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पशु हाट बाजार में अवैध उगाही का गंभीर मामला, सरकारी शुल्क की खुलेआम अनदेखी

#मेदिनीनगर #पशुबाजार : तरहसी प्रखंड के साप्ताहिक हाट में मनमानी वसूली से किसान परेशान।

मेदिनीनगर के तरहसी प्रखंड कार्यालय के समीप लगने वाले साप्ताहिक पशु हाट बाजार में अवैध उगाही के गंभीर आरोप सामने आए हैं। ग्रामीण किसानों और पशु व्यवसायियों का आरोप है कि तय सरकारी शुल्क को नजरअंदाज कर ठेकेदारी से जुड़े लोग भारी राशि वसूल रहे हैं। इस कथित वसूली से गरीब और छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। मामले ने प्रशासनिक निगरानी और बाजार व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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  • तरहसी प्रखंड कार्यालय के पास लगने वाला साप्ताहिक पशु हाट विवादों में।
  • संजय कुमार पांडे और उनके दलालों पर अवैध वसूली का आरोप।
  • सरकारी शुल्क 50–100 रुपये, वसूली 700–800 रुपये तक।
  • बिना रसीद और ऑनलाइन भुगतान कराने की शिकायत।
  • विरोध करने पर पशु जब्ती और धमकी का आरोप।

मेदिनीनगर के तरहसी प्रखंड कार्यालय के बगल में आयोजित होने वाला साप्ताहिक पशु हाट बाजार इन दिनों किसानों और पशु व्यवसायियों की नाराजगी का केंद्र बन गया है। बाजार में पशु खरीदने और बेचने आने वाले ग्रामीणों का आरोप है कि यहां तय सरकारी दरों को दरकिनार कर अवैध रूप से भारी राशि वसूली जा रही है। यह स्थिति खासकर गरीब और छोटे किसानों के लिए आर्थिक और मानसिक परेशानी का कारण बन रही है।

कहां और कैसे हो रही है कथित अवैध वसूली

ग्रामीणों के अनुसार, तरहसी प्रखंड कार्यालय के समीप लगने वाला यह पशु हाट बाजार क्षेत्र के किसानों के लिए आजीविका का महत्वपूर्ण माध्यम है। यहां दूर-दराज के गांवों से लोग पशु खरीदने और बेचने आते हैं। लेकिन आरोप है कि बाजार में संजय कुमार पांडे और उनके दलालों द्वारा सरकारी नियमों की अनदेखी करते हुए मनमानी वसूली की जा रही है। किसानों का कहना है कि बाजार में प्रवेश या पशु खरीद-बिक्री के नाम पर उनसे तय शुल्क से कई गुना अधिक राशि ली जा रही है।

तय सरकारी दर और वास्तविक वसूली में बड़ा अंतर

किसानों और व्यवसायियों का कहना है कि पशु हाट में सरकारी शुल्क मात्र 50 से 100 रुपये निर्धारित है। इसके बावजूद ठेकेदार और उनसे जुड़े दलालों द्वारा 400, 700 और यहां तक कि 800 रुपये तक की वसूली की जा रही है। यह राशि किसी आधिकारिक प्रक्रिया या रसीद के बिना ली जा रही है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बिना रसीद और ऑनलाइन माध्यम से वसूली के आरोप

बजलपुर गांव निवासी नारद कुमार सिंह सहित कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि उनसे वसूली गई राशि के बदले कोई रसीद नहीं दी जाती। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि कई बार फोन-पे जैसे ऑनलाइन माध्यम से भुगतान करने के लिए मजबूर किया जाता है। किसानों के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया सुनियोजित तरीके से की जा रही है, ताकि वसूली का कोई लिखित प्रमाण न रहे।

विरोध करने पर डराने-धमकाने और पशु जब्ती की शिकायत

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जब कोई किसान या पशु व्यवसायी अवैध राशि देने से इनकार करता है, तो ठेकेदार के दलाल खरीदे गए पशुओं को जब्त कर लेते हैं और उन्हें डराया-धमकाया जाता है। इस कारण गरीब और सीधे-साधे किसान मजबूरी में चुपचाप पैसा देने को विवश हो जाते हैं। कई किसानों ने बताया कि विरोध करने पर उन्हें भविष्य में बाजार में प्रवेश न देने की धमकी भी दी जाती है।

प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका

स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी खुली अवैध वसूली बिना किसी संरक्षण के संभव नहीं है। ग्रामीणों को आशंका है कि इस पूरे मामले में ठेकेदार, दलालों के साथ-साथ कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत भी हो सकती है। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

किसानों और व्यवसायियों की प्रशासन से मांग

पीड़ित किसानों और पशु व्यवसायियों ने जिला उपायुक्त और संबंधित उच्च अधिकारियों से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उन्होंने मांग की है कि पशु हाट बाजार में सरकारी दरों का सख्ती से पालन, रसीद प्रणाली लागू करने और अवैध वसूली में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। किसानों का कहना है कि पशु हाट बाजार उनकी आजीविका का साधन है, न कि शोषण का केंद्र।

न्यूज़ देखो: पशु हाट में पारदर्शिता पर सवाल

तरहसी का पशु हाट बाजार ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा है, लेकिन अवैध वसूली के आरोप प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी उजागर करते हैं। यदि तय नियमों का पालन नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर किसानों की आय और विश्वास पर पड़ेगा। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी तत्परता से कार्रवाई करता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सजग किसान, जवाबदेह व्यवस्था की जरूरत

पशु हाट बाजार केवल लेन-देन का स्थान नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की रीढ़ है। जब नियम टूटते हैं, तो सबसे अधिक नुकसान कमजोर वर्ग को होता है। ऐसे में जरूरी है कि किसान अपनी आवाज एकजुट होकर उठाएं और प्रशासन पारदर्शिता सुनिश्चित करे। इस मुद्दे पर आपकी राय क्या है, कमेंट कर जरूर बताएं, खबर को साझा करें और जागरूकता फैलाने में अपनी भूमिका निभाएं।

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Nitish Kumar Paswan

पांकी पलामू

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