और स्थानीय दीदियों का साथ निभाएं
त्योहारों का असली आनंद तभी है जब खुशियों के साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण की भी रक्षा हो।
स्थानीय उत्पादों को अपनाकर हम आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत कर सकते हैं।
एक छोटा सा निर्णय ग्रामीण महिलाओं की आजीविका को नई ताकत दे सकता है।
इस होली रासायनिक रंगों से दूरी बनाएं और प्राकृतिक हर्बल गुलाल को अपनाएं।
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