अम्बाटोंगारी में सरहुल पर्व की तैयारी शुरू, 21 मार्च को निकलेगी भव्य सांस्कृतिक शोभायात्रा

अम्बाटोंगारी में सरहुल पर्व की तैयारी शुरू, 21 मार्च को निकलेगी भव्य सांस्कृतिक शोभायात्रा

author Jitendra Giri
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#खलारी #रांची #सरहुलतैयारी : अम्बाटोंगारी में बैठक कर 21 मार्च सरहुल आयोजन तय किया गया।

रांची जिले के खलारी प्रखंड के अम्बाटोंगारी गांव में सरहुल पर्व के आयोजन को लेकर सरना समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में ग्रामीणों ने 21 मार्च को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सरहुल पर्व मनाने का निर्णय लिया। इस अवसर पर क्षेत्र में भव्य शोभायात्रा निकालने की भी योजना बनाई गई। आयोजन के माध्यम से आदिवासी संस्कृति, प्रकृति के प्रति आस्था और सामुदायिक एकता को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

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  • अम्बाटोंगारी गांव में सरहुल पर्व की तैयारी को लेकर सरना समिति की बैठक आयोजित।
  • बैठक की अध्यक्षता चुरी दक्षिणी पंचायत की मुखिया मलका मुण्डा ने की।
  • आगामी 21 मार्च को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाएगा सरहुल पर्व
  • सरहुल के अवसर पर खलारी प्रखंड क्षेत्र में भव्य शोभायात्रा निकालने का निर्णय।
  • शोभायात्रा में आदिवासी पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़े, नृत्य और गीत रहेंगे मुख्य आकर्षण।

रांची जिले के खलारी प्रखंड अंतर्गत अम्बाटोंगारी गांव में सरहुल पर्व की तैयारी को लेकर सरना समिति की ओर से एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में गांव के ग्रामीणों और समाज के प्रतिनिधियों ने सरहुल पर्व के आयोजन की रूपरेखा तय की। बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि आगामी 21 मार्च को पारंपरिक रीति-रिवाज और उत्साह के साथ सरहुल पूजा का आयोजन किया जाएगा।

बैठक में यह भी तय किया गया कि सरहुल पर्व के अवसर पर खलारी प्रखंड क्षेत्र में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। इस शोभायात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होंगे और आदिवासी संस्कृति, परंपरा तथा प्रकृति के प्रति आस्था की झलक देखने को मिलेगी।

सरना समिति की बैठक में हुआ आयोजन पर विचार

सरहुल पर्व की तैयारियों को लेकर आयोजित बैठक की अध्यक्षता चुरी दक्षिणी पंचायत की मुखिया मलका मुण्डा ने की। बैठक में गांव के ग्रामीणों और सामाजिक प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर सरहुल पर्व को पारंपरिक तरीके से मनाने पर चर्चा की।

बैठक में ग्रामीणों ने इस बात पर जोर दिया कि सरहुल पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इसलिए इसे पूरे उत्साह, अनुशासन और परंपरा के अनुरूप मनाया जाना चाहिए।

ग्रामीणों ने यह भी कहा कि सरहुल पर्व के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

21 मार्च को निकलेगी भव्य शोभायात्रा

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि 21 मार्च को सरहुल पर्व के अवसर पर खलारी प्रखंड क्षेत्र में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। इस शोभायात्रा में आसपास के गांवों के लोग भी शामिल होंगे।

शोभायात्रा के दौरान आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होंगे। ढोल-नगाड़ों की धुन, पारंपरिक नृत्य और लोकगीतों के साथ यह शोभायात्रा पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बनाएगी।

आयोजन समिति के सदस्यों का कहना है कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल पर्व मनाना नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के प्रति समाज की आस्था को भी प्रदर्शित करना है।

सरहुल पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

सरहुल झारखंड सहित कई आदिवासी क्षेत्रों का प्रमुख पर्व माना जाता है। यह पर्व प्रकृति, पेड़-पौधों और धरती माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर होता है। इस दिन आदिवासी समाज के लोग साल वृक्ष के फूलों की पूजा करते हैं और गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और समाज की समृद्धि की कामना करते हैं।

सरहुल पर्व में सामूहिक पूजा, पारंपरिक नृत्य, गीत और सामाजिक मेल-जोल का विशेष महत्व होता है। यह पर्व समाज में भाईचारा, एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम भी माना जाता है।

बैठक में इन ग्रामीणों की रही भागीदारी

सरहुल पर्व के आयोजन को लेकर आयोजित इस बैठक में गांव के कई प्रमुख लोग और ग्रामीण उपस्थित रहे। बैठक में विरेंद्र मुण्डा, राहुल मुण्डा, राजेश मुण्डा, छब्बीस लोहरा, विनय मुण्डा, सुकरा लोहरा, बिरसा मुण्डा, अर्जुन मुण्डा, उमेश मुण्डा, कंदन मुण्डा, अजय मुण्डा, जगदीश मुण्डा, आशीष, विकास, सूरज और आदिता सहित अन्य ग्रामीण मौजूद थे।

सभी ग्रामीणों ने एकजुट होकर सरहुल पर्व को शांतिपूर्ण और भव्य तरीके से आयोजित करने का संकल्प लिया। बैठक में यह भी तय किया गया कि आयोजन के दौरान गांव की परंपराओं और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

संस्कृति संरक्षण के साथ सामुदायिक एकता का संदेश

बैठक में मौजूद ग्रामीणों ने कहा कि सरहुल पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आदिवासी समाज की पहचान का प्रतीक है। इसलिए इसे पूरे सम्मान और सामूहिक भागीदारी के साथ मनाना आवश्यक है।

ग्रामीणों का मानना है कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजनों से समाज में एकता मजबूत होती है और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।

न्यूज़ देखो: परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत उदाहरण

अम्बाटोंगारी में सरहुल पर्व को लेकर की जा रही तैयारियां यह दर्शाती हैं कि झारखंड का आदिवासी समाज आज भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे आयोजन केवल त्योहार नहीं बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण का माध्यम बनते हैं। प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर ऐसे आयोजनों को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने की दिशा में सहयोग करना चाहिए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संस्कृति से जुड़ें और परंपराओं को आगे बढ़ाएं

समाज की पहचान उसकी संस्कृति और परंपराओं से बनती है। सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिकता और सामाजिक एकता का संदेश देते हैं। ऐसे अवसर हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत से परिचित कराने का मौका देते हैं।

यदि आपके क्षेत्र में भी सरहुल या अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, तो उसमें सक्रिय रूप से भाग लें और अपनी परंपराओं को जीवित रखने में योगदान दें।

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Written by

खलारी, रांची

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