सच बोलने की कीमत, पत्रकारिता का जोखिम: कैसे ठहरे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?

सच बोलने की कीमत, पत्रकारिता का जोखिम: कैसे ठहरे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?

author Ramprawesh Gupta
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#देश #पत्रकारसुरक्षा : सच उजागर करने वाले पत्रकारों को धमकियों, ट्रोलिंग और दबाव का सामना—सुरक्षा कानून की मांग तेज
  • सत्य और जनहित आधारित पत्रकारिता को लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है।
  • हाल के महीनों में कई पत्रकारों को धमकियों, डराने-धमकाने और उत्पीड़न का सामना।
  • सत्ता, अपराध और भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे अधिक निशाने पर।
  • सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और दुष्प्रचार से मानसिक दबाव बढ़ा।
  • पत्रकार संगठनों ने पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग दोहराई।
  • नागरिकों में चिंता—यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं, तो सच सामने कौन लाएगा।

देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। सच, निष्पक्षता और जनहित पर आधारित पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन आज यही स्तंभ लगातार हमलों, दबावों और धमकियों का सामना कर रहा है। कई पत्रकारों ने हाल के महीनों में धमकियों, डराने-धमकाने और मानसिक शोषण की शिकायतें की हैं। सत्ता, अपराध और भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर सबसे अधिक दबाव बताया जा रहा है। इसके साथ ही सोशल मीडिया ट्रोलिंग और ऑनलाइन हमलों ने भी स्थिति को पहले से ज्यादा भयावह बनाया है।

सच लिखने की कीमत: धमकियां, दबाव और असुरक्षा

ग्राउंड लेवल पर काम करने वाले कई पत्रकारों का कहना है कि सच को सामने लाने का प्रयास जितना बड़ा होता है, उतना ही बड़ा खतरा भी सामने खड़ा होता है।
एक वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर ने कहा:

वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर ने कहा: “जब आप सच बोलते हैं, तो कई लोगों को वह असहज करता है। अक्सर धमकी भरे फोन आते हैं। कहा जाता है कि रिपोर्टिंग बंद कर दो—वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा। परिवार को भी संदेश भेजे जाते हैं। डर लगता है, पर काम रोक नहीं सकते।”

पत्रकारों के अनुसार, अपराध, सत्ता और पैसों से जुड़ी संवेदनशील खबरें लिखना आज पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जोखिम भरा हो गया है।

सोशल मीडिया ने बढ़ाया खतरा, ट्रोलिंग बनी नया हथियार

सोशल मीडिया ने जहां पत्रकारों को रिपोर्टिंग का नया मंच दिया है, वहीं यह दबाव और उत्पीड़न का साधन भी बन गया है।
एक युवा डिजिटल पत्रकार ने बताया:

युवा डिजिटल पत्रकार ने कहा: “स्टोरी वायरल होते ही संगठित ट्रोल ग्रुप सक्रिय हो जाते हैं। गलत बातें फैलाते हैं, बदनाम करने की कोशिश करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे हमें चुप कराने के लिए ट्रोल्स लगाए गए हों।”

मानसिक तनाव और डिजिटल हमलों से कई युवा पत्रकार गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।

पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग तेज, अब भी अधूरा कदम

पत्रकार संगठनों और प्रेस काउंसिल ने बार-बार सरकार से अनुरोध किया है कि पत्रकार सुरक्षा कानून तुरंत लागू किया जाए। उनका कहना है कि यह कानून पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा देगा और किसी भी धमकी, हमले या उत्पीड़न की स्थिति में तत्काल कार्रवाई का आधार बनेगा।
कई राज्यों ने प्रस्ताव तो पेश किए हैं, लेकिन व्यापक और केंद्रीय स्तर पर ठोस कदम अब तक अधूरे हैं।

लोकतंत्र के लिए खतरा: अगर पत्रकार चुप हुए, तो सच कौन बोलेगा?

सामान्य नागरिकों और लोकतंत्र की परवाह करने वाले लोगों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर पत्रकार असुरक्षित होंगे, तो सच का प्रवाह रुक जाएगा।
फेक न्यूज़, प्रोपेगेंडा और अफवाहों के इस दौर में सच्ची पत्रकारिता को बचाना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। पत्रकारों की सुरक्षा सिर्फ एक पेशे की सुरक्षा नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सत्य की रक्षा से जुड़ा सवाल है।

न्यूज़ देखो: पत्रकारों की सुरक्षा देश की जरूरत, न कि बहस का विषय

यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सच बोलने का साहस रखने वाले पत्रकार आज सबसे अधिक जोखिम में हैं। लोकतंत्र में पत्रकारिता सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं, जनता की आवाज भी होती है। जब पत्रकारों पर हमला होता है, तो असल में लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। सरकार और प्रशासन का दायित्व है कि पत्रकार सुरक्षा कानून की दिशा में ठोस कदम उठाए, ताकि सच कहने की हिम्मत कभी कम न हो।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सच की रक्षा तभी संभव, जब हम आवाज उठाना न छोड़ें

सच्ची पत्रकारिता को सुरक्षित रखना केवल पत्रकारों का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है। जब सच कहने वालों को धमकियां मिलती हैं, तो आवाज जनता की भी कमजोर होती है। इसलिए जागरूक नागरिक के रूप में हमें सच्चाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ईमानदार पत्रकारिता का समर्थन करना चाहिए।
अपनी राय नीचे कमेंट करें, इस खबर को अधिक से अधिक साझा करें और एक ऐसे समाज की ओर कदम बढ़ाएं जहां सच बोलने वालों को डर नहीं, सुरक्षा और सम्मान मिले।

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Written by

महुवाडांड, लातेहार

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