#नागालैंड #पुण्यतिथि_स्मरण : महान स्वतंत्रता सेनानी रानी गाइदिनल्यू के योगदान को नमन।
नागालैंड की महान स्वतंत्रता सेनानी रानी गाइदिनल्यू की पुण्यतिथि पर देशभर में उनके अद्वितीय योगदान को याद किया जा रहा है। किशोरावस्था में ही उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हेराका आंदोलन का नेतृत्व किया और लंबे कारावास के बावजूद संघर्ष जारी रखा। उनका जीवन पूर्वोत्तर भारत में स्वतंत्रता चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक रहा है। राष्ट्र उन्हें साहस, नेतृत्व और देशभक्ति की मिसाल के रूप में स्मरण करता है।
- रानी गाइदिनल्यू ने किशोरावस्था में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह किया।
- जन्म 26 जनवरी 1915, लोंगकाओ गाँव, तमेंगलोंग क्षेत्र।
- वर्ष 1932 में गिरफ्तारी, लगभग 14 वर्ष का कारावास।
- जवाहरलाल नेहरू ने दिया ‘रानी’ की उपाधि।
- वर्ष 1982 में पद्म भूषण से सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल महानगरों और समतल मैदानों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी ज्योति पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम पर्वतीय और वन क्षेत्रों तक प्रज्वलित रही। इसी संघर्ष की अग्निशिखा थीं रानी गाइदिनल्यू, जिन्होंने कम आयु में ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का नेतृत्व किया और अपने समाज, संस्कृति तथा स्वतंत्रता के अधिकार के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनकी पुण्यतिथि पर देश उनके अदम्य साहस, नेतृत्व क्षमता और अटूट राष्ट्रभक्ति को स्मरण कर रहा है।
बचपन से ही विद्रोह की चेतना
रानी गाइदिनल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 को नागा समुदाय के एक साधारण किसान परिवार में तमेंगलोंग क्षेत्र के लोंगकाओ गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम लोथोनांग पमेई था। बचपन से ही उन्होंने ब्रिटिश शासन के दमन और शोषण को अपने आसपास देखा, जिसने उनके मन में स्वतंत्रता की तीव्र चेतना जगाई।
कम आयु में ही वे अपने चचेरे भाई जादोनांग के नेतृत्व में चल रहे ‘हेराका आंदोलन’ से जुड़ गईं। यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि नागा संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान की रक्षा से भी जुड़ा हुआ था। गाइदिनल्यू की प्रतिभा, साहस और वाकपटुता ने उन्हें शीघ्र ही आंदोलन का महत्वपूर्ण स्तंभ बना दिया।
सोलह वर्ष की आयु में संभाली आंदोलन की कमान
सन् 1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा जादोनांग को फांसी दिए जाने के बाद आंदोलन को बड़ा झटका लगा, लेकिन गाइदिनल्यू ने हार नहीं मानी। मात्र सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में संभाली और नागा समुदाय को एकजुट करने का अभियान तेज किया।
उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कर न देने का आह्वान किया और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। पहाड़ों, जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों का उपयोग कर वे अंग्रेजी सेना को चुनौती देती रहीं। उनके साथ हजारों नागा योद्धा जुड़े, जो स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए संघर्षरत थे।
गिरफ्तारी और चौदह वर्ष का लंबा कारावास
ब्रिटिश प्रशासन ने उनके प्रभाव को देखते हुए विशेष अभियान चलाया और अंततः 17 अक्टूबर 1932 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय उनकी आयु केवल सत्रह वर्ष थी। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और विभिन्न जेलों में रखा गया।
सन् 1937 में पंडित जवाहरलाल नेहरू शिलांग जेल में उनसे मिलने पहुंचे। उनकी वीरता से प्रभावित होकर नेहरू ने उन्हें ‘नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई’ कहा और ‘रानी’ की उपाधि दी। इसके बाद से वे ‘रानी गाइदिनल्यू’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा: “यह बालिका असाधारण साहस और नेतृत्व की प्रतीक है।”
लगभग 1933 से 1947 तक वे जेल में रहीं, लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका मनोबल कभी नहीं टूटा।
स्वतंत्रता के बाद भी समाज सेवा का संकल्प
भारत की स्वतंत्रता के बाद 15 अगस्त 1947 को उनकी रिहाई हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी उन्होंने अपना जीवन नागा जनजाति की संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वे अलगाववादी प्रवृत्तियों का विरोध करती रहीं और भारत की एकता एवं अखंडता की समर्थक बनी रहीं।
उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई, महिलाओं के उत्थान, शिक्षा के प्रसार और सामुदायिक एकजुटता पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता साथ-साथ आगे बढ़ सकती हैं।
राष्ट्र द्वारा दिए गए सम्मान और मान्यता
रानी गाइदिनल्यू के योगदान को राष्ट्र ने समय-समय पर सम्मानित किया। वर्ष 1972 में उन्हें ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी सम्मान प्रदान किया गया। वर्ष 1982 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया। इसके अतिरिक्त उन्हें विवेकानंद सेवा सम्मान सहित अन्य सम्मानों से भी नवाजा गया।
उनकी स्मृति में वर्ष 1996 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया तथा उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर स्मारक सिक्का भी जारी किया गया। इम्फाल सहित कई स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो आज भी उनके संघर्ष की प्रेरणा देती हैं।
अमर विरासत और ऐतिहासिक महत्व
17 फरवरी 1993 को रानी गाइदिनल्यू का निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि आयु, परिस्थितियां और संसाधनों की कमी किसी भी सच्चे देशभक्त के संकल्प को कमजोर नहीं कर सकतीं।
पूर्वोत्तर भारत के इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए भी संघर्ष किया।
उनकी गाथा यह भी दर्शाती है कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई केवल 1857 या मुख्यधारा के आंदोलनों तक सीमित नहीं थी, बल्कि दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों में भी स्वतंत्रता की मशाल प्रज्वलित थी।
न्यूज़ देखो: पूर्वोत्तर की उपेक्षित नायिका का राष्ट्रीय पुनर्स्मरण
रानी गाइदिनल्यू का जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारत की स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वोत्तर क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। लंबे समय तक मुख्यधारा इतिहास में उनकी उपेक्षा हुई, लेकिन अब उनका पुनर्स्मरण राष्ट्रीय संतुलन और ऐतिहासिक न्याय की दिशा में आवश्यक कदम है। उनके संघर्ष से यह भी स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता साथ-साथ मजबूत हो सकती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
वीरांगनाओं की विरासत को याद रखना हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी
इतिहास तभी जीवित रहता है जब हम अपने नायकों को याद रखते हैं।
रानी गाइदिनल्यू जैसी विभूतियां नई पीढ़ी के लिए साहस और देशभक्ति की प्रेरणा हैं।
आइए, उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें।
ऐसी महान हस्तियों की गाथा को बच्चों और युवाओं तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
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