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झारखंड में वन्यजीव चिकित्सा का नया इतिहास: पलामू टाइगर रिजर्व में जंगली हाथी का पहला पूर्णत: इन-हाउस सफल उपचार

#लातेहार #वन्यजीव_संरक्षण : पलामू टाइगर रिजर्व की टीम ने वैज्ञानिक प्रोटोकॉल से घायल जंगली हाथी का सफल उपचार किया

झारखंड के लातेहार स्थित पलामू टाइगर रिजर्व ने वन्यजीव चिकित्सा के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। विशेष रेस्क्यू एवं वेटनरी इकाई ने एक घायल वयस्क नर जंगली हाथी का पूरी तरह इन-हाउस वैज्ञानिक तरीके से सफल ट्रेंकुलाइजेशन और उपचार किया। यह राज्य में इस तरह का पहला सफल संस्थागत उपचार माना जा रहा है।

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  • 26 फरवरी 2026 को पलामू टाइगर रिजर्व की रेस्क्यू टीम ने वयस्क नर एशियाई जंगली हाथी का सफल उपचार किया।
  • 18 फरवरी 2026 को बेतला राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में हाथी के असामान्य व्यवहार और लंगड़ाकर चलने की पहचान हुई।
  • वैज्ञानिक केमिकल इम्मोबिलाइजेशन तकनीक से सुरक्षित ट्रेंकुलाइजेशन कर उपचार किया गया।
  • अभियान का नेतृत्व उपनिदेशक प्रजेश जेना (IFS) के मार्गदर्शन में किया गया।
  • वेटनरी डॉक्टर सुनील कुमार, पुरुषोत्तम कुमार और फील्ड टीम की संयुक्त भूमिका रही अहम।

झारखंड के लातेहार जिले के बरवाडीह क्षेत्र अंतर्गत पलामू टाइगर रिजर्व में वन विभाग की विशेष रेस्क्यू एवं वेटनरी प्रबंधन इकाई ने एक वयस्क नर एशियाई जंगली हाथी का सफलतापूर्वक उपचार कर राज्य में नया इतिहास रच दिया है। गुरुवार, 26 फरवरी 2026 को वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत किए गए इस अभियान को झारखंड में पूरी तरह इन-हाउस क्षमता से जंगली हाथी के उपचार का पहला सफल मामला माना जा रहा है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी दक्षता बल्कि वन्यजीव प्रबंधन में संस्थागत आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक बनकर सामने आई है।

बेतला क्षेत्र में असामान्य गतिविधि से शुरू हुआ ऑपरेशन

जानकारी के अनुसार 18 फरवरी 2026 को बेतला राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में एक वयस्क नर हाथी को असामान्य तरीके से चलते हुए देखा गया। फील्ड स्टाफ द्वारा लगातार ट्रैकिंग और व्यवहारिक अवलोकन के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि हाथी अपने दाहिने अग्रपाद में चोट के कारण लंगड़ाकर चल रहा था और स्पष्ट रूप से असुविधा में था।

घने जंगल, झाड़ीदार भूभाग और सीमित दृश्यता के कारण ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण था। ऐसे संवेदनशील वन्यजीव ऑपरेशन में किसी भी तरह की जल्दबाजी जोखिम भरी हो सकती थी, इसलिए टीम ने अत्यंत सावधानीपूर्वक रणनीति तैयार की।

पाँच दिनों की सतत निगरानी के बाद तय की गई सुरक्षित ऑपरेशन विंडो

रेस्क्यू टीम ने लगातार पाँच दिनों तक हाथी की गतिविधियों, भोजन स्थलों और उसके माइक्रो-हैबिटैट का गहन अध्ययन किया। इस दौरान उसकी मूवमेंट पैटर्न, व्यवहारिक प्रतिक्रिया और संभावित जोखिमों का विश्लेषण किया गया।

विशेषज्ञों ने सुरक्षित दूरी बनाते हुए तकनीकी निगरानी जारी रखी, ताकि ट्रेंकुलाइजेशन के दौरान किसी प्रकार का मानव-वन्यजीव संघर्ष या अप्रत्याशित खतरा उत्पन्न न हो। गहन विश्लेषण के बाद 26 फरवरी को ऑपरेशन के लिए उपयुक्त और सुरक्षित समय निर्धारित किया गया।

वैज्ञानिक तरीके से किया गया ट्रेंकुलाइजेशन और उपचार

निर्धारित योजना के अनुसार केमिकल इम्मोबिलाइजेशन तकनीक का उपयोग करते हुए हाथी को सुरक्षित रूप से ट्रेंकुलाइज किया गया। यह प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील होती है, जिसमें दवा की मात्रा, दूरी, हाथी की शारीरिक स्थिति और पर्यावरणीय कारकों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

ट्रेंकुलाइजेशन के बाद विशेषज्ञों की टीम ने चरणबद्ध तरीके से उपचार प्रक्रिया शुरू की, जिसमें—
घाव का क्लीनिकल एवं फॉरेंसिक परीक्षण,
एंटीसेप्टिक वाउंड क्लीनिंग और डिब्राइडमेंट,
एंटीबायोटिक, दर्द निवारक एवं एंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाओं का उपयोग,
फ्लुइड सपोर्ट सहित आवश्यक सहायक चिकित्सा शामिल रही।

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पूरे उपचार के दौरान हाथी के जीवन-चिह्नों की लगातार निगरानी की गई। उपचार के बाद सभी महत्वपूर्ण पैरामीटर सामान्य पाए गए और हाथी को सुरक्षित रिकवरी अवस्था में लाया गया। वर्तमान में हाथी को निगरानी में रखा गया है और उसकी स्थिति स्थिर बताई जा रही है।

कुमकी हाथियों की भूमिका रही निर्णायक

इस जटिल अभियान में प्रशिक्षित पालतू कुमकी हाथियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। कुमकी हाथियों की सहायता से रेस्क्यू टीम लक्ष्य हाथी के निकट सुरक्षित रूप से पहुंच सकी, जिससे ट्रैकिंग, ट्रेंकुलाइजेशन और उपचार की पूरी प्रक्रिया सुचारू ढंग से संपन्न हो सकी।

विशेषज्ञों का मानना है कि घने जंगलों में बड़े वन्यजीवों के उपचार में कुमकी हाथियों का उपयोग जोखिम कम करने और ऑपरेशन की सफलता सुनिश्चित करने में अत्यंत प्रभावी साबित होता है।

अधिकारियों और विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने निभाई जिम्मेदारी

इस महत्वपूर्ण अभियान का नेतृत्व पलामू टाइगर रिजर्व (उत्तरी) के उपनिदेशक प्रजेश जेना (IFS) के मार्गदर्शन में किया गया। बेतला रेंज के वन क्षेत्र पदाधिकारी उमेश दुबे, वेटनरी डॉक्टर सुनील कुमार एवं पुरुषोत्तम कुमार, फील्ड बायोलॉजिस्ट, रेस्क्यू टीम और महावतों ने समन्वित रूप से इस मिशन को सफल बनाया।

टीम की तकनीकी दक्षता, धैर्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने इस जटिल वन्यजीव चिकित्सा अभियान को सुरक्षित और प्रभावी बनाया।

वन्यजीव प्रबंधन और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में मील का पत्थर

यह सफलता झारखंड में वन्यजीव चिकित्सा, आपातकालीन रेस्क्यू क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी संस्थागत उपलब्धि मानी जा रही है। अब पलामू टाइगर रिजर्व की टीम जटिल वन्यजीव उपचार कार्य स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम होगी और राज्य के अन्य वन प्रभागों को भी तकनीकी सहयोग प्रदान कर सकेगी।

साथ ही यह अभियान मानव-हाथी संघर्ष प्रबंधन, वन्यजीव स्वास्थ्य सुरक्षा और संरक्षण व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर वैज्ञानिक उपचार से घायल वन्यजीवों के जीवन की रक्षा संभव है और इससे पारिस्थितिक संतुलन भी सुरक्षित रहता है।

न्यूज़ देखो: वन्यजीव संरक्षण में झारखंड की बढ़ती संस्थागत क्षमता

पलामू टाइगर रिजर्व की यह उपलब्धि केवल एक उपचार अभियान नहीं, बल्कि राज्य की वन्यजीव प्रबंधन प्रणाली की परिपक्वता का संकेत है। इन-हाउस क्षमता से जंगली हाथी का सफल उपचार भविष्य में बड़े रेस्क्यू अभियानों के लिए मजबूत आधार तैयार करेगा। यह कदम संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और तकनीकी आत्मनिर्भरता के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण में जनभागीदारी ही असली शक्ति

वन्यजीवों की सुरक्षा केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है।
यदि हम जागरूक रहेंगे तो मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया जा सकता है।
जंगल और वन्यजीव हमारे पर्यावरण संतुलन के आधार हैं, उनकी रक्षा हम सबका कर्तव्य है।
ऐसी सकारात्मक पहल को बढ़ावा देना और संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनना समय की जरूरत है।
इस खबर को शेयर करें, अपनी राय कमेंट में दें और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने में योगदान दें।

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Akram Ansari

बरवाडीह, लातेहार

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