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चैनपुर प्रखंड के रामपुर पंचायत अंतर्गत झड़गाँव की हकीकत सरकारी दावों की पोल खोल रही है। ‘आदर्श गाँव’ का तमगा मिलने के बावजूद यहां आज भी पक्की सड़क नसीब नहीं है। हालात ऐसे हैं कि मरीजों को कंधे पर ढोकर ले जाना पड़ता है और गर्भवती महिलाएं समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पातीं। सड़क की मांग करने पर अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों पर किए गए व्यंग्य ने व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।
- झड़गाँव में 20 वर्षों से पक्की सड़क की मांग अधूरी
- बरसात में कीचड़ और दलदल से ठप हो जाता है आवागमन
- एम्बुलेंस गांव के अंदर जाने से मना करती है
- मरीजों और गर्भवती महिलाओं को कंधे पर ढोना मजबूरी
- अधिकारियों के तंज से ग्रामीणों में आक्रोश
‘आदर्श गाँव’ का तमगा, लेकिन सुविधाओं का अकाल
प्रखंड मुख्यालय के बेहद नजदीक स्थित झड़गाँव को कागजों में ‘आदर्श ग्राम’ का दर्जा प्राप्त है, लेकिन जमीनी सच्चाई इसके ठीक उलट है। गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाला मार्ग आज भी कच्चा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं, बल्कि दो दशकों से जस की तस बनी हुई है।
विधायक के वादों से टूटी उम्मीद
ग्रामीण राजेश किशोर एक्का ने भीड़ के बीच अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने कई बार भूषण तिर्की और सरकार से सड़क निर्माण की गुहार लगाई। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन बाद में गांव की सुध लेने कोई नहीं आता।
उन्होंने कहा कि विधायक ने यह तक कहा था कि यह कार्डिनल टेलेस्फोर पी. टोप्पो का गांव है और इसकी मिट्टी को वे माथे पर लगाएंगे, लेकिन आज भी गांव की हालत बदहाल है।
बरसात में ‘नारकीय’ हो जाता है जीवन
ग्रामीण अलम बेला कुजूर और अल्कमनी एक्का ने बताया कि ठंड और गर्मी में तो किसी तरह आवागमन हो जाता है, लेकिन बरसात के दिनों में रास्ता दलदल में बदल जाता है। बच्चे स्कूल जाते समय गिरकर चोटिल हो जाते हैं, कपड़े खराब हो जाते हैं और कई बार स्कूल जाना ही छोड़ देते हैं।
“एरोप्लेन से बात कीजिए” — अधिकारियों का तंज
ग्रामीणों का आरोप है कि जब उन्होंने बैठक में मरीजों के लिए छोटे वाहन की मांग रखी, तो अधिकारियों ने व्यंग्य करते हुए कहा —
“एरोप्लेन से बात कीजिए, वही सीधे गांव उड़कर आएगा।”
इस टिप्पणी ने ग्रामीणों को गहरी ठेस पहुंचाई और उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम किया।
स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाल तस्वीर
सड़क न होने का सबसे भयावह असर आपातकालीन हालात में देखने को मिलता है। मरियम इक्का सहित ग्रामीणों ने बताया कि एम्बुलेंस केवल बैरटोली तक ही आ पाती है। इसके बाद मरीजों और गर्भवती महिलाओं को पालकी या कंधे पर उठाकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है। कई बार समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण घर पर ही जोखिम भरा प्रसव कराना पड़ता है।
आंदोलन की चेतावनी
गांव के महिला-पुरुषों ने एक स्वर में कहा कि वे अब केवल वोट बैंक बनकर नहीं रहना चाहते। यदि जल्द ही सड़क निर्माण का काम शुरू नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
न्यूज़ देखो विश्लेषण
झड़गाँव की कहानी अकेले एक गांव की नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण इलाकों की है, जहां योजनाएं फाइलों में चमकती हैं, लेकिन जमीन पर दम तोड़ देती हैं। ‘आदर्श ग्राम’ का दर्जा तभी सार्थक होगा, जब सड़क, स्वास्थ्य और सम्मान जैसी बुनियादी सुविधाएं वास्तव में गांव तक पहुंचें।
अब सवाल यह है —
क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस कलंक को मिटा पाएंगे, या झड़गाँव के लोग यूं ही कंधों पर मरीज ढोते रहेंगे?
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