
#सिमडेगा #केतुंगाधाम_विरासत : बौद्धकालीन अवशेष, अशोक से जुड़ी स्मृतियां और त्रेतायुगीन शिव आस्था एक ही स्थल पर सजीव हैं।
झारखंड के सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड में स्थित केतुंगाधाम इतिहास, धर्म और संस्कृति का दुर्लभ केंद्र है। यहां बौद्धकालीन अवशेष, मौर्य सम्राट अशोक से जुड़ी लोकस्मृतियां और त्रेतायुगीन शिव आस्था एक साथ विद्यमान हैं। पुरातात्विक महत्व के बावजूद यह स्थल अब तक संरक्षण और पर्यटन विकास से वंचित है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुनियोजित प्रयासों से केतुंगाधाम राष्ट्रीय स्तर का प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र बन सकता है।
- केतुंगाधाम बौद्धकालीन अवशेषों और प्राचीन स्तूपों के लिए प्रसिद्ध।
- सम्राट अशोक के ठहराव से जुड़ी स्थानीय जनश्रुतियां आज भी प्रचलित।
- त्रेतायुगीन शिवलिंग और श्वेतकेतु से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं।
- पुरातत्व विभाग में पंजीकरण के बावजूद संरक्षण का अभाव।
- बौद्ध और धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं मौजूद।
झारखंड के दक्षिणी छोर पर स्थित सिमडेगा जिले का बानो प्रखंड अपने भीतर इतिहास, आस्था और संस्कृति की अद्भुत त्रिवेणी समेटे हुए है। इसी क्षेत्र में स्थित केतुंगाधाम ऐसा स्थल है, जहां एक ओर बौद्ध दर्शन की प्राचीन छाप दिखाई देती है तो दूसरी ओर शिव भक्ति की गहरी आस्था आज भी जीवंत है। बावजूद इसके, यह धरोहर आज भी पहचान और संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही है।
बौद्धकालीन केतुंगा और ऐतिहासिक साक्ष्य
केतुंगाधाम को बौद्धकालीन भूमि के रूप में स्थापित करने वाले प्रमाण आज भी क्षेत्र में मौजूद हैं। देव नदी के दोनों किनारों पर पाषाण निर्मित भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं के अवशेष, छोटे-बड़े बौद्ध स्तूप, ध्यान-स्थल और पूजा-आसन यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र कभी बौद्ध गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। इन अवशेषों की संरचना और शिल्प शैली प्राचीन बौद्ध काल की ओर स्पष्ट संकेत करती है।
स्थानीय इतिहासकारों और ग्रामीणों के अनुसार, इन अवशेषों का वैज्ञानिक संरक्षण और अध्ययन किया जाए तो केतुंगाधाम का नाम देश के प्रमुख बौद्ध स्थलों में शामिल हो सकता है।
सम्राट अशोक से जुड़ी लोकस्मृतियां
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, कलिंग युद्ध के पश्चात सम्राट अशोक पाटलिपुत्र लौटते समय कुछ दिनों के लिए अपनी विशाल सेना के साथ केतुंगा क्षेत्र में रुके थे। माना जाता है कि इसी दौरान यहां कई बौद्ध प्रतिमाओं और संरचनाओं की स्थापना हुई।
आज भी क्षेत्र में पत्थर से बने विशाल बक्से, जिन्हें राजा के खजाने से जोड़ा जाता है, बैलगाड़ियों में प्रयुक्त घंटी जिसे स्थानीय भाषा में ठरकी कहा जाता है, और इससे जुड़ा ठरकीटांड़ क्षेत्र उस कालखंड की स्मृति के रूप में देखा जाता है। ये सभी तत्व केतुंगाधाम को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।
त्रेतायुगीन आस्था का केंद्र केतुंगा शिवधाम
केतुंगाधाम की पहचान केवल बौद्ध इतिहास तक सीमित नहीं है। यह झारखंड के प्राचीनतम शिवधामों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहां स्थापित विशाल शिवलिंग त्रेतायुग का है और इसकी स्थापना भगवान शिव के मानस पुत्र श्वेतकेतु द्वारा की गई थी, जिसका उल्लेख शिव पुराण में मिलता है।
किंवदंतियों के अनुसार, एक गाय प्रतिदिन स्वयं आकर शिवलिंग पर दूध अर्पित करती थी। इसी स्थल पर भगवान शिव के साक्षात प्रकट होने की कथाएं भी प्रचलित हैं। जनविश्वास है कि भगवान शिव हर शुक्रवार कैलाश से यहां आते हैं और शनिवार, रविवार तथा सोमवार तक केतुंगाधाम में निवास करते हैं।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था
केतुंगाधाम विशेष रूप से निसंतान दंपत्तियों के लिए आस्था का केंद्र माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य फलदायी होती है। सावन मास में झारखंड के साथ-साथ ओडिशा और छत्तीसगढ़ से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। उस दौरान पूरा क्षेत्र हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज उठता है।
पंजीकरण के बावजूद संरक्षण की कमी
सूत्रों के अनुसार, केतुंगाधाम पुरातत्व विभाग में पंजीकृत है, इसके बावजूद यहां की प्राचीन संरचनाओं और प्रतिमाओं का समुचित संरक्षण नहीं हो पाया है। कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन उपायुक्त द्वारा इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की पहल जरूर हुई थी, लेकिन प्रशासनिक स्थानांतरण के साथ ही यह प्रयास फाइलों में सिमट कर रह गया।
वर्तमान में स्थिति यह है कि कई अमूल्य प्रतिमाएं और अवशेष खुले में मौसम और समय की मार झेल रहे हैं, जिससे इनके नष्ट होने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
पर्यटन की अपार संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केतुंगाधाम का सुनियोजित विकास किया जाए तो यह स्थल
बौद्ध सर्किट का महत्वपूर्ण केंद्र,
धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का संगम स्थल,
और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने वाला केंद्र बन सकता है।
यह क्षेत्र राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन मानचित्र पर भी स्थान पाने की पूरी क्षमता रखता है।
केतुंगाधाम तक पहुंचने के मार्ग
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा रांची।
रेल मार्ग: राउरकेला–रांची रेलखंड के बानो रेलवे स्टेशन से लगभग 7 किलोमीटर।
सड़क मार्ग: सिमडेगा मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी, सड़क मार्ग से सहज पहुंच।


न्यूज़ देखो: उपेक्षित धरोहर, बड़ी जिम्मेदारी
केतुंगाधाम यह दर्शाता है कि झारखंड की धरती केवल खनिज ही नहीं, बल्कि समृद्ध इतिहास और आस्था की वाहक भी है। संरक्षण और विकास के अभाव में ऐसी धरोहरों का नष्ट होना चिंता का विषय है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस विरासत से वंचित हो सकती हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
विरासत बचाना हम सबकी जिम्मेदारी
केतुंगाधाम जैसे स्थल केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। इनका संरक्षण इतिहास को जीवित रखने जैसा है।
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