
#गढ़वा #मतपेटी_सुरक्षा : स्ट्रांग रूम निगरानी और CCTV कवरेज को लेकर पारदर्शिता पर प्रश्न उठे।
गढ़वा बाजार समिति परिसर में 23 फरवरी से सुरक्षित रखी गई मत पेटियों की निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल सामने आए हैं। प्रशासन, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद CCTV कवरेज और सुरक्षा सतर्कता पर चर्चा तेज हुई है। प्रत्याशियों के प्रतिनिधि भी परिसर में मौजूद हैं। पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी की विश्वसनीयता अब मुख्य मुद्दा बन गई है।
- 23 फरवरी से गढ़वा बाजार समिति परिसर में रखी गई मत पेटियां।
- सुरक्षा जिम्मेदारी प्रशासन, पुलिस और अर्धसैनिक बल के पास।
- परिसर में 200 मीटर निषेधाज्ञा और CCTV लाइव फीड की व्यवस्था।
- नौ कैमरों में से कई का फोकस एक ही एरिया पर केंद्रित।
- बैलेट बॉक्स पर प्रत्यक्ष कैमरा एंगल नहीं होने पर सवाल।
गढ़वा में मत पेटियों को स्ट्रांग रूम में सील कर सुरक्षित रखने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण अब सुरक्षा और पारदर्शिता पर टिका हुआ है। प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की निगरानी में मत पेटियों को 23 फरवरी से बाजार समिति परिसर में रखा गया है। कागजी तौर पर सुरक्षा के सभी मानक लागू बताए जा रहे हैं, लेकिन निगरानी प्रणाली और पारदर्शिता के पहलुओं को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं, जिससे जनविश्वास और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चर्चा तेज हो गई है।
स्ट्रांग रूम में चार दिनों तक मत पेटियों को रखने पर उठे प्रश्न
जनता का मत पेटियों में बंद हो चुका है और लोकतंत्र का निर्णय तकनीकी रूप से सुरक्षित कर दिया गया है। इसके बावजूद चार दिनों तक इन पेटियों को स्ट्रांग रूम में बंद रखने की प्रक्रिया को लेकर सवाल सामने आ रहे हैं।
विशेष रूप से पारदर्शिता के वर्तमान दौर में यह अंतराल स्वयं शंका की जमीन तैयार करता हुआ दिखाई दे रहा है। आम नागरिकों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया है कि इस अवधि के दौरान निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी और वैज्ञानिक है।
सुरक्षा व्यवस्था का आधिकारिक ढांचा और तैनाती
गढ़वा बाजार समिति परिसर में रखी मत पेटियों की सुरक्षा प्रशासन, पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जिम्मे सौंपी गई है। निर्वाची पदाधिकारी और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों के तहत निगरानी व्यवस्था संभाल रहे हैं।
स्ट्रांग रूम के चारों ओर लगभग 200 मीटर की निषेधाज्ञा लागू की गई है, जिससे अनधिकृत प्रवेश को रोका जा सके।
इसके साथ ही प्रत्याशी और उनके प्रतिनिधि भी दिन-रात परिसर में बनाए गए पंडाल में मौजूद हैं, ताकि निगरानी में पारदर्शिता बनी रहे। परिसर में CCTV कैमरों का लाइव फीड टीवी स्क्रीन पर लगातार प्रसारित किया जा रहा है, जिससे सुरक्षा व्यवस्था कागजों पर पूरी तरह व्यवस्थित प्रतीत होती है।
रात के निरीक्षण में सामने आए दृश्य
रात्रि निरीक्षण के दौरान कुछ ऐसे दृश्य सामने आए, जिन्होंने निगरानी व्यवस्था की वास्तविक सक्रियता पर प्रश्न खड़े किए। मुख्य गेट बंद जरूर पाया गया, लेकिन अंदर आने-जाने वालों से सख्ती से पूछताछ की कोई स्पष्ट सक्रिय प्रणाली नजर नहीं आई।
पैदल गेट से बाइक का भीतर प्रवेश कर पंडाल तक पहुंच जाना सुरक्षा घेराबंदी की मजबूती पर सवाल खड़ा करता है।
पंडाल में मौजूद विभिन्न प्रत्याशियों के प्रतिनिधि अधिकांशतः विश्राम की अवस्था में दिखाई दिए। थकान स्वाभाविक मानी जा सकती है, परंतु जब मत पेटियों की सुरक्षा 24 घंटे की जिम्मेदारी हो, तो निरंतर निगरानी की अपेक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
CCTV निगरानी प्रणाली पर तकनीकी सवाल
परिसर में नौ चैनलों का CCTV फीड एक छोटे टीवी स्क्रीन पर चल रहा था और सुरक्षाकर्मी उसकी निगरानी में तैनात थे। प्रारंभिक स्तर पर व्यवस्था सामान्य और नियंत्रित दिखी, लेकिन तकनीकी दृष्टि से फुटेज की गहन समीक्षा में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु सामने आए।
नौ कैमरों में से चार कैमरे एक ही क्षेत्र के आसपास केंद्रित पाए गए। स्ट्रांग रूम के शटर पर कई कैमरों का फोकस मौजूद था, लेकिन अंदर रखी बैलेट बॉक्स पर प्रत्यक्ष कैमरा एंगल का अभाव देखा गया।
यह स्थिति सुरक्षा घेरा डिजाइन करने की तकनीकी योजना पर भी प्रश्न उठाती है कि क्या सबसे संवेदनशील बिंदु पर पर्याप्त निगरानी सुनिश्चित की गई है या नहीं।
तकनीकी विश्वसनीयता और लूप फुटेज की आशंका
तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा यह भी सवाल उठाया गया कि यदि किसी कारणवश कुछ समय के लिए शटर की फुटेज बाधित या लूप हो जाए, तो स्ट्रांग रूम के भीतर की वास्तविक स्थिति की पुष्टि बाहर मौजूद प्रतिनिधि किस प्रकार कर पाएंगे।
हाल ही में रांची में सामने आए CCTV आउटेज प्रकरण के बाद यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है। जब सुरक्षा पूरी तरह तकनीकी सिस्टम पर आधारित हो, तो उसकी विश्वसनीयता, कवरेज और बैकअप व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी आवश्यक मानी जाती है।
परतदार सुरक्षा मॉडल की आवश्यकता पर चर्चा
कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील परिसरों में परतदार निगरानी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। बैंकिंग संस्थानों का उदाहरण दिया जा रहा है, जहां प्रवेश द्वार, काउंटर क्षेत्र और स्ट्रांग रूम यानी लॉकर एरिया—तीनों स्तरों पर अलग-अलग कैमरा निगरानी सुनिश्चित की जाती है।
इसी संदर्भ में यह सवाल उभर रहा है कि यदि बाहरी ताले और शटर की निगरानी है, तो क्या अंदर रखी मत पेटियों पर भी प्रत्यक्ष कैमरा कवरेज होना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की शंका की गुंजाइश न्यूनतम हो सके।
लोकतांत्रिक विश्वास और पारदर्शिता का व्यापक प्रश्न
मतपत्र केवल कागज नहीं होते, बल्कि वे जनता के विश्वास और लोकतंत्र की आत्मा का प्रतीक होते हैं। उनकी सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता का विषय भी है।
हालांकि सुरक्षा व्यवस्था में तैनात सभी एजेंसियां अपने स्तर पर प्रयासरत दिखाई देती हैं, लेकिन बेहतर और अधिक वैज्ञानिक निगरानी की दिशा में अतिरिक्त पहल की आवश्यकता पर जनचर्चा तेज हो गई है।
पारदर्शिता के इस दौर में निगरानी तंत्र का मजबूत और संतुलित होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को और सुदृढ़ कर सकता है।

न्यूज़ देखो: पारदर्शिता बनाम तकनीकी निगरानी की चुनौती
यह पूरा घटनाक्रम चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और तकनीकी सुरक्षा के संतुलन की आवश्यकता को उजागर करता है। प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद निगरानी के वैज्ञानिक मानकों पर सवाल उठना एक गंभीर संकेत है। क्या CCTV कवरेज और सुरक्षा प्रोटोकॉल को और मजबूत करने की जरूरत है, यह जांच का विषय बन सकता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
लोकतंत्र की सुरक्षा में सजग नागरिक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि उसके हर चरण की पारदर्शिता से सुनिश्चित होती है।
सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना अविश्वास नहीं, बल्कि जवाबदेही की स्वस्थ प्रक्रिया है।
जागरूक समाज ही निष्पक्ष और विश्वसनीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव बनाता है।
यदि निगरानी प्रणाली को और बेहतर बनाया जा सकता है, तो यह लोकतंत्र के हित में एक सकारात्मक कदम होगा।
आपकी सजगता ही पारदर्शिता की सबसे बड़ी ताकत है। अपनी राय कमेंट में साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और जागरूक नागरिक के रूप में चर्चा में भाग लें।






