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दशहरा पूरे देश में धूमधाम से मनाया गया: बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व बना उत्सव का संदेश

#रांची #दशहरा : पूरे देश में विजयादशमी का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था के साथ धूमधाम से मनाया गया, जहां रामलीला और दुर्गापूजा दोनों ने उत्सव को जीवंत बना दिया।
  • रांची सहित पूरे देश में दशहरा पर्व धूमधाम से मनाया गया।
  • राम-रावण युद्ध की स्मृति में रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले जलाए गए।
  • मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय को पूर्वी भारत में शक्ति की आराधना के रूप में याद किया गया।
  • किसानों और व्यापारियों ने औजार और दुकानों की विशेष पूजा की।
  • मेलों और रामलीलाओं ने पर्व को सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप दिया।

दशहरा का पर्व रांची समेत देशभर में श्रद्धा और उमंग के साथ मनाया गया। यह पर्व न केवल धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी गहरी अहमियत रखता है। इस दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण के वध और मां दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय की स्मृति को जीवंत किया जाता है। पर्व के दौरान पुतला दहन, रामलीला और भक्ति कार्यक्रमों के माध्यम से अच्छाई पर बुराई की जीत का संदेश समाज तक पहुंचाया गया।

राम-रावण युद्ध और विजयादशमी का संदेश

रामायण के अनुसार दशहरे का दिन वह ऐतिहासिक पल है, जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया। इस विजय को “सत्य की असत्य पर जीत” माना जाता है। देशभर में इस अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकरण के विशाल पुतले बनाए गए और उन्हें जलाकर यह संदेश दिया गया कि बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।

दुर्गा पूजा और शक्ति की विजय

पूर्वी भारत, खासकर बंगाल और झारखंड में, दशहरा को दुर्गा पूजा के समापन के रूप में मनाया जाता है। परंपरा है कि मां दुर्गा ने लगातार नौ दिन के युद्ध के बाद महिषासुर का वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त किया। विजयादशमी का यह दिन शक्ति, साहस और धर्म की जीत का प्रतीक बन गया। रांची और आसपास के पूजा पंडालों में मां दुर्गा की विशेष आरती और विसर्जन की तैयारी ने इस उत्सव को और भव्य बना दिया।

ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व

इतिहास में दशहरा को विजय यात्रा का दिन माना जाता था। प्राचीन काल में राजा इस दिन विजय जुलूस निकालते थे। आज भी किसानों द्वारा अपने कृषि उपकरणों की पूजा और व्यापारियों द्वारा दुकानों की पूजा इस बात को दर्शाती है कि दशहरा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि नए कार्यों की शुरुआत का शुभ दिन भी है।

सांस्कृतिक उत्सव और मेलों की रौनक

देशभर में दशहरा सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बनकर सामने आया। रांची, झारखंड और अन्य शहरों में रामलीला के मंचन ने धार्मिक भावनाओं को प्रबल किया। मेलों में बच्चों और बड़ों दोनों की भीड़ उमड़ी। स्थानीय स्तर पर आयोजित भक्ति संगीत, नृत्य और नाटकों ने समाज को जोड़ने का कार्य किया। इस पर्व ने विविधता में एकता का संदेश दिया।

दशहरे का असली संदेश

इस पर्व का मूल संदेश यह है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अच्छाई की जीत निश्चित है। अहंकार का अंत और विनम्रता की विजय ही इस दिन का मुख्य भाव है। साथ ही, यह पर्व समाज को यह याद दिलाता है कि अन्याय का विरोध करना और धर्म की रक्षा करना हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है।

न्यूज़ देखो: बुराई के अंत का उत्सव समाज के लिए प्रेरणा

दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और धर्म के मूल्यों का उत्सव है। यह दिन समाज को हर स्तर पर बुराई के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा देता है। चाहे वह भ्रष्टाचार हो, अन्याय हो या सामाजिक भेदभाव—हर रूप में बुराई का अंत संभव है।

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सजग नागरिक बनें अच्छाई का साथ दें

दशहरे का पर्व हमें यह सिखाता है कि जीत उसी की होती है जो सत्य और न्याय के मार्ग पर चलता है। आज जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तो हमें बुराई का डटकर सामना करना होगा और अच्छाई का साथ देना होगा।

अब समय है कि हम सब इस पर्व के संदेश को अपने जीवन में उतारें। आप भी अपनी राय नीचे कमेंट में साझा करें और इस खबर को दोस्तों तक पहुंचाएं ताकि समाज में अच्छाई और एकता का संदेश फैले।

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