सिमडेगा के सलडेगा सरना स्थल पर धूमधाम से मनाया गया सरहुल पर्व, पाहनों ने की विशेष पूजा

सिमडेगा के सलडेगा सरना स्थल पर धूमधाम से मनाया गया सरहुल पर्व, पाहनों ने की विशेष पूजा

author Satyam Kumar Keshri
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#सिमडेगा #सरहुल_पर्व : सरना स्थल सलडेगा में श्रद्धा और परंपरा के साथ पूजा संपन्न।

सिमडेगा के सलडेगा सरना स्थल पर केंद्रीय सरना समिति के नेतृत्व में 21 मार्च को सरहुल पर्व धूमधाम से मनाया गया। अध्यक्ष हरिश्चन्द्र भगत की अगुवाई में पाहनों द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। सैकड़ों सरना धर्मावलंबियों ने इसमें भाग लिया। यह आयोजन प्रकृति, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर सामने आया।

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  • सलडेगा सरना स्थल पर भव्य रूप से मनाया गया सरहुल पर्व।
  • हरिश्चन्द्र भगत की अगुवाई में पाहनों ने की पूजा-अर्चना।
  • सैकड़ों सर्ना धर्मावलंबियों की रही सक्रिय भागीदारी।
  • प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति से बढ़ी आयोजन की गरिमा।
  • प्रकृति संरक्षण और सामाजिक एकता का दिया गया संदेश।

सिमडेगा जिले के सलडेगा स्थित सरना स्थल पर केंद्रीय सरना समिति के तत्वावधान में प्रकृति पर्व सरहुल पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग एकत्रित हुए और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना में भाग लिया। कार्यक्रम की अगुवाई समिति के अध्यक्ष हरिश्चन्द्र भगत ने की।

पाहनों द्वारा विधि-विधान से पूजा संपन्न

सरहुल पर्व के अवसर पर पाहनों द्वारा पारंपरिक विधि-विधान के साथ सरना स्थल पर पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान बाबूलाल पहान सहित अन्य पाहनों ने धरती माता और प्रकृति देवताओं की आराधना करते हुए वर्षा, अच्छी फसल, स्वास्थ्य और सुख-शांति की कामना की।

पूजा के दौरान पूरे वातावरण में श्रद्धा और आस्था का भाव देखने को मिला। लोगों ने प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए इस पर्व को मनाया।

बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति

इस आयोजन में विजय उरांव, माघी उरांव, प्रदीप उरांव, सुबोध उरांव, खुनवा उरांव, संजय उरांव, जगमोहन, आनन्द मांझी, बिनोद, रबिन्द्र भगत, ललिता उरांव, रूप अगुस्तिना किंडो, सरस्वती, नीलिमा कुजूर, अनुपमा, रूपवंती उरांव, सोनी देवी, अंजलीना बरला, मारिया केरकेट्टा, मनकी उरांव, सुनीता कच्छप, सुस्मिता बरला, सुमित्रा टोप्पो, बसंती उरांव, सरो कुमारी, बिरसा मुंडा, शंकर भगत, संजीत तिर्की, संजय उरांव सहित सैकड़ों सरना धर्मावलंबी भाई-बहनों ने भाग लिया।

प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी

कार्यक्रम में प्रशासन की ओर से अनुमण्डल पदाधिकारी प्रभात रंजन ज्ञानी, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी पलटू महतो सहित मीडिया प्रतिनिधि आशीष शास्त्री और विकास कुमार साहू भी उपस्थित रहे। उनकी उपस्थिति से आयोजन की गरिमा और बढ़ गई।

सरहुल पर्व का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

सरहुल आदिवासी समाज का एक प्रमुख और पवित्र पर्व है, जिसे सरना धर्म के अनुयायी बड़े श्रद्धा भाव से मनाते हैं। यह पर्व प्रकृति, पर्यावरण और धरती माता के प्रति आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक है।

इस पर्व का आयोजन वसंत ऋतु में किया जाता है, जब पेड़-पौधों में नए फूल और पत्ते आते हैं। इसे नई शुरुआत, समृद्धि और जीवन के नवोदय का प्रतीक माना जाता है। सरहुल में साल वृक्ष के फूल और पत्तों का विशेष महत्व होता है, जिनकी पूजा कर उन्हें घरों में स्थापित किया जाता है।

आयोजकों ने कहा: “सरहुल केवल पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है।”

सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा माहौल

सरहुल पर्व के दौरान पारंपरिक नृत्य-गीतों का भी आयोजन किया गया। मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर युवक-युवतियां झूम उठे। पूरे वातावरण में उत्सव और उल्लास का माहौल देखने को मिला।

यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश

सरहुल पर्व का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण संरक्षण है। इस अवसर पर पेड़ों, जंगलों और जल स्रोतों की पूजा कर यह संदेश दिया जाता है कि प्रकृति ही जीवन का आधार है और इसकी रक्षा करना सभी का कर्तव्य है।

आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की परंपरा को निभाता आया है और सरहुल उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है।

न्यूज़ देखो: प्रकृति और संस्कृति के संगम का जीवंत उदाहरण

सलडेगा सरना स्थल पर आयोजित यह सरहुल पर्व यह दर्शाता है कि आदिवासी समाज आज भी अपनी परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़े हुए हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। ऐसे पर्व हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम भी प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति से जुड़ें, संस्कृति को अपनाएं और भविष्य सुरक्षित बनाएं

सरहुल हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के बिना जीवन अधूरा है। आज के समय में जब पर्यावरण संकट बढ़ रहा है, तब ऐसे पर्व हमें जागरूक करने का काम करते हैं।

आइए हम भी प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें और अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाएं। अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें, इस खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश फैलाएं।

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Written by

सिमडेगा नगर क्षेत्र

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