आज़ादी के 78 साल बाद भी सड़क किनारे बचपन, भाकपा नेता रुचिर तिवारी ने सरकारों से पूछा– लोकतंत्र का असली चेहरा यही है?

आज़ादी के 78 साल बाद भी सड़क किनारे बचपन, भाकपा नेता रुचिर तिवारी ने सरकारों से पूछा– लोकतंत्र का असली चेहरा यही है?

author Yashwant Kumar
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#पलामू #बाल_सुरक्षा : भाकपा नेता ने सड़क किनारे कबाड़ चुनते बच्चों को देख सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर खड़े किए तीखे सवाल
  • भाकपा जिला सचिव रुचिर कुमार तिवारी ने सड़क किनारे कबाड़ चुनते बच्चों को लेकर चिंता जताई।
  • छः मुहान के पास 8–10 वर्ष के दो बच्चे कूड़े से प्लास्टिक चुनते मिले।
  • 78 साल बाद भी बच्चों की ऐसी स्थिति पर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाया।
  • केंद्र व राज्य सरकार, जिला प्रशासन और बाल संरक्षण तंत्र की जवाबदेही पर जोर।
  • कार्रवाई नहीं होने पर जन आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी।

डालटनगंज में रविवार को भ्रमण के दौरान भाकपा के जिला सचिव एवं पूर्व विधानसभा प्रत्याशी रुचिर कुमार तिवारी सड़क किनारे कबाड़ चुनते मासूम बच्चों को देखकर भावुक और आक्रोशित हो उठे। लगभग 8 से 10 साल के दो बच्चे कूड़े के ढेर में प्लास्टिक की बोतलें और कबाड़ बीनते हुए मिले, जो अपनी भूख मिटाने के लिए रोजाना इसी संघर्ष में जीते हैं। यह दृश्य देखकर उन्होंने कहा कि यह सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि प्रशासन और सरकारों की विफलता का आईना है।

छः मुहान में मिला लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करता दृश्य

रविवार को निगम क्षेत्र का निरीक्षण करते हुए श्री तिवारी छः मुहान के पास रुके, जहाँ दो बच्चे कूड़े के ढेर से उपयोगी सामान चुन रहे थे। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बताती है कि बाल संरक्षण कानून, सरकारी योजनाएँ, पोषण कार्यक्रम और शिक्षा अधिकार सिर्फ कागजों में सिमटे हुए हैं।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा—

“आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी यदि बच्चे कूड़े में भविष्य तलाशने को मजबूर हैं, तो क्या यही लोकतंत्र का असली चेहरा है?”

उन्होंने नेताओं और अफसरों पर तंज कसते हुए कहा कि जनता के वोट से बने जनप्रतिनिधि और योजनाओं पर बैठे अधिकारी सिर्फ आराम की कुर्सियां गर्म कर रहे हैं, लेकिन कमजोर बच्चों के जीवन को सुधारने की दिशा में वास्तविक प्रयास नज़र नहीं आते।

सरकार, प्रशासन और बाल संरक्षण इकाइयों पर सीधा सवाल

भाकपा नेता ने केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की झारखंड सरकार दोनों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने पूछा कि जब बच्चों की सुरक्षा और कल्याण के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएँ चलती हैं, तो फिर नगर निगम के बीचोंबीच बच्चे कबाड़ बीनने को क्यों मजबूर हैं?

उन्होंने विशेष रूप से जिला प्रशासन से पूछा कि बाल संरक्षण पदाधिकारी, सदर एसडीओ, उपायुक्त पलामू, और संबंधित विभाग आखिर क्या कर रहे हैं?
उन्होंने कहा—

“जब बच्चे भूख से जूझते मिलें और अधिकारी योजनाओं की फाइलों में उलझे रहें, तो इसे प्रशासनिक संवेदनहीनता के अलावा क्या कहा जाए?”

तिवारी बोले—“बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना सरकार की पहली जिम्मेदारी”

श्री तिवारी ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन तत्काल कार्रवाई नहीं करता, तो भाकपा इस मुद्दे पर जन आंदोलन खड़ा करेगी। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार का पहला दायित्व बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना होता है, अन्यथा विकास के सभी दावे खोखले साबित होते हैं।

उन्होंने कहा कि यह घटना सिर्फ दो बच्चों की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की हकीकत है जहाँ गरीबी, भूख और उपेक्षा से हजारों बच्चे जूझ रहे हैं।

न्यूज़ देखो: सामाजिक संवेदनशीलता की सबसे कठिन परीक्षा

यह घटना बताती है कि योजनाएँ, घोषणाएँ और भाषण तब तक बेमानी हैं, जब तक सड़क किनारे संघर्ष करते बच्चों तक राहत और सुरक्षा नहीं पहुँचती। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का पहला पैमाना यही है कि सबसे कमजोर नागरिक कितना सुरक्षित है। इस मुद्दे पर ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संवेदनशीलता ही समाज को आगे ले जाती है

बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा सिर्फ परिवार की नहीं, पूरे समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि आपके आसपास कोई बच्चा मजदूरी या कबाड़ बीनने को मजबूर दिखे, तो उसकी जानकारी स्थानीय अधिकारियों तक जरूर पहुँचाएँ।
👇 इस मुद्दे पर अपनी राय कमेंट में लिखें और खबर को शेयर करें—ताकि आवाज़ और बुलंद हो।

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Written by

हुसैनाबाद, पलामू

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