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श्रद्धा और भाईचारे का संगम बना खरगडीहा, संत लंगटा बाबा की 116वीं समाधि पर्व पर उमड़ा आस्था का सैलाब

#गिरिडीह #लंगटाबाबासमाधिपर्व : कड़ाके की ठंड में भी हजारों श्रद्धालुओं ने चादरपोशी कर दिया मानवता और एकता का संदेश।
  • जमुआ प्रखंड के खरगडीहा में मनाया गया संत लंगटा बाबा का 116वां वार्षिक समाधि पर्व
  • अहले सुबह 3:15 बजे जमुआ थाना प्रभारी विभूति देव ने की पहली चादरपोशी।
  • हजारों श्रद्धालु कड़ाके की ठंड के बावजूद समाधि पर पहुंचे।
  • लंगटा बाबा की समाधि बनी हिंदू–मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक।
  • समाधि स्थल के आसपास विशाल मेला, प्रशासन की रही चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था।

गिरिडीह जिले के जमुआ प्रखंड अंतर्गत खरगडीहा गांव में संत लंगटा बाबा की 116वीं वार्षिक समाधि पर्व श्रद्धा, आस्था और भाईचारे के साथ भव्य रूप से मनाई गई। कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के बावजूद अहले सुबह से ही बाबा की समाधि पर चादरपोशी के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। जैसे-जैसे रात ढलती गई, वैसे-वैसे आस्था का सैलाब उमड़ता चला गया और पूरा क्षेत्र “या बाबा लंगटा” के जयकारों से गूंज उठा।

परंपरा के अनुसार सुबह 3 बजकर 15 मिनट पर जमुआ थाना प्रभारी विभूति देव ने संत लंगटा बाबा की समाधि पर पहली चादरपोशी की। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और आम श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर बाबा की मजार पर चादर अर्पित की और अमन-चैन व खुशहाली की दुआ मांगी। ठंड से बचने के लिए लोग कंबलों में लिपटे नजर आए, लेकिन आस्था की गर्माहट ने मौसम की कठोरता को भी पीछे छोड़ दिया।

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है लंगटा बाबा की समाधि

संत लंगटा बाबा की समाधि आज भी हिंदू–मुस्लिम एकता और मानवता की सबसे सशक्त मिसाल मानी जाती है। यहां न धर्म की दीवार है, न जाति का भेद। हर वर्ग, हर समुदाय के लोग एक साथ बाबा के दरबार में माथा टेकते हैं। किसी के हाथ में अगरबत्ती है तो किसी के हाथ में चादर, लेकिन सबकी दुआ एक ही—शांति, प्रेम और भाईचारा।

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, लंगटा बाबा ने अपने जीवनकाल में हमेशा मानव सेवा और आपसी सद्भाव का संदेश दिया। वे कहते थे कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। यही कारण है कि उनके इंतकाल के वर्षों बाद भी उनकी शिक्षाएं लोगों के दिलों में जीवित हैं और हर साल समाधि पर्व पर यह स्थान गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक बन जाता है।

आस्था के साथ लगा विशाल मेला

समाधि पर्व के अवसर पर खरगडीहा में विशाल मेले का आयोजन किया गया है। समाधि स्थल के आसपास दूर-दराज से आए दुकानदारों ने अस्थायी दुकानें लगाई हैं। खिलौने, मिठाइयां, खान-पान और रोजमर्रा की वस्तुओं की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा रही है। बच्चों के चेहरों पर जहां मेले की खुशी झलक रही है, वहीं बुजुर्ग श्रद्धालु शांत मन से बाबा की समाधि पर बैठकर इबादत करते नजर आए।

मेले में आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि वे हर साल यहां आते हैं और बाबा से जो भी मुराद मांगते हैं, वह पूरी होती है। यही विश्वास उन्हें बार-बार इस दरबार तक खींच लाता है।

सुरक्षा और व्यवस्था में प्रशासन मुस्तैद

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। पुलिस बल की पर्याप्त तैनाती की गई है और जगह-जगह सुरक्षा कर्मी तैनात हैं। यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लगातार निगरानी रखी जा रही है।

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पुलिस प्रशासन का कहना है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सभी आवश्यक इंतजाम किए गए हैं। मेडिकल टीम और स्वयंसेवकों की भी व्यवस्था की गई है, ताकि जरूरतमंदों को तत्काल सहायता मिल सके।

मानवता की सेवा करने वाले संत कभी नहीं मरते

संत लंगटा बाबा का समाधि पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह मानवता, प्रेम और भाईचारे का उत्सव है। यह आयोजन बताता है कि जो संत अपना जीवन समाज की भलाई और इंसानियत की सेवा में लगा देते हैं, वे कभी मरते नहीं। उनकी सोच, उनके विचार और उनकी सीखें पीढ़ियों तक लोगों को जोड़ने का काम करती हैं।

खरगडीहा की यह धरती हर साल यह संदेश देती है कि नफरत से नहीं, बल्कि प्रेम और सद्भाव से ही समाज आगे बढ़ सकता है। संत लंगटा बाबा की समाधि आज भी उसी विचार की जीवंत प्रतीक बनी हुई है।

न्यूज़ देखो: आस्था से मजबूत होती है एकता

खरगडीहा में आयोजित संत लंगटा बाबा की 116वीं समाधि पर्व ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारत की असली ताकत उसकी सांप्रदायिक एकता और आपसी भाईचारे में है। जब हजारों लोग एक साथ बिना किसी भेदभाव के सिर झुकाते हैं, तो समाज को जोड़ने वाली डोर और मजबूत होती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

भाईचारे के इस संदेश को आगे बढ़ाएं

संत लंगटा बाबा की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। आस्था, प्रेम और इंसानियत के इस संदेश को साझा करें और समाज में सौहार्द की इस परंपरा को और मजबूत बनाएं।

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Surendra Verma

डुमरी, गिरिडीह

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