
#पलामू #अनुसेवक_संघर्ष : समायोजन और पुनः नियुक्ति की मांग को लेकर पलामू से रांची तक पदयात्रा, मानवीय संकट गहराया।
पलामू जिले के 251 बर्खास्त अनुसेवकों का आंदोलन अब केवल रोजगार का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर मानवीय और सामाजिक संकट बन चुका है। समायोजन और पुनः नियुक्ति की मांग को लेकर अनुसेवक 3 जनवरी को पलामू से पदयात्रा पर निकले और 8 जनवरी को रांची पहुंचे। इस संघर्षपूर्ण यात्रा के दौरान दो अनुसेवकों की मृत्यु हो गई, जिससे राज्यभर में चिंता और आक्रोश का माहौल है। मामला वर्षों पुरानी नियुक्ति प्रक्रिया और न्यायिक आदेशों से जुड़ा होने के कारण सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रहा है।
- पलामू जिले के 251 अनुसेवक समायोजन और पुनः नियुक्ति की मांग पर आंदोलनरत।
- 3 जनवरी से 8 जनवरी तक पलामू से रांची तक की पदयात्रा।
- संघर्ष के दौरान दो अनुसेवकों की मृत्यु, हालात गंभीर।
- वर्ष 2010 की ग्रेड-4 नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा मामला।
- केवल पलामू जिले में बर्खास्तगी, समानता के अधिकार पर सवाल।
पलामू जिले से शुरू हुआ 251 बर्खास्त अनुसेवकों का संघर्ष अब झारखंड में रोजगार और न्याय से जुड़ा एक बड़ा सामाजिक मुद्दा बन गया है। वर्षों तक सरकारी सेवा देने के बाद अचानक नौकरी से बाहर किए गए ये अनुसेवक आज अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। समायोजन और पुनः नियुक्ति की मांग को लेकर की गई पदयात्रा ने उनकी पीड़ा को पूरे राज्य के सामने ला दिया है।
इस आंदोलन के दौरान दो अनुसेवकों की मृत्यु ने हालात की गंभीरता को उजागर कर दिया है। आर्थिक तंगी, इलाज के अभाव और भुखमरी जैसी स्थितियों से गुजर रहे परिवारों की स्थिति अब और भी दयनीय हो गई है।
वर्ष 2010 की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा विवाद
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बर्खास्तगी
यह पूरा मामला वर्ष 2010 में ग्रेड-4 पदों पर हुई नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित है। बाद में इस प्रक्रिया को अवैध करार देते हुए न्यायिक आदेश आए, जिसके अनुपालन में इन कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। वर्षों तक सेवा देने के बावजूद अचानक नौकरी छिन जाने से अनुसेवकों का जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया।
अनुसेवकों का कहना है कि उन्होंने पूरी निष्ठा से अपनी सेवाएं दीं, लेकिन किसी वैकल्पिक व्यवस्था या समायोजन के बिना उन्हें बेरोजगार कर दिया गया।
केवल पलामू जिले में कार्रवाई, उठे सवाल
समानता के अधिकार पर प्रश्न
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि राज्य के अन्य जिलों में अनुसेवकों की स्थिति यथावत बनी हुई है, जबकि केवल पलामू जिले में 251 अनुसेवकों को तत्कालीन उपायुक्त श्रीमती समेरा एस के द्वारा निलंबित या बर्खास्त किया गया।
इस चयनात्मक कार्रवाई ने संविधान में निहित समानता के अधिकार पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अनुसेवकों का कहना है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया गलत थी, तो कार्रवाई सभी जिलों में समान रूप से होनी चाहिए थी।
पदयात्रा के दौरान बढ़ी पीड़ा
दो अनुसेवकों की मौत से आंदोलन और तेज
3 जनवरी को पलामू से शुरू हुई पदयात्रा 8 जनवरी को रांची पहुंची। इस लंबी और कठिन यात्रा के दौरान अनुसेवकों को ठंड, भूख और शारीरिक थकावट का सामना करना पड़ा। इसी बीच दो अनुसेवकों की मृत्यु हो गई, जिसने पूरे आंदोलन को झकझोर कर रख दिया।
इन मौतों के बाद आंदोलन केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि मानवीय संवेदना का प्रश्न बन गया है।
सुधीर कुमार चंद्रवंशी ने की मुलाकात
न्याय की लड़ाई बताया
रांची पहुंचने के बाद विश्रामपुर विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी सुधीर कुमार चंद्रवंशी स्वयं मौके पर पहुंचे और सभी अनुसेवकों से मुलाकात की। उन्होंने अनुसेवकों की समस्याओं को गंभीरता से सुना और हालात की जानकारी ली।
अनुसेवकों ने बताया कि वे न्याय की उम्मीद में अपने घर-परिवार छोड़कर पैदल चलने को मजबूर हुए हैं।
सरकार से संवेदनशीलता की मांग
समायोजन के जरिए पुनः नियुक्ति की अपील
इस मौके पर सुधीर कुमार चंद्रवंशी ने कहा:
सुधीर कुमार चंद्रवंशी ने कहा: “251 अनुसेवकों की यह लड़ाई केवल नौकरी की नहीं, बल्कि जीवन और सम्मान की लड़ाई है। दो साथियों की मृत्यु इस बात का प्रमाण है कि हालात कितने गंभीर हैं। सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए तुरंत समाधान निकालना चाहिए।”
उन्होंने झारखंड के माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन से आग्रह किया कि बर्खास्त अनुसेवकों के मामले का शीघ्र निराकरण करते हुए समायोजन के माध्यम से पुनः जॉइनिंग दी जाए, ताकि सैकड़ों परिवारों को राहत मिल सके।
कांग्रेस पार्टी का समर्थन
आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े होने का ऐलान
सुधीर चंद्रवंशी ने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी और वे स्वयं इस आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने कहा कि जब तक अनुसेवकों को न्याय नहीं मिलता, तब तक यह आवाज़ बुलंद की जाती रहेगी।
राज्य के लिए चेतावनी
रोजगार और मानवीय संवेदना का प्रश्न
यह संघर्ष अब झारखंड में रोजगार, प्रशासनिक निर्णयों और मानवीय संवेदना से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न बन चुका है। दो अनुसेवकों की मृत्यु ने यह संकेत दे दिया है कि यदि जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
न्यूज़ देखो: सरकार की संवेदनशीलता की अग्निपरीक्षा
251 बर्खास्त अनुसेवकों का आंदोलन सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। वर्षों तक सेवा देने के बाद बेरोजगारी, पदयात्रा और मौत जैसी घटनाएं प्रशासनिक फैसलों पर सवाल खड़े करती हैं। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस मामले का समाधान कब और कैसे करती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
न्याय और संवेदना की पुकार
यह केवल 251 लोगों की लड़ाई नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के भविष्य का सवाल है।
समय रहते निर्णय लेना ही इन परिवारों को टूटने से बचा सकता है।
यदि आप भी मानते हैं कि न्याय और संवेदना जरूरी है, तो इस मुद्दे पर अपनी आवाज़ उठाएं।
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