
#विश्रामपुर #मौनी_अमावस्या : मौन व्रत और गंगा स्नान से आत्मशुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का विधान।
पलामू जिले के विश्रामपुर में ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने मौनी अमावस्या के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे वर्ष का सबसे कठिन और पुण्यदायी व्रत बताया है। उन्होंने कहा कि इस दिन गंगा स्नान, मौन व्रत, दान-पुण्य और पूजा-पाठ से विशेष आध्यात्मिक फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन गंगाजल अमृत स्वरूप हो जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह तिथि आत्मशुद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
- मौनी अमावस्या को वर्ष का सबसे कठिन व्रत माना जाता है।
- गंगा स्नान से आत्मिक शुद्धि और मोक्ष की मान्यता।
- प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन विशेष पुण्य स्थल।
- दिनभर मौन व्रत, दान-पुण्य और पूजा का विधान।
- शिव-पार्वती पूजा इस दिन विशेष फलदायी।
मौनी अमावस्या को लेकर धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व है। ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने बताया कि यह व्रत केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और आत्मिक साधना का भी प्रतीक है। इस दिन मौन रहकर आत्मचिंतन, ईश्वर स्मरण और दान-पुण्य करने से साधक को विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
क्यों विशेष है मौनी अमावस्या
ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी के अनुसार, मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान धन्वंतरि के हाथ से अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरी थीं। ये बूंदें प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन जैसे तीर्थ स्थलों पर गिरीं, जिससे वहां की नदियां और जल अमृत तुल्य हो गए। मौनी अमावस्या के दिन इन तीर्थों में स्नान करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि जो लोग तीर्थ नहीं जा सकते, वे अपने स्थान पर ही गंगाजल से स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
मौन व्रत और शिव-पार्वती पूजन का विधान
इस दिन दिनभर मौन रहना अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। मौन व्रत से मन की चंचलता शांत होती है और साधक का ध्यान ईश्वर की ओर केंद्रित होता है। साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा इस दिन विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
ज्योतिषाचार्य ने कहा:
ज्योतिषाचार्य राम निवास तिवारी ने कहा: “मौनी अमावस्या पर मौन, स्नान और दान से आत्मा शुद्ध होती है और व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है।”
मौनी अमावस्या की पौराणिक व्रत कथा
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, कांचीपुरी में देवस्वामी नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी धनवती, सात पुत्रों और एक पुत्री गुणवती के साथ रहते थे। गुणवती की कुंडली देखने पर एक पंडित ने वैधव्य दोष की बात कही। इस दोष से मुक्ति के लिए सोमा नामक स्त्री के पूजन का उपाय बताया गया, जो सिंहल द्वीप में रहती थी।
देवस्वामी का सबसे छोटा पुत्र अपनी बहन गुणवती को साथ लेकर सिंहल द्वीप की ओर निकल पड़ा। मार्ग में गिद्ध परिवार की सहायता से वे सोमा तक पहुंचे। दोनों भाई-बहन ने प्रतिदिन सोमा के घर की सफाई और सेवा की, जिससे प्रसन्न होकर सोमा ने कांचीपुरी आने का वचन दिया।
पुण्य से बदली नियति
कांचीपुरी पहुंचने के बाद गुणवती का विवाह संपन्न हुआ, लेकिन विवाह के तुरंत बाद ही उसके पति का निधन हो गया। तब सोमा ने अपने संचित पुण्य का फल गुणवती को प्रदान किया, जिससे उसका वैधव्य दोष दूर हुआ। इसके बाद गुणवती ने भगवान विष्णु की आराधना कर पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमाएं कीं, जिसके प्रभाव से उसका पति पुनर्जीवित हो गया।
पीपल पूजन का महत्व
कथा के अनुसार, बाद में सोमा के परिवार पर संकट आया, लेकिन उन्होंने भी पीपल वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा और 108 परिक्रमाएं कीं, जिससे उनके परिवार के मृत सदस्य पुनः जीवित हो गए। यह कथा मौनी अमावस्या पर पीपल पूजन और विष्णु आराधना के महत्व को दर्शाती है।
धार्मिक आस्था और समाज में प्रभाव
मौनी अमावस्या न केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व है, बल्कि यह समाज को संयम, त्याग और आत्मचिंतन का संदेश भी देती है। इस दिन मौन, सेवा और दान से व्यक्ति सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर समृद्ध होता है।
न्यूज़ देखो: आस्था और आत्मशुद्धि का पर्व
मौनी अमावस्या जैसी तिथियां भारतीय संस्कृति में आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करती हैं। ज्योतिषाचार्य द्वारा बताए गए धार्मिक संदेश समाज को आंतरिक शांति और नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित करते हैं। यह पर्व आस्था के साथ-साथ आत्ममंथन का अवसर भी देता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
मौन से मिलती है आत्मिक शक्ति
मौनी अमावस्या केवल व्रत नहीं, आत्मशुद्धि का अवसर है।
मौन, दान और पूजा से मन को नई दिशा मिलती है।
इस पावन अवसर पर आस्था और संयम को अपनाएं।
अपनी धार्मिक मान्यताओं को परिवार और समाज से साझा करें।
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