प्रकृति पर्व सरहुल में झूम उठा बोलबा, शोभा यात्रा और पारंपरिक अनुष्ठानों ने बांधा समां

प्रकृति पर्व सरहुल में झूम उठा बोलबा, शोभा यात्रा और पारंपरिक अनुष्ठानों ने बांधा समां

author Shivnandan Baraik
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#बोलबा #सिमडेगा #सरहुल_पर्व : आदिवासी परंपरा और प्रकृति पूजन के साथ धूमधाम से आयोजन।

सिमडेगा जिले के बोलबा प्रखंड में सरहुल पर्व बड़े उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर प्रखंड मुख्यालय और कुंडुरमुंडा गांव में भव्य शोभा यात्रा और पूजन कार्यक्रम आयोजित हुए। जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी ने आयोजन को खास बना दिया। यह पर्व प्रकृति, जंगल और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण का संदेश देता है।

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  • बोलबा प्रखंड मुख्यालय और कुंडुरमुंडा गांव में धूमधाम से सरहुल पर्व का आयोजन।
  • विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी ने प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश।
  • पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य मंडलियों की शानदार शोभा यात्रा निकली।
  • 26 मौजा के पहान-पुजारियों ने पाट सरना में विधिवत पूजा-अर्चना की।
  • कार्यक्रम में अंचल अधिकारी, थाना प्रभारी और जनप्रतिनिधियों की रही सक्रिय भागीदारी।

सिमडेगा जिले के बोलबा प्रखंड में प्रकृति पर्व सरहुल को लेकर पूरे क्षेत्र में उल्लास और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला। प्रखंड मुख्यालय सहित कुंडुरमुंडा गांव में आयोजित इस पर्व में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने हिस्सा लिया। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुए इस आयोजन में आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली, जिसने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया।

प्रकृति और संस्कृति का अनूठा संगम

सरहुल पर्व आदिवासी समाज का एक प्रमुख त्योहार है, जो प्रकृति और पर्यावरण के प्रति उनकी गहरी आस्था को दर्शाता है। इस अवसर पर कोलेबिरा विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी ने सभी लोगों को पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आदिवासी समाज का अस्तित्व जंगल, पहाड़ और नदियों से जुड़ा हुआ है।

विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी ने कहा: “प्रकृति से हमारा गहरा संबंध है। जंगल बचेगा तभी आदिवासी समाज सुरक्षित रहेगा।”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण और संतुलन बनाए रखने की सीख देते हैं।

भव्य शोभा यात्रा बनी आकर्षण का केंद्र

सरहुल पर्व के मौके पर बोलबा प्रखंड मुख्यालय में एक विशाल शोभा यात्रा निकाली गई। यह यात्रा बोलबा बाजार टांड़ से शुरू होकर बोलबा थाना परिसर तक पहुंची। इसमें कुंडुरमुंडा पढ़हा टीम, अवगा, छप्पलपानी, माधोटांड, किलेसरा, पाकरबाहर और बोलबा सहित कई गांवों की नृत्य मंडलियां शामिल हुईं।

पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियों ने ढोल-नगाड़ों और बाजा-गाजा के साथ आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूरे रास्ते में लोग इस शोभा यात्रा का स्वागत करते नजर आए।

विधिवत पूजा-अर्चना से मांगी सुख-समृद्धि

इस पर्व के दौरान प्रखंड के सभी 26 मौजा के पहान और पुजारियों ने बोलबा शंख स्थित पाट सरना स्थल पर विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने पूरे क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।

सरना स्थल पर पारंपरिक विधियों से पूजा की गई, जिसमें प्रकृति के विभिन्न तत्वों की आराधना की गई। यह अनुष्ठान आदिवासी समाज की प्रकृति के प्रति आस्था और उनके जीवन दर्शन को दर्शाता है।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की रही मौजूदगी

कार्यक्रम में कई जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति रही। इस मौके पर अंचल अधिकारी सुधांशु पाठक, थाना प्रभारी देवीदास मुर्मू, प्रमुख सुनीता केरकेता, मुखिया सुरजन बड़ाइक, ग्राम प्रधान मोतीराम सेनापति, सरना समिति के सचिव देवेंद्र भगत सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।

सभी ने सरहुल पर्व के महत्व को बताते हुए इसे समाज की एकता और संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक बताया।

ग्रामीणों में दिखा उत्साह और एकता

सरहुल पर्व के दौरान पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल देखने को मिला। गांव-गांव से आए लोग इस आयोजन में शामिल हुए और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पर्व को मनाया। महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की सक्रिय भागीदारी ने आयोजन को और भी खास बना दिया।

यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक एकता और सामूहिकता का भी प्रतीक है।

न्यूज़ देखो: प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत संदेश

सरहुल पर्व का आयोजन यह दर्शाता है कि आधुनिकता के दौर में भी आदिवासी समाज अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यह पर्व प्रकृति संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है, जो आज के समय में बेहद जरूरी है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भागीदारी भी इस आयोजन को मजबूती देती है। सवाल यह है कि क्या हम इस संदेश को अपने दैनिक जीवन में भी अपनाएंगे? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति बचाने का संकल्प लें, संस्कृति को आगे बढ़ाएं

सरहुल सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है।
आज जरूरत है कि हम जंगल, पानी और पर्यावरण को बचाने के लिए जागरूक बनें।
अपने आसपास पेड़ लगाएं, प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से बचें और दूसरों को भी प्रेरित करें।
आदिवासी संस्कृति से सीख लेकर हम एक बेहतर और संतुलित जीवन जी सकते हैं।

आइए, इस सरहुल पर्व पर हम सब मिलकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें। अपनी राय कमेंट में साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और जागरूकता फैलाने में अपनी भूमिका निभाएं।

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Written by

बानो, सिमडेगा

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