
#बिशुनपुर #धार्मिक_मेला : राम–सीता से जुड़ी मान्यताओं, रहस्यमय जलधारा और 2003 से जारी मेले की परंपरा का भव्य आयोजन।
- बिशुनपुर प्रखंड के जोरी–बनालत के बीच बसे “श्री राम–सीता छुवा” में हर अघन पूर्णिमा को मेला।
- 2003 से लगातार आयोजित—स्थानीय ग्रामीणों की भूमिका महत्वपूर्ण।
- पौराणिक मान्यता: श्रीराम ने बाण से जलधारा प्रवाहित की—आज भी बहती है।
- “सात खाटी गहराई” का रहस्य कायम—वास्तविक गहराई मापी नहीं जा सकी।
- हजारों श्रद्धालु स्नान, पूजा-अर्चना और मेले का आनंद लेने पहुंचते हैं।
बिशुनपुर प्रखंड के जोरी–बनालत गांव के मध्य स्थित “श्री राम–सीता छुवा” मंदिर क्षेत्र हर वर्ष अघन पूर्णिमा को भव्य धार्मिक मेले का केंद्र बन जाता है। वर्ष 2003 से संगठित रूप में शुरू हुआ यह आयोजन आज पूरे गुमला जिले और आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के लिए आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यहां बहने वाली पौराणिक जलधारा, धार्मिक मान्यताएं, घने जंगलों का सौंदर्य और मेले की रौनक—सब मिलकर इस स्थल को खास बना देते हैं। श्रद्धालु स्नान, पूजा और दर्शन कर पुण्य प्राप्ति की कामना करते हुए दिनभर मेले का आनंद उठाते हैं।
पौराणिक मान्यता: धरती से प्रकट हुई जलधारा
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, अघन महीने में माता सीता के प्यास लगने पर भगवान श्रीराम ने अपने बाण से धरती को भेदा था, और उसी स्थान पर जलधारा फूट पड़ी थी।
आज उसी स्थान को “सीता छुवा” के रूप में जाना जाता है, जहां का पानी अब भी लगातार बह रहा है और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सर्वोच्च केंद्र है।
सात खाटी गहराई: अद्भुत लेकिन अनसुलझा रहस्य
ग्रामीणों का कहना है कि इस जलस्रोत की गहराई “सात खाटी” है।
बुजुर्गों के अनुसार, कई बार इसकी गहराई मापने की कोशिशें हुईं, लेकिन यह अब तक पूरी तरह माप में नहीं आ सकी।
स्थानीय लोगों के लिए यह स्थान उतना ही रहस्यमय है जितना पवित्र।
2003 से संगठित रूप में शुरू हुआ मेला
कई वर्षों तक यह स्थान सिर्फ पूजा-अर्चना के लिए जाना जाता था।
लेकिन 2003 में ग्रामीणों की पहल पर यहां नियमित “राम–सीता छुवा मेला” की शुरुआत हुई।
तब से—
- मेला हर साल अघन पूर्णिमा पर आयोजित होता है।
- स्थानीय समुदाय व्यापक स्तर पर सहयोग करता है।
- श्रृद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
आज यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है।
श्रद्धालुओं का सैलाब: पूजा–दर्शन और मेला उत्सव
मेले के दिन सुबह से ही हजारों की संख्या में ग्रामीण, श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
लोग सीता छुवा में पवित्र स्नान कर अपने जीवन की मंगलकामनाओं के लिए पूजा-अर्चना करते हैं।
मेले में लगती हैं—
- खिलौनों की दुकानें
- मिठाई और नाश्ते की दुकानें
- घरेलू उपयोग के सामान
- पूजा सामग्री
- ग्रामीण हस्तशिल्प
बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए यह स्थान उत्सव का दिन बन जाता है।
प्राकृतिक सौंदर्य भी है प्रमुख आकर्षण
घने जंगलों, ऊँची पहाड़ियों और प्राकृतिक शांत वातावरण से घिरा “सीता छुवा” ग्रीष्मकाल में भी ठंडे जल के कारण विशेष अनुभव देता है।
लोकमान्यता है कि यहां का जल शुद्ध, पवित्र और चमत्कारी माना जाता है।
आस्था और मनोकामनाओं का पवित्र स्थल
ग्रामीण बताते हैं कि “सीता छुवा” में किए गए संकल्प और पूजा से—
- बीमारी से राहत
- संतान प्राप्ति
- रोजगार
- पारिवारिक सुख-शांति
जैसी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
इसी कारण यह स्थल पूरे वर्ष भक्तों की भीड़ से भरा रहता है, जबकि अघन पूर्णिमा को सबसे बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

न्यूज़ देखो: परंपरा संजोने में ग्रामीणों की बड़ी भूमिका
“श्री राम–सीता छुवा मेला” यह दिखाता है कि जनसमुदाय की भागीदारी किस प्रकार किसी पौराणिक स्थल को सांस्कृतिक धरोहर में बदल सकती है। सरकार और प्रशासन को यहां के बुनियादी ढांचे, पर्यटन व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंधन पर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि यह पवित्र स्थल भविष्य में और विकसित हो सके। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आस्था से आगे बढ़कर धरोहर के संरक्षण में भी हम सबकी जिम्मेदारी
“सीता छुवा” सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बिशुनपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है। इसकी पौराणिक धरोहर को सुरक्षित रखना स्थानीय समुदाय और प्रशासन दोनों का कर्तव्य है।
जरूरी है कि लोग स्वच्छता, संरक्षण और विकास के प्रयासों में सहयोग करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस पवित्र स्थल की अनुभूति कर सकें।
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