
#सिमडेगा #रोहतासगढ़_तीर्थ : दस राज्यों से श्रद्धालुओं की सहभागिता, पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण का संकल्प।
सिमडेगा जिले से आयोजित होने वाली 20वीं रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा 01 फरवरी को संपन्न होगी, जिसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस यात्रा में सिमडेगा जिले से लगभग 500 से अधिक तीर्थयात्री शामिल होकर रोहतासगढ़ तीर्थ धाम पहुंचेंगे। यात्रा को लेकर व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ सकें। आयोजकों के अनुसार यह यात्रा सामूहिक आस्था, पहचान और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
- 01 फरवरी को आयोजित होगी 20वीं रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा।
- 31 जनवरी की शाम सिमडेगा से सभी तीर्थयात्री होंगे रवाना।
- सिमडेगा जिले से 500 से अधिक श्रद्धालु यात्रा में लेंगे भाग।
- महादेव-पार्वती करम वृक्ष देवता की विधिवत पूजा-अर्चना होगी।
- 10 राज्यों से तीर्थयात्रियों की सहभागिता की संभावना।
सिमडेगा जिले में धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक मानी जाने वाली रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा इस वर्ष अपने 20वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। इस अवसर पर आयोजित प्रेस वार्ता में यात्रा से जुड़े संयोजकों ने तैयारियों, उद्देश्य और यात्रा की महत्ता को विस्तार से साझा किया। आयोजकों ने बताया कि 31 जनवरी की शाम सभी तीर्थयात्री सिमडेगा जिले से सामूहिक रूप से प्रस्थान करेंगे और 01 फरवरी को रोहतासगढ़ तीर्थ धाम पहुंचकर दर्शन व पूजा-अर्चना करेंगे। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम बनती जा रही है।
रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा का धार्मिक महत्व
रोहतासगढ़ तीर्थ धाम आदिवासी समाज की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां महादेव-पार्वती करम वृक्ष देवता की पूजा विशेष महत्व रखती है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर सामूहिक पूजा-अर्चना करते हैं और अपने समाज की परंपराओं को जीवंत रखते हैं। आयोजकों के अनुसार इस यात्रा के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।
सिमडेगा में प्रेस वार्ता कर दी गई जानकारी
सिमडेगा सरना स्थल में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा सिमडेगा जिले के संयोजक बसंत नारायण मांझी, सह संयोजक हरिश चंद्र भगत और सह संयोजक मुनेश्वर तिर्की ने संयुक्त रूप से यात्रा से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यात्रा में शामिल होने वाले सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया है कि वे पारंपरिक वेशभूषा और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ रोहतासगढ़ तीर्थ धाम में सम्मिलित हों, ताकि सांस्कृतिक स्वरूप और गरिमा बनी रहे।
दस राज्यों से आएंगे श्रद्धालु
समाजसेवी मुनेश्वर तिर्की ने जानकारी देते हुए बताया कि इस वर्ष की रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा में देश के 10 राज्यों से तीर्थयात्रियों के शामिल होने की संभावना है।
मुनेश्वर तिर्की ने कहा: “रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा हमारी आस्था, संस्कृति और पहचान का प्रतीक है। इस यात्रा के माध्यम से विभिन्न राज्यों से आए लोग एक मंच पर एकत्र होकर अपनी परंपरा को जीवित रखते हैं।”
उन्होंने आगे बताया कि प्रमुख अतिथियों के विचारों को सुनकर श्रद्धालु लाभान्वित होंगे और धर्म, संस्कृति, परंपरा व सामाजिक पहचान की रक्षा हेतु सामूहिक संकल्प लेंगे।
हर वर्ष बढ़ती जा रही है सहभागिता
आयोजकों के अनुसार हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी जिलेवासियों से अधिक से अधिक संख्या में रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा में शामिल होने का आग्रह किया गया है। 20वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी यह यात्रा अब एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले चुकी है, जिसमें युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की समान सहभागिता देखी जा रही है। इससे समाज में एकता, सहयोग और सामूहिक चेतना का भाव मजबूत होता है।
आयोजन में मौजूद रहे प्रमुख लोग
प्रेस वार्ता के दौरान यात्रा से जुड़े कई सामाजिक कार्यकर्ता और प्रतिनिधि उपस्थित रहे। इनमें संतोष दास, बाबूलाल उरांव, चंदेश्वर मुंडा, ममता देवी, उर्मिला देवी, रविंद्र बड़ाइक, बिरसा मुंडा, चंद्रिका भगत, योगेंद्र मांझी, धर्मदेव बिंझिया और महेश सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे। सभी ने यात्रा की सफलता के लिए सामूहिक प्रयास और सहयोग का भरोसा जताया।
न्यूज़ देखो: सांस्कृतिक पहचान को सहेजने का सामूहिक प्रयास
रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा यह दर्शाती है कि आज भी समाज अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर सजग है। इतने बड़े स्तर पर श्रद्धालुओं की सहभागिता सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का मजबूत उदाहरण है। यह आयोजन प्रशासन और समाज दोनों के लिए सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है। आने वाले वर्षों में इस यात्रा को और सुव्यवस्थित व व्यापक स्वरूप देने की आवश्यकता है।
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आस्था, संस्कृति और एकता का संदेश
रोहतासगढ़ तीर्थ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। जब समाज अपने पर्व, परंपरा और विश्वास के लिए एकजुट होता है, तभी उसकी पहचान सशक्त होती है। ऐसे आयोजनों में सहभागिता हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत आधार तैयार करती है।





