
#मनोहरपुर #आईडी_ब्लास्ट : पिता की मौत से बेसहारा हुए परिवार को प्रशासन की मदद — बच्चों को आवासीय विद्यालय में दाखिले की तैयारी।
पश्चिम सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड में आईडी ब्लास्ट में मारे गए जयसिंह चेरवा के परिवार को प्रशासनिक सहायता मिलने की उम्मीद जगी है। घटना में पिता को खोने के बाद परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है। प्रशासन ने मृतक के बच्चों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने और उन्हें आवासीय विद्यालय में दाखिला दिलाने की पहल शुरू की है।
- 10 फरवरी को तिरिलपोसी जंगल में आईडी ब्लास्ट में जयसिंह चेरवा की हुई थी मौत।
- पिता की मौत की खबर करीब एक महीने बाद सोशल मीडिया से बेटी को मिली।
- मृतक की बेटी पुनिता चेरवा महिषगिड़ा में रिश्तेदार के पास रहकर पढ़ाई कर रही है।
- प्रशासन ने परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ देने और बच्चों को आवासीय विद्यालय में दाखिला दिलाने की बात कही।
- नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईडी विस्फोटकों से पहले भी कई ग्रामीणों की हो चुकी है मौत।
पश्चिम सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड अंतर्गत जराईकेला थाना क्षेत्र के तिरिलपोसी जंगल में 10 फरवरी को हुए आईडी ब्लास्ट में मारे गए जयसिंह चेरवा के परिवार को प्रशासनिक सहायता मिलने की उम्मीद जगी है। घटना के बाद परिवार आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है।
जयसिंह चेरवा की 11 वर्षीय बेटी पुनिता चेरवा अपने पिता का अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकी। दरअसल, वह पिछले चार वर्षों से आनंदपुर थाना क्षेत्र के महिषगिड़ा गांव में अपने दूर के रिश्तेदार सरोज सुरीन के यहां रहकर पढ़ाई कर रही है।
एक महीने बाद मिली पिता की मौत की खबर
सरोज सुरीन ने बताया कि जयसिंह चेरवा आर्थिक रूप से काफी कमजोर थे। चार वर्ष पहले उन्होंने अपनी बेटी पुनिता की पढ़ाई की इच्छा जताते हुए उसे महिषगिड़ा में उनके पास छोड़ दिया था।
तब से पुनिता उनके साथ रहकर प्राथमिक विद्यालय महिषगिड़ा में पढ़ाई कर रही है। दूर-दराज क्षेत्र और नेटवर्क की कमी के कारण पुनिता और उसके रिश्तेदारों को जयसिंह की मौत की खबर लगभग एक महीने बाद सोशल मीडिया के माध्यम से मिली।
इस कारण बेटी अपने पिता के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो पाई।
जंगल में पत्ता तोड़ने गए थे जयसिंह
जानकारी के अनुसार 10 फरवरी को जयसिंह चेरवा गांव के अन्य ग्रामीणों के साथ जंगल में पत्ता तोड़ने गए थे। लौटने के दौरान वे नक्सलियों द्वारा पुलिस और सुरक्षाबलों को नुकसान पहुंचाने के लिए लगाए गए आईडी विस्फोटक की चपेट में आ गए और गंभीर रूप से घायल हो गए।
उन्हें बचाने पहुंचे उनके साथी सलाए चेरवा भी आईडी की चपेट में आकर घायल हो गए। विस्फोट के बाद भयभीत ग्रामीण मौके से लौट आए। जंगल में आईडी के डर और दुर्गम इलाके के कारण उन्हें तुरंत अस्पताल नहीं ले जाया जा सका।
अत्यधिक रक्तस्राव, ठंड और समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण दोनों की मौत हो गई।
प्रशासन ने दिया मदद का भरोसा
घटना की जानकारी मिलने के बाद पुनिता की देखभाल कर रहीं सरोज सुरीन ने चिंता जताई और बच्ची को उसके परिवार से मिलाने की कोशिश शुरू की है।
मनोहरपुर प्रखंड के बीडीओ शक्ति कुंज ने कहा कि मृतक के परिवार को सभी सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने बताया कि मृतक के बच्चों को आवासीय विद्यालय में दाखिला दिलाने की व्यवस्था की जाएगी।
बीडीओ ने कहा कि महिषगिड़ा में रह रही पुनिता चेरवा का जल्द ही कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय, मनोहरपुर में दाखिला कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
नक्सली आईडी से पहले भी कई लोगों की मौत
जानकारी के अनुसार झारखंड में नक्सली हिंसा के मामलों में मुआवजा और आश्रित को नौकरी देने का प्रावधान है, लेकिन सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने के लिए लगाए गए आईडी या विस्फोटकों की चपेट में आने वाले ग्रामीणों के लिए पहले स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
सारंडा क्षेत्र के ग्रामीण पत्ता, दातुन, लकड़ी और महुआ जैसे वन उत्पाद इकट्ठा करने जंगल जाते हैं और कई बार ऐसे विस्फोटकों की चपेट में आ जाते हैं।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार अब तक आईडी ब्लास्ट की चपेट में आकर 16 से अधिक ग्रामीणों की मौत हो चुकी है और दर्जनों लोग घायल हुए हैं। वहीं सुरक्षाबलों के भी कई जवान इन घटनाओं में शहीद या घायल हुए हैं।
पुलिस और प्रशासन ने दी आर्थिक सहायता
28 फरवरी 2026 को पश्चिम सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक अमित रेणु ने सामुदायिक पुलिसिंग के तहत मनोहरपुर थाना परिसर में कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में आईडी ब्लास्ट में मृतकों के परिजनों और घायलों को आर्थिक सहायता और दैनिक जरूरत की सामग्री उपलब्ध कराई गई।
पुलिस और प्रशासन की इस पहल से पीड़ित परिवारों में एक नई उम्मीद जगी है।

न्यूज़ देखो विशेष: दूर-दराज इलाकों में सुरक्षा और सहायता की जरूरत
सारंडा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीण अक्सर गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझते हैं। ऐसे में जंगलों में लगाए गए विस्फोटक उनके लिए जानलेवा साबित होते हैं।
यदि प्रशासन और सरकार ऐसे परिवारों को समय पर सहायता और सुरक्षा उपलब्ध कराएं तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
मासूमों का भविष्य सुरक्षित करना जरूरी
ऐसी घटनाओं में सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन ऐसे परिवारों के बच्चों की शिक्षा और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए।
यदि आपके क्षेत्र में भी किसी जरूरतमंद परिवार या सामाजिक मुद्दे से जुड़ी खबर हो, तो उसकी जानकारी ‘न्यूज़ देखो’ तक जरूर पहुंचाएं।






