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आकांक्षी प्रखंड डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप में पीवीटीजी परिवारों को बकरी पालन से आत्मनिर्भरता की नई राह

#डुमरीगुमला #पीवीटीजीविकास : मॉडल ग्राम हुटाप में बकरी वितरण से जीविका सशक्तिकरण की पहल।

आकांक्षी प्रखंड डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप में पीवीटीजी परिवारों के लिए बकरी पालन योजना की शुरुआत की गई। नीति आयोग द्वारा पोषित और गुमला जिला प्रशासन के नेतृत्व में संचालित “पहल” परियोजना के तहत नौ परिवारों को प्रथम चरण में बकरियां वितरित की गईं। ब्लैक बंगाल नस्ल की यूनिट प्रदान कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास किया गया। इस पहल का उद्देश्य कमजोर जनजातीय समूहों की आय बढ़ाकर आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना है।

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  • मॉडल ग्राम हुटाप, डुमरी में बकरी वितरण कार्यक्रम।
  • नीति आयोग पोषित “पहल” परियोजना के तहत पहल।
  • प्रथम चरण में 9 पीवीटीजी परिवारों को बकरियां मिलीं।
  • प्रत्येक यूनिट में 4 बकरी और 1 बकरा शामिल।
  • कुल 34 परिवारों को योजना से जोड़ने का लक्ष्य।

डुमरी प्रखंड के मॉडल ग्राम हुटाप के औरापाठ क्षेत्र में सोमवार को आजीविका सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। नीति आयोग द्वारा पोषित एवं गुमला जिला प्रशासन के नेतृत्व में संचालित “पहल (पाथ टू एडवांसमेंट एंड हॉलिस्टिक एक्शन फॉर लाइवलीहुड इन औरापाठ)” परियोजना के तहत पीवीटीजी परिवारों के बीच बकरियों का वितरण किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों को स्थायी आय के स्रोत से जोड़ना है।

“पहल” परियोजना के तहत आजीविका सशक्तिकरण

“पहल” परियोजना औरापाठ क्षेत्र में समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए चलाई जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य पीवीटीजी समुदाय के परिवारों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाना और उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर करना है।

परियोजना के तहत प्रथम बैच में नौ पीवीटीजी परिवारों को ब्लैक बंगाल नस्ल की एक-एक यूनिट बकरी प्रदान की गई। प्रत्येक यूनिट में चार बकरी और एक बकरा शामिल है, जिससे परिवार नियमित प्रजनन और आय का चक्र विकसित कर सकें।

ब्लैक बंगाल नस्ल क्यों महत्वपूर्ण

ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियां अपनी उच्च प्रजनन क्षमता और कम रख-रखाव लागत के लिए जानी जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह नस्ल तेजी से आय का स्रोत बन सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सही देखभाल और प्रशिक्षण मिले तो बकरी पालन छोटे किसानों और जनजातीय परिवारों के लिए स्थायी आमदनी का मजबूत माध्यम बन सकता है।

34 परिवारों को जोड़ने का लक्ष्य

परियोजना के अंतर्गत कुल 34 पीवीटीजी परिवारों को बकरी पालन के व्यवसाय से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। प्रथम चरण में नौ परिवारों को लाभान्वित कर योजना की शुरुआत की गई है।

इस पहल से न केवल परिवारों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। नियमित आय से शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसे क्षेत्रों में भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

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आईएसडीजी रिसर्च फाउंडेशन की भूमिका

बकरी वितरण का कार्य आईएसडीजी रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से संपन्न कराया गया। संस्था के कार्यकर्ताओं ने लाभुक परिवारों को बकरी पालन के प्राथमिक दिशा-निर्देश भी दिए, ताकि वे इस व्यवसाय को सफलतापूर्वक संचालित कर सकें।

कार्यक्रम के दौरान नीरज गोप, आलोक मिश्रा, पीवीटीजी समुदाय के कार्यकर्ता रमेश कोरवा, संदीप यादव सहित अन्य ग्रामीण उपस्थित रहे। सभी ने इस पहल को समुदाय के लिए सकारात्मक कदम बताया।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता कदम

पीवीटीजी परिवारों के लिए आजीविका के स्थायी साधन विकसित करना समय की मांग है। बकरी पालन जैसे छोटे लेकिन प्रभावी व्यवसाय से परिवारों की आर्थिक स्थिति में ठोस बदलाव संभव है।

स्थानीय ग्रामीणों ने उम्मीद जताई कि यदि परियोजना का नियमित मॉनिटरिंग और मार्गदर्शन जारी रहा, तो आने वाले समय में और भी परिवार इसका लाभ उठा सकेंगे।

न्यूज़ देखो: कमजोर वर्गों के लिए मजबूत पहल

डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप में शुरू की गई यह पहल दर्शाती है कि योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू हों तो वास्तविक बदलाव संभव है। पीवीटीजी जैसे विशेष रूप से कमजोर समूहों को सीधे आजीविका से जोड़ना दीर्घकालिक विकास की कुंजी है। अब आवश्यकता है नियमित प्रशिक्षण, बाजार से जुड़ाव और निरंतर निगरानी की, ताकि यह प्रयास स्थायी सफलता में बदले। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

आत्मनिर्भर गांव की ओर एक कदम

गांव का विकास तभी संभव है जब हर परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हो।
बकरी पालन जैसी पहलें छोटे कदम जरूर हैं, लेकिन असर बड़ा हो सकता है।
जरूरत है कि समाज और प्रशासन मिलकर ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाएं।

यदि आपके क्षेत्र में भी ऐसी योजनाएं चल रही हैं, तो उनकी जानकारी साझा करें। अपनी राय कमेंट में दें, खबर को आगे बढ़ाएं और आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की इस पहल का हिस्सा बनें।

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Aditya Kumar

डुमरी, गुमला

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