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गांधी चौक पर बदली गांधी की पहचान? नई प्रतिमा पर उठे सवाल, शहर में फैली नाराज़गी

#हुसैनाबाद #गांधी_प्रतिमा : राष्ट्रपिता की पहचान से मेल नहीं खाती नई मूर्ति, जनभावना आहत होने का आरोप
  • हुसैनाबाद के गांधी चौक पर स्थापित नई प्रतिमा को लेकर उठा विवाद।
  • स्थानीय नागरिकों व समाजसेवियों ने महात्मा गांधी की पहचान से मेल न खाने का आरोप लगाया।
  • वर्षों पुरानी आदमकद प्रतिमा हटाने पर लोगों में गहरी नाराज़गी।
  • प्रतिमा चयन प्रक्रिया और सरकारी खर्च की पारदर्शिता पर सवाल।
  • बाजार, चौक-चौराहों और चाय दुकानों पर मुद्दा बना चर्चा का केंद्र
  • जनभावना आहत होने की बात कहते हुए प्रतिमा बदलने की मांग तेज

हुसैनाबाद (पलामू) के ऐतिहासिक गांधी चौक पर हाल ही में स्थापित की गई महात्मा गांधी की नई प्रतिमा अब शहर में सौंदर्य या विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि विवाद और नाराज़गी का कारण बन चुकी है। चौक से गुजरने वाले आम नागरिक, बुजुर्ग, समाजसेवी और स्थानीय बुद्धिजीवी वर्ग का कहना है कि नई प्रतिमा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व, सादगी और उनके ऐतिहासिक स्वरूप को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करती। लोगों का मानना है कि गांधीजी की पहचान केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि उनके विचार, उनके पहनावे और उनकी सादगी से जुड़ी होती है, जो इस नई प्रतिमा में कहीं नजर नहीं आती।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि गांधी चौक पर वर्षों से स्थापित आदमकद प्रतिमा को बिना किसी सार्वजनिक चर्चा या जनसहमति के हटा दिया गया। उस प्रतिमा से शहरवासियों की भावनात्मक और ऐतिहासिक जुड़ाव था। नई प्रतिमा लगाए जाने के बाद लोगों में असहजता और नाराज़गी साफ देखी जा रही है। कई लोगों का कहना है कि जब वे चौक से गुजरते हैं तो पहली नजर में महात्मा गांधी की पहचान ही स्पष्ट नहीं होती, जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

जनभावना के बिना लिया गया निर्णय?

शहरवासियों का सवाल है कि आखिर किस प्रक्रिया के तहत यह निर्णय लिया गया। क्या किसी विशेषज्ञ समिति से प्रतिमा के स्वरूप पर सलाह ली गई थी, या फिर किसी स्थानीय नागरिक मंच से राय ली गई? लोगों का कहना है कि यदि यह प्रतिमा वास्तव में गांधीजी के आदर्शों और स्वरूप को दर्शाने वाली होती, तो शायद इस तरह का विरोध नहीं होता। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह प्रतिमा जनभावना के विपरीत प्रतीत हो रही है।

स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि गांधी चौक केवल एक चौराहा नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक पहचान है। यहां लगी गांधीजी की प्रतिमा वर्षों से सत्य, अहिंसा और राष्ट्र निर्माण के मूल्यों का प्रतीक रही है। ऐसे में बिना जनसंवाद के प्रतिमा को हटाना और नई प्रतिमा स्थापित करना प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है।

बाजार से लेकर चाय दुकानों तक चर्चा

इस मुद्दे को लेकर हुसैनाबाद के बाजार, चाय दुकानों और सार्वजनिक स्थलों पर लगातार चर्चा हो रही है। आम लोग सवाल कर रहे हैं कि नई प्रतिमा पर कितना खर्च हुआ और वह राशि किस मद से स्वीकृत की गई। कई नागरिकों का कहना है कि यदि सरकारी धन का उपयोग किया गया है, तो उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही तय होनी चाहिए।

कुछ स्थानीय लोगों ने यह भी कहा कि यदि प्रतिमा बदलनी ही थी, तो कम से कम महात्मा गांधी के वास्तविक स्वरूप और पहचान के अनुरूप मूर्ति लगाई जानी चाहिए थी। लोगों को यह भी आपत्ति है कि पुरानी प्रतिमा को हटाने से पहले उसका कोई वैकल्पिक स्थान या सम्मानजनक समाधान नहीं निकाला गया।

ऐतिहासिक और राष्ट्रीय सम्मान का सवाल

नागरिकों का कहना है कि यह सिर्फ एक मूर्ति बदलने का मामला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा विषय है। गांधीजी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि देश की आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम की पहचान हैं। उनकी प्रतिमा का स्वरूप यदि लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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कुछ बुजुर्ग नागरिकों ने कहा कि उन्होंने बचपन से गांधी चौक पर गांधीजी की प्रतिमा देखी है और उससे एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ा रहा है। नई प्रतिमा उस स्मृति और भावना को तोड़ती हुई प्रतीत होती है।

प्रशासन की चुप्पी पर भी सवाल

अब तक इस पूरे मामले पर स्थानीय प्रशासन या नगर निकाय की ओर से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। यही कारण है कि लोगों में नाराज़गी और बढ़ती जा रही है। नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन स्थिति स्पष्ट नहीं करता, तो यह विवाद और गहराता जाएगा।

कई समाजसेवी संगठनों ने मांग की है कि या तो नई प्रतिमा को गांधीजी के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप बदला जाए, या फिर पुरानी प्रतिमा को पुनः स्थापित किया जाए। साथ ही प्रतिमा चयन और निर्माण में हुए खर्च की सार्वजनिक जानकारी दी जाए।

न्यूज़ देखो: सवालों के घेरे में निर्णय

हुसैनाबाद के गांधी चौक पर नई प्रतिमा को लेकर उठे सवाल प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। जनभावना से जुड़े विषयों में संवाद और पारदर्शिता अनिवार्य होती है, लेकिन इस मामले में उसकी कमी साफ नजर आ रही है। अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन जनता की भावनाओं को समझते हुए क्या कदम उठाता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

गांधी के विचारों का सम्मान जरूरी

महात्मा गांधी केवल प्रतिमा नहीं, विचार हैं।
उनकी सादगी और पहचान से समझौता स्वीकार्य नहीं।
जनभावना का सम्मान हो, निर्णय में पारदर्शिता आए।
आपकी राय क्या है?
इस खबर को साझा करें और अपनी बात जरूर रखें।

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Yashwant Kumar

हुसैनाबाद, पलामू

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