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Editorial

पुराने रिश्तों को पुनर्जीवित करने का महापर्व है चुनाव: शर्मिला वर्मा

#निकाय_चुनाव #चुनावी_महापर्व : मतदान नजदीक आते तक ठंडे पड़े रिश्तों में बढ़ी गर्माहट।

निकाय चुनाव की मतदान तिथि नजदीक आते ही वार्ड स्तर पर सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों में नई सक्रियता देखने को मिल रही है। एक-एक वार्ड में कई प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से जनसंपर्क अभियान तेज हो गया है। घर-घर संपर्क, व्यक्तिगत आग्रह और सामाजिक समीकरण चुनावी माहौल को प्रभावित कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में रिश्तों की गर्माहट के साथ-साथ सामाजिक दबाव भी महसूस किया जा रहा है।

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  • कई वार्डों में 10–11 प्रत्याशी मैदान में सक्रिय।
  • सुबह से रात तक तेज घर-घर जनसंपर्क अभियान
  • रिश्तों में बढ़ी नजदीकियां और सामाजिक दबाव
  • युवतियों और महिलाओं की दैनिक मजदूरी पर चुनावी सक्रियता
  • मतदाताओं से विकास के आधार पर मतदान की अपील।

निकाय चुनाव जैसे-जैसे अपने निर्णायक चरण की ओर बढ़ रहा है, वार्ड स्तर पर सामाजिक हलचल तेज होती जा रही है। भूले-बिसरे रिश्तों में अचानक गर्मजोशी लौट आई है। वार्ड पार्षद चुनाव के कारण एक-एक वार्ड में दस-ग्यारह प्रत्याशी मैदान में हैं और छोटे दायरे वाले वार्डों की जनता उनके लिए प्राथमिक लक्ष्य बनी हुई है। एक गली से दूसरी गली, दूसरी से तीसरी गली तक जनसंपर्क का दायरा सीमित है, इसलिए प्रत्याशी बार-बार उसी मतदाता के दरवाजे पर पहुंच रहे हैं।

सुबह-सुबह दूसरे वार्ड के प्रत्याशी भी समर्थन मांगने पहुंच रहे हैं। मतदाता के दैनिक कार्यक्रम या व्यस्तता से अधिक उनके लिए चुनाव महत्वपूर्ण है। दिन का चैन और रात की नींद दोनों दांव पर हैं, क्योंकि चुनाव उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। वार्ड स्तर पर किसी बड़े स्टार प्रचारक की गुंजाइश नहीं होती, इसलिए आसपास के नामचीन लोग ही उनके लिए स्टार प्रचारक बन जाते हैं। आग्रह यही कि साथ चलिए, भले ही आप दूसरे वार्ड के निवासी हों।

रिश्तों में आई नई गर्माहट

चुनाव के इस दौर में एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि बेजान हो रहे रिश्तों में फिर से संवाद शुरू हुआ है। लोग एक-दूसरे के घर आ-जा रहे हैं, हालचाल पूछ रहे हैं और संपर्क बनाए हुए हैं। सामाजिक जुड़ाव की यह स्थिति स्थानीय लोकतंत्र की एक खास पहचान है।

हालांकि हर क्रिया की प्रतिक्रिया भी होती है। यदि किसी मतदाता ने किसी प्रत्याशी का खुलकर समर्थन नहीं किया, तो दूसरे खेमे में असंतोष भी पनपता दिखाई देता है। कुछ लोग मन ही मन नाराजगी पाल लेते हैं। ऐसे में आम मतदाता के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी खड़ी हो जाती है।

मतदाता की दुविधा

जनता के सामने सबसे बड़ी उलझन यह है कि मतदान तो केवल एक ही प्रत्याशी को करना है। एक साथ चार-पांच लोगों को वोट देने की सुविधा नहीं है। इसलिए किसी एक के प्रति ही निष्ठा दिखानी संभव है, बाकी सभी का स्वागत केवल हाथ जोड़कर ही किया जा सकता है।

यह स्थिति मतदाताओं को सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत रिश्तों के बीच संतुलन साधने को मजबूर कर रही है। चुनावी माहौल में बातचीत का प्रमुख विषय यही है कि किसका पलड़ा भारी है और किसे समर्थन दिया जाए।

पांच सौ रुपये की चुनावी सक्रियता

इस बार का एक चिंतनीय पहलू यह भी है कि कुछ महिलाएं, युवतियां और किशोर अपनी दैनिक जिम्मेदारियां छोड़कर अलग-अलग प्रत्याशियों के साथ सक्रिय नजर आ रहे हैं। दिनभर प्रचार में शामिल होकर वे प्रतिदिन लगभग पांच सौ रुपये कमा रहे हैं। घरेलू कामकाज या अन्य श्रम से इतनी आय संभव नहीं हो पाती, इसलिए चुनाव उनके लिए एक अवसर बन गया है।

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इसका प्रभाव घरों पर भी दिख रहा है। कई घरों में काम करने वाली महिलाएं लगातार अनुपस्थित हैं, जिससे गृहणियों की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। चुनावी गतिविधियों के कारण घरेलू दिनचर्या प्रभावित हो रही है।

गृहणियों पर बढ़ता दबाव

सबसे अधिक असर गृहणियों पर देखने को मिल रहा है। एक ओर घरेलू सहायक अनुपस्थित हैं, दूसरी ओर दिनभर लोगों का आना-जाना लगा है। हर समय घर और स्वयं को व्यवस्थित रखना पड़ रहा है, क्योंकि कब कौन फोटो खिंचवाने या समर्थन मांगने पहुंच जाए, इसका अनुमान नहीं।

फिर भी, इस पूरे चुनावी परिदृश्य में उत्साह और भागीदारी का भाव बना हुआ है। स्थानीय लोकतंत्र का यह रूप कई मायनों में सामाजिक सहभागिता को भी मजबूत करता है।

मतदान में विकास को प्राथमिकता

चुनाव के खट्टे-मीठे अनुभवों के बीच यह भी जरूरी है कि मतदान व्यक्तिगत रिश्तों के आधार पर नहीं, बल्कि विकास और क्षेत्र की खुशहाली को ध्यान में रखकर किया जाए। मतदाता यदि सोच-समझकर निर्णय लें, तो आने वाले पांच वर्षों की दिशा तय हो सकती है।

लोकतंत्र में मतदान का अधिकार केवल सुविधा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। यदि मतदान नहीं किया गया, तो बाद में शिकायत का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।

न्यूज़ देखो: रिश्तों की राजनीति और मतदाता की कसौटी

निकाय चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों की परीक्षा भी है। रिश्तों की गर्माहट जहां लोकतंत्र को जीवंत बनाती है, वहीं सामाजिक दबाव मतदाता की स्वतंत्रता को चुनौती देता है। ऐसे समय में विकास, पारदर्शिता और कार्यक्षमता को कसौटी बनाना आवश्यक है। अब देखना यह है कि मतदाता भावनाओं से ऊपर उठकर निर्णय लेते हैं या नहीं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सजग मतदान से ही मजबूत होगा स्थानीय लोकतंत्र

चुनाव का उत्सव तभी सार्थक है जब निर्णय विवेकपूर्ण हो।
व्यक्तिगत समीकरणों से ऊपर उठकर अपने क्षेत्र की जरूरतों पर विचार करें।

मतदान अवश्य करें और आसपास के लोगों को भी प्रेरित करें।
लोकतंत्र में आपकी भागीदारी ही असली शक्ति है।
अपनी राय कमेंट में साझा करें, लेख को आगे बढ़ाएं और जागरूक मतदान का संदेश फैलाएं।

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