#चैनपुरवनक्षेत्र #अवैधकटाई : जलावन के नाम पर सखुआ के हरे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई जारी।
चैनपुर प्रखंड के कुरूमगाड़ वन क्षेत्र में जलावन की आड़ में सखुआ के हरे-भरे पेड़ों की अवैध कटाई का मामला सामने आया है। चित्तरपुर और कोरवा टोली में स्थानीय लोगों द्वारा बिना वन विभाग की अनुमति पेड़ों पर कुल्हाड़ियाँ चलाई जा रही हैं। एक व्यक्ति ने बिना परमिट कटाई की बात स्वीकार भी की है। लगातार हो रही इस कार्रवाई से पर्यावरण और वन्यजीवों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
- कुरूमगाड़ वन क्षेत्र के चित्तरपुर और कोरवा टोली में सखुआ कटाई।
- हेनरी तिग्गा ने बिना परमिट पेड़ काटने की बात स्वीकार की।
- निजी जमीन बताकर वन विभाग की कार्रवाई से बचने की कोशिश।
- नियम के अनुसार सखुआ जैसे पेड़ों के लिए वन विभाग की अनुमति अनिवार्य।
- पूर्व में छतरपुर में भी हुई थी अवैध कटाई, कार्रवाई लंबित।
चैनपुर प्रखंड का कुरूमगाड़ वन क्षेत्र इन दिनों अवैध कटाई की वजह से सुर्खियों में है। चित्तरपुर और कोरवा टोली में जलावन के नाम पर सखुआ (साल) के हरे-भरे पेड़ों को काटा जा रहा है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह काम सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है ताकि इसे सामान्य घरेलू जरूरत का मामला दिखाया जा सके। लेकिन बिना अनुमति की जा रही यह कटाई सीधे तौर पर वन अधिनियम का उल्लंघन है।
जलावन की आड़ में हरियाली पर हमला
कुरूमगाड़ वन क्षेत्र लंबे समय से अपनी घनी हरियाली और सखुआ के मजबूत पेड़ों के लिए जाना जाता है। सखुआ न केवल आर्थिक दृष्टि से कीमती है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है।
सूत्रों के अनुसार, चित्तरपुर और कोरवा टोली में बड़े पैमाने पर सखुआ के छोटे और मध्यम आकार के पेड़ों को काटा गया है। कटाई को इस तरह अंजाम दिया जा रहा है कि इसे घरेलू जलावन के लिए लकड़ी संग्रह का रूप दिया जा सके।
निजी जमीन का तर्क और कानूनी स्थिति
स्थानीय स्तर पर यह तर्क दिया जा रहा है कि जमीन ‘रैयती’ है और मालिक को पेड़ काटने का अधिकार है। लेकिन सरकारी नियमों के अनुसार, निजी जमीन पर भी सखुआ जैसे संरक्षित या कीमती वृक्षों की कटाई के लिए वन विभाग से विधिवत अनुमति लेना अनिवार्य है।
बिना परमिट की गई कटाई को कानूनन अवैध माना जाता है और इस पर जुर्माना तथा दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद क्षेत्र में खुलेआम कटाई जारी है।
हेनरी तिग्गा की स्वीकारोक्ति
चित्तरपुर निवासी हेनरी तिग्गा से पूछताछ के दौरान उन्होंने भारी संख्या में सखुआ के छोटे पेड़ों की कटाई करने की बात स्वीकार की।
हेनरी तिग्गा ने कहा:
“लकड़ियां बारिश के मौसम में जलावन के लिए स्टॉक की जा रही थीं। जमीन मेरी निजी है और मैं इसकी मालगुजारी भरता हूँ, इसलिए मुझे पेड़ काटने का अधिकार है।”
हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके पास पेड़ काटने का कोई आधिकारिक सरकारी परमिट या लिखित अनुमति पत्र नहीं है।
यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि कटाई बिना अनुमति के की गई, जो स्पष्ट रूप से वन नियमों का उल्लंघन है।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला अवसर नहीं है जब कुरूमगाड़ क्षेत्र में वन संपदा को नुकसान पहुंचाया गया हो। कुछ समय पूर्व छतरपुर में भी सड़क किनारे पेड़ों की अवैध कटाई की घटना सामने आई थी। उस समय मामला जांच तक सीमित रह गया और कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।
प्रशासन और वन विभाग की कथित शिथिलता के कारण लकड़ी माफियाओं के हौसले बुलंद बताए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है।
पर्यावरण और वन्यजीवों पर खतरा
ग्रामीणों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा:
“यदि इसी रफ्तार से सखुआ के पेड़ कटते रहे, तो न केवल हरियाली खत्म होगी, बल्कि जंगली जानवरों का पलायन बस्तियों की ओर शुरू हो जाएगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा होगी।”
विशेषज्ञों के अनुसार, सखुआ के पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकने, वर्षा जल संरक्षण और जैव विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी अंधाधुंध कटाई से पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो सकता है।
अब वन विभाग की अगली कार्रवाई पर नजर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग इस मामले में हेनरी तिग्गा और अन्य संबंधित लोगों पर कड़ी कार्रवाई करेगा या यह मामला भी पिछली घटनाओं की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
क्षेत्र के लोग कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
न्यूज़ देखो: जंगल बचेंगे तो ही बचेगा जीवन
कुरूमगाड़ की यह घटना दिखाती है कि नियम होने के बावजूद उनका पालन सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती है। जलावन जैसी जरूरतें अपनी जगह हैं, लेकिन कानून और पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी गंभीर परिणाम ला सकती है। यदि निजी जमीन के नाम पर संरक्षित पेड़ों की कटाई को नजरअंदाज किया गया, तो यह एक खतरनाक उदाहरण बनेगा। अब प्रशासन की सक्रियता ही तय करेगी कि जंगल बचेंगे या माफियाओं का मनोबल बढ़ेगा। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जागरूक बनें, जंगल बचाएं
जंगल सिर्फ लकड़ी का भंडार नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। हर कटता हुआ पेड़ आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर सवाल खड़ा करता है।
जरूरत है कि ग्रामीण, प्रशासन और समाज मिलकर वन संरक्षण की जिम्मेदारी निभाएं।
यदि आपके आसपास भी ऐसी अवैध गतिविधि हो रही है, तो संबंधित विभाग को सूचित करें।
अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें, खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक साझा करें और पर्यावरण संरक्षण की इस मुहिम का हिस्सा बनें। सजग नागरिक बनें, क्योंकि जंगल बचेंगे तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।