#घाघरा #मानदेय_संकट : बकाया भुगतान नहीं मिलने से इलाज बाधित, परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़।
गुमला जिले के घाघरा प्रखंड में ग्रामीण रोजगार सेवक बिफेश भगत की इलाज के अभाव में मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि पिछले छह महीनों से मानदेय नहीं मिलने के कारण आर्थिक तंगी बढ़ी और समय पर उपचार संभव नहीं हो सका। घटना के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश है।
- बिफेश भगत, ग्रामीण रोजगार सेवक की रविवार को मौत।
- पिछले 6 महीनों से मानदेय बकाया होने का आरोप।
- उच्च रक्तचाप और पीलिया से थे पीड़ित।
- पत्नी सावित्री भगत, आंगनबाड़ी सेविका, को भी नहीं मिला मानदेय।
- ग्रामीणों ने प्रशासन से मुआवजा व बकाया भुगतान की मांग की।
गुमला जिले के घाघरा प्रखंड से एक हृदयविदारक मामला सामने आया है, जिसने जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मियों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घाघरा पंचायत में कार्यरत ग्रामीण रोजगार सेवक बिफेश भगत की रविवार को इलाज के अभाव में मृत्यु हो गई। परिजनों और ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी मौत केवल बीमारी से नहीं, बल्कि पिछले छह महीनों से रुके मानदेय और उससे उपजी आर्थिक बदहाली के कारण हुई।
बीमारी और तंगी की दोहरी मार
परिवार के अनुसार, बिफेश भगत लंबे समय से उच्च रक्तचाप से पीड़ित थे। उचित इलाज और नियमित जांच के अभाव में उनकी स्थिति बिगड़ती गई। इसी बीच वे पीलिया की चपेट में भी आ गए। लगातार बीमारी और कमजोर होती आर्थिक स्थिति ने परिवार को तोड़कर रख दिया।
घर की जमा-पूंजी इलाज में खर्च हो चुकी थी। पिछले छह महीनों से मानदेय नहीं मिलने के कारण परिवार की आर्थिक हालत अत्यंत खराब हो गई थी। पैसे के अभाव में उन्हें समय पर बड़े अस्पताल में भर्ती नहीं कराया जा सका। अंततः बीमारी ने गंभीर रूप ले लिया और उनकी असामयिक मृत्यु हो गई।
पत्नी भी मानदेय से वंचित, दोहरी विडंबना
इस घटना की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मृतक की पत्नी सावित्री भगत भी तिलसिरी गेरेटोली में आंगनबाड़ी सेविका के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें भी पिछले छह महीनों से मानदेय नहीं मिला है। यानी पति-पत्नी दोनों सरकारी व्यवस्था का हिस्सा होने के बावजूद आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे।
परिवार की आय का एकमात्र सहारा मानदेय ही था, जो समय पर नहीं मिलने से घर की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती गई। इलाज, दवाइयों और रोजमर्रा के खर्च के लिए परिवार को उधार और सहायता पर निर्भर रहना पड़ा।
सावित्री भगत ने कहा, “अगर समय पर मानदेय मिल जाता, तो शायद आज मेरे पति जिंदा होते। व्यवस्था की लापरवाही ने हमारे बच्चों से उनके पिता को छीन लिया।”
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
बिफेश भगत के निधन के बाद परिवार के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। छोटे-छोटे बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। आर्थिक तंगी के कारण घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। परिजन अब प्रशासन और सरकार से मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी स्तर पर विकास कार्यों को अंजाम देने वाले रोजगार सेवकों और आंगनबाड़ी कर्मियों को समय पर मानदेय न मिलना गंभीर लापरवाही है। इससे न केवल उनका मनोबल टूटता है, बल्कि उनके परिवार भी संकट में पड़ जाते हैं।
स्थानीय लोगों में आक्रोश
घटना के बाद घाघरा क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
- पीड़ित परिवार को तत्काल उचित आर्थिक सहायता दी जाए।
- मृतक और उनकी पत्नी का बकाया मानदेय अविलंब जारी किया जाए।
- संविदा कर्मियों के मानदेय भुगतान की स्थायी और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए।
लोगों का कहना है कि यदि समय रहते भुगतान की व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई, तो भविष्य में भी ऐसे दर्दनाक मामले सामने आ सकते हैं।
न्यूज़ देखो: जमीनी कर्मियों की अनदेखी कब तक
विकास योजनाओं की सफलता जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मियों पर निर्भर करती है। यदि वही कर्मी समय पर मानदेय के लिए तरसेंगे, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह घटना प्रशासनिक जवाबदेही और संवेदनशीलता की परीक्षा है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जवाबदेही से ही बचेगी जिंदगियां
सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और समयबद्ध भुगतान केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ा प्रश्न है। हर कर्मी सम्मान और सुरक्षा का हकदार है।
आइए, हम सब मिलकर ऐसी व्यवस्था की मांग करें जहां किसी को अपने हक के लिए भटकना न पड़े।
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