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रामबांध तालाब की अनदेखी पर जनता में रोष: ज्योति प्रकाश बोले प्रशासन केवल खानापूर्ति कर रहा है, टूटा गेट दे रहा हादसे को न्योता

#गढ़वा #जनसमस्या : रामबांध तालाब की अधूरी सफाई और जर्जर स्थिति पर नाराज़गी, स्थायी समाधान की उठी मांग
  • रामबांध तालाब की सफाई अधूरी, केवल विसर्जन स्थल तक सीमित।
  • जर्जर गेट और टूट-फूट, हादसे की आशंका बढ़ी।
  • ज्योति प्रकाश का प्रशासन पर हमला, कहा- जिम्मेदारी से बच रहा है।
  • स्थानीय लोगों की चिंता, हर साल केवल खानापूर्ति होती है।
  • 2013 में सौंदर्यीकरण योजना शुरू, लेकिन आज भी अधूरी।

गढ़वा। शहर के बीचोंबीच स्थित ऐतिहासिक रामबांध तालाब इस बार भी प्रशासन की खानापूर्ति की भेंट चढ़ता दिख रहा है। जनप्रतिनिधियों की मांग और “कॉफी विद एसडीएम” कार्यक्रम में एसडीओ के संज्ञान लेने के बाद सफाई का काम तो शुरू हुआ, लेकिन यह केवल विसर्जन स्थल तक सीमित रह गया। बाकी तालाब गंदगी और जर्जर हालत में जस का तस पड़ा है।

ज्योति प्रकाश का कड़ा बयान

व्यवसायी और समाजसेवी ज्योति प्रकाश ने इस पर नाराज़गी जताते हुए कहा,

“पूरा तालाब जर्जर है, गेट टूटा हुआ है। दुर्गा पूजा विसर्जन में हजारों की भीड़ जुटती है। ऐसे हालात में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। प्रशासन सिर्फ दिखावा कर रहा है और स्थायी समाधान से बच रहा है।”

उनका कहना है कि यह मामला केवल सुंदरता का नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और गढ़वा की सांस्कृतिक धरोहर का प्रश्न है।

अधूरी योजना और अधूरा सपना

गौरतलब है कि 6 फरवरी 2013 को तत्कालीन नगर परिषद अध्यक्ष अनिता दत्त और उपाध्यक्ष अलखनाथ पांडेय ने रामबांध तालाब के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का शिलान्यास किया था। लगभग 24 लाख रुपये की लागत से इसमें फूलों का पार्क और बोटिंग की योजना बनाई गई थी। उस समय दावा किया गया था कि यह तालाब गढ़वा की पहचान बनेगा।

लेकिन बारह साल बाद भी स्थिति वैसी की वैसी है। न पार्क बना, न बोटिंग शुरू हुई और न ही तालाब की स्थायी मरम्मत हो सकी। आज यह स्थल उपेक्षा और गंदगी का अड्डा बन चुका है।

जनता की आवाज़

स्थानीय लोगों ने कहा कि ज्योति प्रकाश ने उनकी ही चिंता को आवाज़ दी है। हर साल तालाब की सफाई और मरम्मत की बातें तो होती हैं, लेकिन काम सिर्फ विसर्जन तक सीमित रह जाता है। इस रवैये से लोगों का प्रशासन पर से भरोसा उठ रहा है।

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न्यूज़ देखो: धरोहर की अनदेखी, जिम्मेदारी से बचाव

रामबांध तालाब सिर्फ जलाशय नहीं, बल्कि गढ़वा की संस्कृति और आस्था का केंद्र है। ऐसे में प्रशासन की आधी-अधूरी कोशिशें न सिर्फ सुरक्षा को खतरे में डालती हैं, बल्कि जनता की भावनाओं से खिलवाड़ भी है। अब वक्त है कि खानापूर्ति से आगे बढ़कर इसे स्थायी समाधान मिले।

हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

अब बदलाव की मांग जनता की जुबान पर

गढ़वा की जनता की उम्मीद है कि यह तालाब एक बार फिर से शहर की पहचान और धरोहर के रूप में विकसित हो। समय आ गया है कि सभी लोग अपनी आवाज़ उठाएं और इस मुद्दे को गंभीरता से लें। आप भी अपनी राय कमेंट करें और इस खबर को शेयर करें ताकि प्रशासन तक जनता की आवाज़ पहुंचे।

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