
#विश्रामपुर #पलामू : गुरहा पंचायत के घघुआ मल्लाहटोली में मासूम बच्ची पढ़ाई की उम्र में परिवार के लिए ढो रही जलावन।
- गुरहा पंचायत, घघुआ मल्लाहटोली की 6 वर्षीय बच्ची जलौना लाने को मजबूर।
- पढ़ने-लिखने की उम्र में परिवार के भरण-पोषण का बोझ मासूम पर।
- उज्ज्वला योजना और अलाव व्यवस्था कागजों तक सीमित।
- जंगल-जाड़ी से 5 किलोमीटर दूर से जलावन लाने को विवश ग्रामीण।
- जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक दावों पर गंभीर सवाल।
पलामू जिले के विश्रामपुर प्रखंड अंतर्गत गुरहा पंचायत के घघुआ मल्लाहटोली की एक तस्वीर तथाकथित विकास की सच्चाई बयां करने के लिए काफी है। यहां एक छह वर्षीय बच्ची, जिसके हाथों में किताब-कॉपी और कंधे पर स्कूल बैग होना चाहिए, वह अपने परिवार के लिए जलावन लकड़ी लाते हुए माथे पर भारी बोझ ढोती दिखाई देती है। यह दृश्य न केवल संवेदनशील समाज को झकझोरता है, बल्कि सरकारी योजनाओं और विकास के दावों की भी पोल खोलता है।
बताया जाता है कि प्रशासनिक कागजों में घर-घर गैस कनेक्शन दिए जा चुके हैं और ठंड के मौसम में अलाव की व्यवस्था भी दर्शाई जाती है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। इस मासूम बच्ची का जीवन इस बात का प्रमाण है कि कई योजनाएं ज़मीनी स्तर तक नहीं पहुंच पा रही हैं। बच्ची डर और संकोच के कारण ज्यादा कुछ कह नहीं पाती, लेकिन उसकी आंखें और उसका संघर्ष बहुत कुछ बयान कर जाता है।
पढ़ाई नहीं, मजबूरी बन गया जीवन
स्थानीय लोगों के अनुसार घघुआ मल्लाहटोली और आसपास के कई परिवार आज भी जंगल और झाड़ियों पर निर्भर हैं। रोजाना महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे 4 से 5 किलोमीटर दूर से जलावन लाकर घर में चूल्हा जलाते हैं। इस प्रक्रिया में बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और बचपन सब पीछे छूट जाता है।
एक बुजुर्ग महिला ने भावुक होते हुए कहा कि उन्हें राजधानी, वंदे भारत एक्सप्रेस या बड़े विकास कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है। “हमें तो बस इतना चाहिए कि दो वक्त की रोटी और जलाने को लकड़ी मिल जाए,” उन्होंने कहा। उनका यह कथन ग्रामीण गरीबों की वास्तविक जरूरतों को उजागर करता है।
जनप्रतिनिधियों से दूरी का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के समय नेता वोट मांगने जरूर आते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद ऐसे परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। बच्ची के परिवार की स्थिति देखकर यह सवाल उठता है कि क्या विकास की योजनाएं सिर्फ भाषणों और फाइलों तक सीमित रह गई हैं।
स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि इसी पंचायत से जिला परिषद से जुड़े प्रतिनिधि भी आते हैं, लेकिन गांव की बुनियादी समस्याओं पर कोई ठोस पहल नहीं दिखती। उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन होने के बावजूद सिलेंडर भरवाने की क्षमता न होने के कारण लोग फिर से जंगल पर निर्भर हो गए हैं।
अलाव योजना पर भी सवाल
सरकार हर साल ठंड के मौसम में अलाव की व्यवस्था के नाम पर लाखों रुपये खर्च करती है, लेकिन जरूरतमंदों तक इसका लाभ नहीं पहुंच पाता। घघुआ मल्लाहटोली जैसे इलाकों में लोग आज भी ठंड और गरीबी से जूझ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इन योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही किसकी है।
बच्चों का बचपन दांव पर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परिस्थितियां बाल श्रम और शिक्षा से वंचित होने का बड़ा कारण बनती हैं। जब परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो बच्चों को भी मजबूरी में काम में लगना पड़ता है। यह स्थिति भविष्य की पीढ़ी के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।

न्यूज़ देखो: कागजी विकास बनाम जमीनी हकीकत
विश्रामपुर की यह तस्वीर बताती है कि योजनाओं और वास्तविक जीवन के बीच अब भी गहरी खाई है। जब तक निगरानी, जवाबदेही और ईमानदार क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक ऐसे मासूमों का बचपन यूं ही बोझ तले दबा रहेगा। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अब भी वक्त है, सवाल पूछना जरूरी
क्या योजनाएं सही हाथों तक पहुंच रही हैं?
क्या जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
आपकी आवाज बदलाव ला सकती है—इस मुद्दे पर अपनी राय साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और उन मासूमों के हक के लिए सवाल उठाएं, जिनका बचपन हमसे जवाब मांग रहा है।





