Palamau

मोहर्रम की सातवीं तारीख पर बिंदुआ डेवडर कर्बला में उमड़ा अज़ादारों का सैलाब, गूंज उठी शहादत-ए-हुसैन की सदाएं

#पलामू #मोहर्रमकीअज़ादारी : बिंदुआ डेवडर गांव में मातम, ताज़िया और नौहा में डूबे अज़ादार — कर्बला की शहादत को किया याद, इंसानियत और हक़ के लिए इज़हार-ए-अंजुमन
  • मोहर्रम की 7वीं तारीख को बिंदुआ डेवडर में हुआ अज़ादारी का बड़ा आयोजन
  • हज़ारों अज़ादारों ने ताज़िया, नौहा और मातम से पेश की हुसेनियत को सलामी
  • कर्बला की शहादत को बताया ज़ुल्म के ख़िलाफ़ अमन और इंसाफ़ का पैग़ाम
  • मजलिसों और जुलूसों के ज़रिए पेश की गई अज़ादारी की रिवायतें
  • इस्लामी तारीख़ के सबसे बड़े सबक़ की याद में डूबा रहा पूरा इलाका

डेवडर में अज़ादारी का पुरअसर मंज़र

उंटारी रोड प्रखंड के ग्राम बिंदुआ डेवडर में मोहर्रम की 7वीं तारीख़ को शहादत-ए-हुसैन की याद में एक रूहानी और पुरअसर मंज़र देखने को मिला।
हज़ारों अज़ादारों ने ताज़िया, अलम, नौहा और मातम के ज़रिए कर्बला की उस अज़ीम कुर्बानी को याद किया, जिसने हक़ और इंसाफ़ के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी।

एक अज़ादार बुज़ुर्ग ने कहा: “यज़ीदियत के मुक़ाबले में हुसेनियत आज भी ज़िंदा है और हर दौर में इंसानियत को रास्ता दिखा रही है।”

कर्बला की जंग सिर्फ जंग नहीं थी, सबक़ था

मोहर्रम का महीना ग़म और सब्र का पैग़ाम लेकर आता है।
इमाम हुसैन और उनके 72 जाननिसार साथियों की कर्बला में दी गई शहादत इस बात की गवाही है कि हक़ और इंसाफ़ के रास्ते पर चलने के लिए जान की भी कुर्बानी दी जा सकती है।

डेवडर की कर्बला में हुए इस आयोजन में अज़ादारों ने अलम उठाकर और सीनाज़नी करके अपने इमाम को याद किया। हर तरफ “या हुसैन” की सदाएं गूंजती रहीं।

अमन, भाईचारे और इंसाफ़ का पैग़ाम

पूरे आयोजन में अमन और भाईचारे की बेहतरीन मिसाल देखने को मिली।
स्थानीय प्रशासन और शांति समिति की मदद से कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
गांव के तमाम समुदायों के लोग भी सहयोग में सामने आए, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द का बेहतरीन पैग़ाम गया।

आयोजकों ने कहा: “हमारी अज़ादारी इंसाफ़, अमन और इंसानियत के लिए है — यही कर्बला का असली पैग़ाम है।”

न्यूज़ देखो: शहादत-ए-हुसैन से मिलती है हिम्मत और इंसाफ़ का रास्ता

न्यूज़ देखो ज़मीनी हकीकत और समाज के हर तबके की आवाज़ को सामने लाने का काम करता है।
डेवडर की यह अज़ादारी सिर्फ एक मज़हबी आयोजन नहीं, बल्कि इंसाफ़ और हक़ की राह में दी गई सबसे बड़ी कुर्बानी की याद है।
आज भी कर्बला का पैग़ाम हर उस शख़्स के लिए रौशनी है जो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ और हक़ के लिए खड़ा होना चाहता है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

हुसेनियत एक सोच है — ज़िंदा रहती है हर दौर में

इमाम हुसैन की शहादत हमें यह सिखाती है कि जब बात इंसानियत, ज़मीर और इंसाफ़ की हो, तो कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
इस खबर को शेयर करें, नीचे कॉमेंट करके बताएं कि आपके लिए कर्बला की कुर्बानी का क्या मतलब है।
हम सब मिलकर इस सोच को आगे बढ़ाएं — यज़ीदियत मिटेगी, हुसेनियत जिंदा रहेगी।

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Tirthraj Dubey

पांडु, पलामू

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