Giridih

खरगडीहा लंगटा बाबा समाधि स्थल बना धार्मिक एकता का जीवंत प्रतीक, 3 जनवरी को लगेगा पौष पूर्णिमा मेला

#गिरिडीह #धार्मिक_एकता : जमुआ प्रखंड स्थित लंगटा बाबा समाधि स्थल पर सभी धर्मों की साझा आस्था।

गिरिडीह जिले के जमुआ प्रखंड में स्थित खरगडीहा लंगटा बाबा समाधि स्थल आज भी सामाजिक सौहार्द और धार्मिक एकता का सशक्त उदाहरण बना हुआ है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के लोग समान श्रद्धा के साथ बाबा को नमन करते हैं। प्रत्येक वर्ष पौष पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला भव्य मेला इस बार 3 जनवरी को आयोजित होगा। यह आयोजन लंगटा बाबा के करुणा और मानवता के संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।

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  • खरगडीहा लंगटा बाबा समाधि स्थल धार्मिक सौहार्द का प्रतीक।
  • हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी समुदायों की समान आस्था।
  • 3 जनवरी को पौष पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन।
  • 1910 में पौष पूर्णिमा के दिन लंगटा बाबा ने ली थी महासमाधि।
  • अंतिम संस्कार में हिंदू-मुस्लिम दोनों परंपराओं का पालन।

गिरिडीह जिले का जमुआ प्रखंड सिर्फ भौगोलिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र सामाजिक समरसता और धार्मिक एकता की मिसाल भी प्रस्तुत करता है। इसी प्रखंड के खरगडीहा गांव में स्थित लंगटा बाबा समाधि स्थल वर्षों से आपसी भाईचारे का संदेश देता आ रहा है। यहां किसी एक धर्म या समुदाय का प्रभुत्व नहीं, बल्कि सभी धर्मों के अनुयायी समान श्रद्धा भाव से बाबा के चरणों में शीश नवाते हैं।

लंगटा बाबा की करुणा और मानवता का संदेश

लंगटा बाबा को लेकर मान्यता है कि वे अत्यंत करुणामयी और चमत्कारी संत थे। उनकी दया सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे समस्त प्राणियों के कल्याण की कामना करते थे। समाज के गरीब, असहाय और पीड़ित लोग उनके पास आते थे और बाबा बिना किसी भेदभाव के सबकी सहायता करते थे।

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, बाबा का जीवन सादगी, त्याग और सेवा से परिपूर्ण था। वे न तो किसी धर्म विशेष की बात करते थे और न ही किसी समुदाय को अलग मानते थे। उनका संदेश सिर्फ मानवता था, जो आज भी इस समाधि स्थल पर आने वाले श्रद्धालुओं को प्रेरित करता है।

1910 में महासमाधि और ऐतिहासिक परंपरा

इतिहास के अनुसार, 1910 में पौष पूर्णिमा के दिन लंगटा बाबा ने महासमाधि ली थी। बाबा के निधन के बाद जो दृश्य सामने आया, वह आज भी सामाजिक एकता का मजबूत उदाहरण माना जाता है। उनके अंतिम संस्कार में हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं का पालन किया गया। यही वह क्षण था, जिसने इस स्थल को सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बना दिया।

उसी समय से हर वर्ष पौष पूर्णिमा पर यहां मेला आयोजित करने की परंपरा शुरू हुई, जो आज तक निर्बाध रूप से जारी है। यह मेला न सिर्फ धार्मिक आयोजन है, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक एकता का भी उत्सव है।

3 जनवरी को लगेगा भव्य पौष पूर्णिमा मेला

इस वर्ष 3 जनवरी को पौष पूर्णिमा के अवसर पर लंगटा बाबा समाधि स्थल पर भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। मेले को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और समिति के सदस्यों द्वारा तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर विशेष व्यवस्था की जा रही है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी गिरिडीह सहित आसपास के जिलों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचने की संभावना है। मेले में पूजा-अर्चना, प्रसाद वितरण और सामाजिक मेलजोल का विशेष महत्व होता है।

सभी धर्मों की समान भागीदारी

लंगटा बाबा समाधि स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के लोग समान श्रद्धा के साथ आते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के आधार पर अलग नहीं किया जाता। यही वजह है कि यह स्थल आज के दौर में सामाजिक सद्भाव का मजबूत केंद्र बन चुका है।

श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा की कृपा से आपसी प्रेम, शांति और भाईचारा बना रहता है। यही कारण है कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इस स्थल से जुड़े हुए हैं।

हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ देती है संदेश

हर वर्ष मेले में उमड़ने वाली भारी भीड़ यह साबित करती है कि लंगटा बाबा का संदेश आज भी जीवित है। लोग यहां सिर्फ मन्नत मांगने नहीं आते, बल्कि सामाजिक एकता का अनुभव करने भी आते हैं। यह स्थल बताता है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, मेले के दौरान किसी प्रकार का भेदभाव देखने को नहीं मिलता। सभी मिल-जुलकर आयोजन को सफल बनाते हैं और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

समाज के लिए प्रेरणास्रोत

आज जब समाज में विभाजन और तनाव की खबरें सामने आती रहती हैं, ऐसे समय में लंगटा बाबा समाधि स्थल एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह स्थान बताता है कि आपसी सम्मान और प्रेम से ही समाज को मजबूत बनाया जा सकता है।

न्यूज़ देखो: सामाजिक सौहार्द की मजबूत मिसाल

खरगडीहा लंगटा बाबा समाधि स्थल केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का संदेशवाहक है। पौष पूर्णिमा मेला हर साल यह याद दिलाता है कि आस्था का असली स्वरूप मानवता और करुणा है। ऐसे आयोजनों को संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस संदेश को समझ सकें। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

भाईचारे की विरासत को आगे बढ़ाएं

लंगटा बाबा का जीवन और उनकी परंपरा हमें सिखाती है कि धर्म से ऊपर इंसानियत है। आज जरूरत है कि हम ऐसे स्थलों और परंपराओं को संजोकर रखें।
आप भी इस संदेश को आगे बढ़ाएं, खबर को साझा करें, अपनी राय कमेंट में लिखें और सामाजिक एकता की इस मिसाल को और मजबूत बनाने में भागीदार बनें।

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Surendra Verma

डुमरी, गिरिडीह

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