हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन लकड़ी तस्करी का हब बन गया, रोजाना 150 से अधिक महिलाएँ अवैध व्यापार में शामिल

हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन लकड़ी तस्करी का हब बन गया, रोजाना 150 से अधिक महिलाएँ अवैध व्यापार में शामिल

author Sonu Kumar
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#लातेहार #लकड़ी_तस्करी : हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में लकड़ी विभिन्न बाज़ारों में भेजी जा रही है, वन विभाग और रेलवे प्रशासन की उदासीनता जारी
  • हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन, धनबाद रेल मंडल के बरकाकाना–बरवाडीह रेलखंड पर अवैध लकड़ी तस्करी का केंद्र बन गया।
  • प्रतिदिन 150 से अधिक महिलाएँ शाम की ट्रेनों में लकड़ी लादने में शामिल होती हैं।
  • प्रमुख ट्रेनों में लकड़ी लादकर भेजी जाती है—वाराणसी–बरकाकाना मेमू (63558), बीडीएम पैसेंजर, गोमो–चोपन पैसेंजर (53344)
  • लकड़ी केवल ढोने वाली महिलाओं के माध्यम से भेजी जाती है, पीछे संगठित तस्करी गिरोह और स्थानीय बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय है।
  • वन विभाग ने कई अभियान चलाए, लेकिन समस्या अभी भी जस की तस बनी हुई है।
  • रेलवे प्रशासन की उदासीनता और निरीक्षण की कमी पर सवाल उठ रहे हैं, जिससे पर्यावरण और यात्रियों दोनों की सुरक्षा खतरे में है।

लातेहार। हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन अब अवैध लकड़ी तस्करी का केंद्र बन चुका है। स्थानीय लोगों और यात्रियों ने बीते माह से देखा है कि शाम के समय रेलवे स्टेशन पर भारी संख्या में महिलाएँ लकड़ी के गट्ठे लेकर ट्रेन में लादती हैं। यह लकड़ी वाराणसी, बरकाकाना, डेमू, चंदवा और बालूमाथ समेत कई ग्रामीण बाजारों तक भेजी जाती है। इस प्रक्रिया में महिलाएँ केवल ढोने का कार्य करती हैं, जबकि इसके पीछे संगठित तस्करी गिरोह और स्थानीय बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय है।

रेलवे प्लेटफार्म पर अवैध लकड़ी लोडिंग का दृश्य

प्रतिदिन शाम के समय ट्रेनों के आने से पहले ही प्लेटफार्म पर बड़ी संख्या में महिलाएँ जुट जाती हैं। उनके सिर पर और हाथों में भारी बंडल—बरगद, सखुआ, महुआ और मिश्रित प्रजातियों की लकड़ी।

स्थानीय यात्री ने कहा: “कई बार ऐसा लगता है जैसे यह रेलगाड़ी यात्रियों की नहीं, बल्कि लकड़ी ढोने के लिए ही चलाई जा रही हो।”

ट्रेन के रुकते ही लकड़ी को कोच के भीतर, गेट पर और फुटबोर्ड तक ठूंस दिया जाता है। यात्रियों को चढ़ने और उतरने में दिक्कत होती है, लेकिन तस्करी का यह क्रम बिना रुके चलता रहता है।

अवैध व्यापार का नेटवर्क और आर्थिक पक्ष

सूत्रों के अनुसार, यह लकड़ी केवल घरेलू जलावन के लिए नहीं बल्कि लाखों रुपये के अवैध व्यापार का हिस्सा है। सुबह महिलाएँ वापस जंगल की ओर जाती हैं, जबकि ट्रेनों में लकड़ी की आपूर्ति के पीछे संगठित तस्करी गिरोह और स्थानीय बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय है।

वन विभाग की चेतावनी और निष्क्रियता

हेहेगड़ा क्षेत्र के वन विभाग ने कई बार रोकथाम अभियान चलाया। कई महिलाओं से लकड़ी जब्त की गई और चेतावनी दी गई, लेकिन समस्या अब भी जस की तस है।

वन विभाग अधिकारी ने कहा: “हमने अनेक बार रोकथाम अभियान चलाया, किंतु समस्या इतनी व्यापक हो चुकी है कि केवल चेतावनी से समाधान संभव नहीं।”

कभी-कभी जब्त की गई लकड़ियाँ अगले ही दिन फिर से ट्रैक पर दिखाई देती हैं।

रेलवे प्रशासन की निष्क्रियता

रेलवे प्रशासन की उदासीनता पर भी सवाल उठ रहे हैं। न तो अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई है और न ही स्टेशन स्तर पर कोई विशेष निरीक्षण दल बैठाया गया है। वाराणसी–बरकाकाना मेमू, बीडीएम पैसेंजर और गोमो–चोपन पैसेंजर—तीनों ट्रेनें प्रतिदिन लकड़ी से भरी होकर चलती हैं, लेकिन प्रशासन मौन है।

स्थानीय बुद्धिजीवी ने कहा: “जब रोजाना क्विंटल भर लकड़ी ट्रेनों में जा रही है, तो रेलवे को कैसे नहीं दिखता? क्या यह अनदेखी है या किसी स्तर पर मौन स्वीकृति?”

जंगलों और पर्यावरण पर संकट

लगातार कटाई और अवैध तस्करी से जंगलों का अस्तित्व खतरे में है। स्थानीय लोग चिंतित हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ जंगल को केवल किताबों में ही देख पाएंगी।

न्यूज़ देखो: हेहेगड़ा रेलवे स्टेशन लकड़ी तस्करी

यह कहानी स्पष्ट करती है कि जंगलों और वन सम्पदा की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक सक्रियता की आवश्यकता है। वन विभाग और रेलवे प्रशासन को मिलकर नियमित निरीक्षण और कठोर कार्रवाई करनी होगी। समस्या केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि यात्रियों और स्थानीय लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ी है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सजग रहें, सक्रिय बनें

जंगल और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हम सभी की जिम्मेदारी है। अवैध गतिविधियों को रोकना केवल वन विभाग का काम नहीं, बल्कि समुदाय, प्रशासन और रेलवे का साझा दायित्व है। इस मुद्दे पर अपनी राय साझा करें, खबर को अपने दोस्तों तक पहुंचाएं और सक्रिय नागरिक बनकर जंगल और पर्यावरण की रक्षा में सहयोग करें।

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Written by

लातेहार सदर प्रखण्ड

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