Giridih

पारसनाथ पर्वत पर जैन साधु-साध्वियों की ऐतिहासिक परिक्रमा ने बढ़ाया धार्मिक उत्साह

#गिरिडीह #जैन_परंपरा : सम्मेद शिखर मधुबन में पहली बार एक साथ 57 पिच्छी विराजमान—परिक्रमा में देशभर से उमड़े श्रद्धालु
  • सम्मेद शिखर गुणायतन में पहली बार 57 पिच्छी एकसाथ विराजमान।
  • आचार्य समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती साधु-साध्वियों ने पर्वत परिक्रमा की।
  • परिक्रमा से पहले पिच्छी परिवर्तन, सिद्धचक्र विधान, पर्वत वंदना संपन्न।
  • निमियाघाट पुरुषार्थ तीर्थ में सभी संतों की आहार चर्या पूरी हुई।
  • ईसरी महिला मंडल ने विशेष चौका लगाकर आहार संपन्न कराया।
  • सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति, महत्ती धर्म प्रभावना।

गिरिडीह जिले के सम्मेद शिखर मधुबन में मंगलवार का दिन जैन समुदाय के लिए ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उत्साह से भरा रहा। गुणायतन में लगभग नौ महीनों से एक साथ 57 पिच्छी विराजमान हैं, जो मधुबन के इतिहास में पहली बार हो रहा है, और इनके दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालुओं का निरंतर आगमन जारी है। वर्षाकालीन चातुर्मास समाप्ति के बाद आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों के उपरांत सभी साधु-साध्वियों ने जैन धर्म की 24 में से 20 तीर्थंकरों की पावन निर्वाण स्थली पारसनाथ पर्वत की पदयात्रा करते हुए परिक्रमा संपन्न की। इस दिव्य आयोजन ने श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और भक्ति का संचार किया।

जैन साधु-साध्वियों की ऐतिहासिक उपस्थिति

सम्मेद शिखर में इस वर्ष की सबसे बड़ी विशेषता 57 पिच्छी धारी साधु-साध्वियों का एक साथ प्रवास है, जो जैन परंपरा में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो रहा है। संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती निर्यापक श्रमण मुनि समता सागर जी महाराज, मुनि पवित्र सागर जी, पूज्य सागर जी, अतुल सागर जी, आर्यिका गुरुमति जी, दृढ़मति माताजी, गुणमती माताजी सहित सभी 57 पिच्छी धारी साधु-साध्वी इस आध्यात्मिक आयोजन में सम्मिलित हुए।

धार्मिक अनुष्ठानों से गूंजा गुणायतन

चातुर्मास की समाप्ति के बाद गुणायतन परिसर में पिच्छी परिवर्तन, सिद्धचक्र विधान, सामूहिक पर्वत वंदना और अन्य कई धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इन अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने महान संतों के दर्शन का लाभ उठाया। पिच्छी परिवर्तन के इस दुर्लभ अवसर ने उपस्थित सभी भक्तों के लिए आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षण प्रदान किया।

पारसनाथ पर्वत की परिक्रमा

अनुष्ठानों के पश्चात सभी साधु-साध्वियों ने पारसनाथ पर्वत की पैदल परिक्रमा की, जिसे जैन धर्म में सर्वोच्च तप और भक्ति का प्रतीक माना गया है। यह परिक्रमा जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों की पवित्र निर्वाण स्थली के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है। संतों की यह पदयात्रा भक्तों के लिए अत्यंत प्रेरणादायी और दिव्य अनुभूति लेकर आई।

निमियाघाट में संपन्न हुई आहार चर्या

परिक्रमा क्रम में सभी साधु-संतों की आहार चर्या निमियाघाट स्थित पुरुषार्थ तीर्थ में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर ईसरी महिला मंडल द्वारा एक विशेष चौका लगाया गया, जहाँ निर्यापक मुनि समता सागर जी महाराज तथा छह माताजियों के निअन्तराय आहार नवधा-भक्ति के साथ संपन्न कराए गए।

चौका सेवा में प्रमुख रूप से शामिल रही महिला मंडल की सदस्या मीना जैन, अनीता जैन, नीता जैन, रश्मि जैन, शोभना जैन, सुलेखा जैन, संगीता जैन, सरिता जैन, कल्पना जैन।
जैन समाज से सुनील कुमार जैन, अशोक कुमार जैन, भैया लाल जैन, आर्जव जैन सहित अनेक सदस्यों ने पड़गाहन के बाद सभी संतों को आहार अर्पित किया।

महत्ती धर्म प्रभावना और श्रद्धालुओं की भीड़

पूरे आयोजन के दौरान गुणायतन और पुरुषार्थ तीर्थ परिसर में महत्ती धर्म प्रभावना हुई, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। बड़ी संख्या में उपस्थित भक्तों ने इस दिव्य ऐतिहासिक आयोजन को अपने जीवन का सौभाग्य बताया और संतों के दर्शन को परम आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में महसूस किया।

न्यूज़ देखो: जैन समुदाय की आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम

पारसनाथ पर्वत पर 57 पिच्छी धारी साधु-साध्वियों की उपस्थिति और परिक्रमा ने जैन धर्म की विरासत को नई ऊर्जा प्रदान की है। यह आयोजन न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक है बल्कि समाज में नैतिक प्रेरणा और शांति का संदेश भी देता है। ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों से क्षेत्र की पहचान और सांस्कृतिक मजबूती को नई दिशा मिलती है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

आस्था के इस दीप से जीवन में जागे नई प्रेरणा

जैन साधु-साध्वियों की परिक्रमा न सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान, बल्कि आत्मशुद्धि और समर्पण का संदेश भी देती है। यह आयोजन हमें बताता है कि साधना, संयम और सेवा का मार्ग समाज को प्रकाश देता है। अब समय है कि हम भी अपने जीवन में अनुशासन, करुणा और शांतिपूर्ण दृष्टि अपनाएँ। अपनी राय कमेंट में साझा करें और इस खबर को आगे भेजें, ताकि अधिक लोग इस ऐतिहासिक आयोजन की प्रेरणा से जुड़ सकें।

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Surendra Verma

डुमरी, गिरिडीह

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