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14 या 15 जनवरी: कब है मकर संक्रांति? ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने स्पष्ट किया पर्व की सही तिथि और पुण्यकाल

#विश्रामपुर #मकरसंक्रांति : सूर्य के मकर राशि प्रवेश और लग्न के आधार पर 15 जनवरी को पर्व मनाने की पुष्टि।

पलामू जिले के विश्रामपुर में ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने मकर संक्रांति की तिथि को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने बताया कि सूर्य 14 जनवरी की रात 9 बजकर 56 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। रात्रि में संक्रांति होने के कारण पर्व 15 जनवरी की सुबह मनाया जाएगा। ज्योतिषीय दृष्टि से पूरे दिन पुण्यकाल रहेगा, जिससे दान और पूजा का विशेष महत्व है।

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  • सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी रात्रि 9:56 बजे।
  • रात्रि संक्रांति होने से 15 जनवरी को मकर संक्रांति पर्व
  • पूरे दिन रहेगा पुण्यकाल, दान-पुण्य के लिए श्रेष्ठ।
  • तिल और चूड़ा को बताया गया विशेष धार्मिक महत्व वाला प्रसाद।
  • ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने लग्न और उत्तरायण का महत्व समझाया।

देशभर में मकर संक्रांति का पर्व हर वर्ष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक माना जाता है और सनातन परंपरा में इसका विशेष धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व है। इस वर्ष मकर संक्रांति 14 या 15 जनवरी को मनाई जाएगी, इसे लेकर आमजन में भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। इस विषय पर पलामू जिले के विश्रामपुर में प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित राम निवास तिवारी ने विस्तृत जानकारी देकर स्थिति स्पष्ट की है।

ज्योतिषाचार्य के अनुसार मकर संक्रांति का निर्धारण सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से होता है। इस वर्ष सूर्य 14 जनवरी को रात्रि 9 बजकर 56 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। चूंकि यह संक्रांति रात्रिकाल में हो रही है, इसलिए धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पर्व का पालन अगले दिन यानी 15 जनवरी की सुबह किया जाएगा।

सूर्य उत्तरायण और लग्न का ज्योतिषीय महत्व

पंडित राम निवास तिवारी ने बताया कि सनातन धर्म में सूर्य की गति का विशेष महत्व है। जब सूर्य कर्क लग्न से लेकर धन लग्न तक रहते हैं, तब उन्हें दक्षिणायन कहा जाता है। इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश, भूमि पूजन जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। वहीं सूर्य जब मकर लग्न से मिथुन लग्न तक आते हैं, तो उत्तरायण काल शुरू होता है, जिसे शुभ कार्यों के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।

ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने कहा: “सूर्य के उत्तरायण होते ही शुभ कार्यों का द्वार खुल जाता है, इसलिए मकर संक्रांति का पर्व विशेष पुण्यदायी माना गया है।”

उन्होंने बताया कि इस वर्ष सूर्य के मकर में प्रवेश के साथ ही उत्तरायण प्रारंभ होगा, जिससे धार्मिक गतिविधियों का महत्व और बढ़ जाता है।

15 जनवरी को ही क्यों मनाई जाएगी मकर संक्रांति

पंडित राम निवास तिवारी ने स्पष्ट किया कि शास्त्रों के अनुसार यदि संक्रांति रात्रि में होती है, तो उसका पर्व अगले दिन सूर्योदय के बाद मनाया जाता है। इसी कारण इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाना शास्त्रसम्मत है।

उन्होंने बताया कि 15 जनवरी को पूरे दिन पुण्यकाल रहेगा। इस दौरान पूजा-पाठ, स्नान, दान और जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। विशेष रूप से तिल दान, वस्त्र दान और अन्न दान का महत्व इस दिन कई गुना बढ़ जाता है।

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मकर संक्रांति पर तिल का धार्मिक महत्व

मकर संक्रांति को तिल का विशेष महत्व है। इसी कारण इसे कई क्षेत्रों में तिल संक्रांति भी कहा जाता है। पंडित राम निवास तिवारी ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तिल भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न हुआ है, इसलिए यह भगवान को अत्यंत प्रिय है।

पंडित राम निवास तिवारी ने कहा: “मकर संक्रांति पर तिल का भोग और तिल का दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।”

उन्होंने बताया कि इस दिन तिल से बने लड्डू, तिलकुट और अन्य व्यंजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करना शुभ माना जाता है।

मकर संक्रांति पर पांच महादान का महत्व

ज्योतिषाचार्य ने बताया कि शास्त्रों में पांच दानों को सर्वोत्तम माना गया है। इनमें कन्यादान, गौदान, सोनादान, पृथ्वीदन और तिलदान शामिल हैं। यदि इनमें से कोई भी दान मकर संक्रांति के दिन किया जाए, तो उसका पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

विशेष रूप से तिलदान को इस पर्व पर अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। यही कारण है कि लोग इस दिन जरूरतमंदों को तिल, वस्त्र और अन्न का दान करते हैं।

चूड़ा को क्यों माना गया है विशेष प्रसाद

मकर संक्रांति पर चूड़ा खाने की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। पंडित राम निवास तिवारी ने बताया कि चूड़ा नए अन्न का प्रतीक है। धान की फसल तैयार होने के बाद चूड़ा का पहला प्रसाद मकर संक्रांति के दिन भगवान को भोग लगाकर ग्रहण करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यह परंपरा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक है। नए अन्न को भगवान को अर्पित कर ही उसे ग्रहण करना सनातन संस्कृति की सुंदर परंपरा रही है।

समाज में उत्सव और आस्था का संगम

मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सूर्य, प्रकृति और समाज के बीच सामंजस्य का प्रतीक है। इस दिन स्नान, दान और संयम के माध्यम से व्यक्ति आत्मिक शुद्धि की ओर अग्रसर होता है। पलामू सहित पूरे झारखंड में इस पर्व को लेकर उत्साह का माहौल देखा जा रहा है।

न्यूज़ देखो: परंपरा और ज्योतिष का संतुलन

मकर संक्रांति की तिथि को लेकर हर वर्ष भ्रम की स्थिति बनती है, लेकिन ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस बार 15 जनवरी को पर्व मनाना शास्त्रसम्मत है। सूर्य के उत्तरायण होते ही शुभ कार्यों की शुरुआत और दान-पुण्य का महत्व समाज को सकारात्मक दिशा देता है। यह पर्व परंपरा और वैज्ञानिक खगोल गणना के संतुलन का सुंदर उदाहरण है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

आस्था के साथ जागरूकता भी जरूरी

पर्व मनाएं, लेकिन उसकी सही तिथि और महत्व को जानना भी उतना ही आवश्यक है। मकर संक्रांति जैसे पर्व हमें प्रकृति, समाज और परंपरा से जोड़ते हैं। इस जानकारी को दूसरों तक पहुंचाएं, अपनी राय साझा करें और खबर को आगे बढ़ाकर जागरूकता का हिस्सा बनें।

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Ram Niwas Tiwary

बिश्रामपुर, पलामू

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